रणबीर सिंह दहिया का व्यंग्य – बहम का इलाज

 हरियाणवी व्यंग्य

बहम का इलाज

रणबीर सिंह दहिया

 

म्हारे बुजुर्गां धोरै न्यों सुनते आवां सां अक बहम की दवाई तै लुकमान धोरै बी नहीं थी। पर आजकल बहम की दवाई की जरूरत बहोत सै। जिसकै देखो उसै के क्याहें ना क्याहें का बहम होरया था। बंसीलाल कै दारु बन्दी का बहम होरया सै तै भजन लाल कै बंसीलाल की सरकार गेरण का बहम रोज बबावै सै अर देवीलाल के बहम होरया सै अक अपणे बेटे चौटाला नै हटकै चीफ मिनिस्टर क्यूकर बणावै। बीरेन्द्र सिंह कै बहम बड़ग्या अक इन तीनों लालां की छुट्टी करकै मैं क्यूकर चीफ मिनिस्टर बणूं। बाकी बी घणे सैं जो चेयरमैन बणण का बहम पाले हांडैं सैं। कै घणे ए इसे बी सैं जो एकै रात मैं अरबपति होण का बहम लादें घूमण लागरे सैं। जड़ कहण का मतलब यो सै अक बहम की दवाई की पूरे हरियाणे के हरेक माणस अर बीरबानी नै जरूरत सै। जै इस दवाई का नुस्खा मेरे हाथ लागज्या तै मेरी चान्दी जरूर होज्यागी इसका बहम मेरे बी सै।

सारे हरियाणा मैं जिब बहम की दवाई नहीं पाई तै मैं गुजरात मैं गया उड़ै तै इस बीमारी का प्रकोप फैल रया सै, पर इलाज कोण्या। फेर महाराष्ट्र मैं गया उड़ै बाल ठाकरे का देश पै राज करण का बहम देख कै तो मनै गश आगी थी। राजस्थान मैं गया तो देख्या अक शेखावत साहब बी कई हकीमां नै बिठारे थे अपने धोरै। जड़ बात याह सै अक सारे भारत महान मैं हांड कै देख लिया पर बहम की दवाई कोण्या पाई। कई बै तो जी मैं आवै सै अक भारत के साइन्सदानों नै एक गाड्डी भर कै गाल द्यूं। इस मामूली सी बीमारी की दवाई बी तैयार नहीं कर सके ईब ताहिं। ऊं तो माणस चान्द पै जा लिया अर बहम की दवाई ईजाद नहीं करी। अर ज्यों ज्यों मुनाफाखोर व्यवस्था मैं मुनाफा खोर विकास होन्ता गया त्यों त्यों बहम का मरज बी बढ़ता ए जाण लागरया सै। कई बै मेरा तो इसा जी करै सै इन सारे बहमियां नै कट्ठे करकै दिल्ली मैं एक प्रदर्शन करया जा तो गिनीज बुक मैं नाम लिखण तै कोए नहीं रोक सकता। दुनिया के 50 प्रतिशत बहमी म्हारे देश मैं रैहन्ते बताए।

ऊं तो म्हारे बड्डे बडेरे कैहगे अक बहम की कोए दवाई तो होणी ए चाहिए ना तो ये हरियाणे के सारे लाल अर उनके लाडले मैडिकल के वार्ड नम्बर तेरां मैं भरती होए पावैंगे तो फेर हरियाणा नै कूण सम्भालैगा? हरियाणा नै राह कौण दिखावैगा? जै दवाई नहीं सै तो इसकी खोज तो करी ए जाणी चाहिये। बेरा ना म्हारे प्रदेश के डाक्टर कूणसी खोज के चक्करां मैं सैं। इस कान्हीं उनका ध्यान बेरा ना ईब ताहिं क्यूं नहीं जा लिया। अर न्यों बी सुणण मैं आवै सै अक बहम का मरज छूत का रोग सै यो एक माणस तै दूसरे मैं अर दूसरे से तीसरे मैं बहोत तावला फैलै सै। इस रोग के शिकार माणसां के राज दरबार खत्म होगे, घर बार उजड़गे तथा कानी कोड्डी के नहीं रहे वे माणस। माणस कै चाहे कैंसर हो जाओ पर यो बहम का मरज नहीं होणा चाहिये। शंका, शक इस रोग के दूसरे नाम सैं, हो सकै सै और बी कई नाम हों इसके।

एक बर एक इसे माणस कै घरां जाणा पड़ग्या जिसकी गेल्यां कदे उसका बैर रहया था। पर आजकल ठीक ठाक बात थी। सामण का म्हिना था। उसनै घेवर मंगवा राख्या था। जीत सिंह नै खाणा पड़या पर घरां आया इतनै उसकै यो बहम होग्या अक कदे नफे सिंह नै घेवर मैं जहर जाहर ना मिला दिया हो? बस फेर के था जीत सिंह कै तो, पसीने आगे, दिल का पंखा सा चाल पड़ा, नाड़ी सौ तै ऊपर गई, जी घबरावण लाग्या। तीन चार बर पेशाब करण गया। जणो गात का जमाए सत् लिकड़ ग्या हो। भाज्या-भाज्या डाक्टर धोरै पहोंच्या जीत सिंह। डाक्टर नै देख्या सब किमै ठीक ठ्याक था।

उसनै जीत सिंह समझाया अक बहम मतना करै सब ठीक सै। फेर जीत सिंह तो सैड दे सी बोल्या अक बहम नहीं मनै लागै सै किमै ना किमै होण आला सै। देख बालक रूल ज्यांगे मेरे तो अर तों डाक्टर ओहले कैहकै एक औड़ नै होज्यागा। फेर डाक्टर नै एक बै देख्या पर किमै हो तै पावै। डाक्टर बोल्यां जीते यो तै तेरा खामखा डर बैठ ग्या, बात कुछ बी नहीं सै। जीत सिंह घरां आग्या पर जिक थोड़े ए ना पड़ै थी। सारी रात भाई नै मसकोड़े ले ले कै काटी। घरआली बी दुखी होली अर उसनै बी मनै मन मैं सोच्या अक बालकां के बाबू के ओपरा आपरा तो नहीं होग्या सै, सारी रात मसकोड़े मारे सै खाट मै। खैर तड़कैंए ताहिं जिब कुछ नहीं होया तो जीत सिंह कै माड़ी सी जिक पड़ी। इस बहम का घेरा राजनीति अर खाण पीण की चीजां ए ताहिं कोण्या, यो बहोत बड्डा सै।

एक बै मास्टर जी के अपनी घरआली के बारे मैं शक होग्या। घरआली बैंक मैं नौकरी करया करती। मास्टरजी तो कदे पीस्से जमा करवावण के बाहणै अर कदे लिकड़वाण कै बाहणै रोज बैंक मैं खड़या पावै शेर। ऊंबी घणी चौकसाई बरतन लागग्या। घरआली कै बी शक होग्या अक आजकल मास्टर जी क्यों सारी हाण बैंक मैं खड़े रहवैं सैं। आपस मैं बिना बात के झगड़े शुरू होगे। मास्टरजी कै बालक पीटण की आदत तो थी ए, एक दिन घरआली कै बी धर दिये। कई जानकारां नै बीच बचाव करया। मास्टरजी नै दिमाग के डाक्टरां धोरै लेगे उननै बिजली लाई अर पूरा एक म्हिना इलाज करया जिब जाकै थोड़ा ठीक होया। पूरी ढाल ठीक तो ईबी नहीं हो लिया। ईब के करै उसकी घरआली क्यूकर अपणी छाती चीर के दिखावै अक उसमैं उसै की मूरत सै।

इस बहम करकै तो और बेरा ना के के होण लागरया सै पर इसकी दवाई तो कोण्या पाई ईब ताहिं। फेर एक बात सै देखण मैं न्यों आया सै अक गाम मैं एकाध माणस समझदार खुले दिमाग आला, ईमानदार ईसा हो सै जिसकी बातां का असर इन बहमियां कै जरूर होज्या सै। पर दिक्कत तो या सै एक ईसे बढ़िया माणस तो कई कई गामां बिचालै एकाध रैहगे अर बहमी माणसां की लार रोज बढ़ती जा सै। क्यूकर बात बणैगी मेरे इस बात का बहम होया रहवै सै। बात तो सोचण की सै अक आखिर बहम के मरज का इलाज के हो?

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