99% की अंधी दौड़ के बीच: याद आता है वो ज़माना जब सिर्फ ‘पास होना’ ही उत्सव था

99% की अंधी दौड़ के बीच: याद आता है वो ज़माना जब सिर्फ ‘पास होना’ ही उत्सव था

 

डॉ रीटा अरोड़ा

 

अंकों की प्रतिस्पर्धा में उलझी नई पीढ़ी को याद दिलाता वह दौर, जब शिक्षा का उद्देश्य केवल नंबर नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार होना था

“दादी, मेरे 96% आए हैं…” नातिन ने उदास स्वर में मार्कशीट उनकी ओर बढ़ा दी।
दादी ने चश्मा लगाकर देखा और खुश होकर बोलीं, “अरे वाह! इतने अच्छे नंबर!”
लेकिन बच्ची की आँखों में खुशी नहीं थी।
“दादी, क्लास में चार बच्चों के मुझसे ज्यादा आए हैं। शायद मुझे मनचाहा कॉलेज न मिले।”
दादी कुछ देर उसे देखती रहीं।
फिर मुस्कुराकर बोलीं, “बेटा, जब मैं दसवीं में पास हुई थी, तब पूरे मोहल्ले में मिठाई बंटी थी। किसी ने यह नहीं पूछा था कि कितने प्रतिशत आए हैं। सबने बस इतना कहा था – ‘लड़की पास हो गई, बहुत अच्छा हुआ।'”
बच्ची ने हैरानी से पूछा, “सच? तब प्रतिशत नहीं पूछते थे?”
दादी ने गहरी साँस ली।
“नहीं बेटा… तब बच्चे नंबरों से नहीं, अपने संस्कारों और सीखने की लगन से पहचाने जाते थे।”

यह बातचीत केवल दो पीढ़ियों की नहीं है। यह दो अलग-अलग शिक्षा प्रणालियों की कहानी है। एक वह समय था जब शिक्षा का उद्देश्य जीवन को समझना था।

एक आज का समय है, जहाँ कई बार जीवन से अधिक महत्व मार्कशीट को मिल जाता है। आज परिणाम आते ही सबसे पहला प्रश्न होता है – “कितने प्रतिशत आए?”

99 प्रतिशत भी कई बार कम लगने लगे हैं।
99.2 और 99.6 के बीच भविष्य तय होने लगा है।

बच्चे परीक्षा खत्म होने के बाद भी तनाव से बाहर नहीं आ पाते। माता-पिता, रिश्तेदार, पड़ोसी, सोशल मीडिया – सबकी निगाहें अंकों पर टिक जाती हैं। ऐसा लगता है मानो बच्चे नहीं, प्रतिशत परीक्षा दे रहे हों।

लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक का भारत बिल्कुल अलग था। तब ‘पास’ होना ही सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता था। गाँव में कोई बच्चा मैट्रिक पास कर जाए तो पूरा मोहल्ला बधाई देने पहुँच जाता था। थर्ड डिवीजन से पास होने वाला भी सम्मान पाता था, क्योंकि उसने शिक्षा की एक सीढ़ी पार कर ली थी। प्रतिशत से अधिक महत्व प्रयास का होता था।
उस समय स्कूलों में न स्मार्ट बोर्ड थे, न कोचिंग की भरमार। टाट-पट्टी पर बैठकर पढ़ने वाले बच्चे भी बड़े सपने देखते थे। नई नटराज पेंसिल मिल जाना खुशी थी। स्कूल से लौटते ही बस्ता फेंककर गली में क्रिकेट खेलना दिनचर्या थी।
शाम को माँ की आवाज़ आती – “बस अब घर आ जाओ।”
तब बचपन, बचपन था।
आज बचपन भी टाइम-टेबल बन गया है।
स्कूल…
कोचिंग…
ऑनलाइन क्लास…
मॉक टेस्ट…
और फिर अगली परीक्षा की तैयारी।

ऐसा लगता है जैसे बच्चे नहीं, किसी अंतहीन दौड़ के धावक हों।
समस्या मेहनत करने में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब मेहनत का उद्देश्य केवल दूसरों से आगे निकलना रह जाए।

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या था?

हमारे प्राचीन भारत की गुरुकुल परंपरा इस प्रश्न का सुंदर उत्तर देती है। वहाँ छात्र का मूल्यांकन केवल लिखित परीक्षा से नहीं होता था। गुरु उसके व्यवहार, अनुशासन, जिज्ञासा, चरित्र और जीवन कौशल को भी देखते थे।

ज्ञान का अर्थ केवल उत्तर याद करना नहीं, बल्कि जीवन में उसे उतारना था। बाद में अंग्रेज़ी शासन के दौरान औपचारिक परीक्षा प्रणाली आई। धीरे-धीरे अंक, ग्रेड और प्रतिशत शिक्षा के केंद्र में आ गए। जो व्यवस्था प्रशासनिक सुविधा के लिए बनाई गई थी, वही आगे चलकर बच्चों की क्षमता मापने का सबसे बड़ा पैमाना बन गई।

आज स्थिति यह है कि कई बार 95 प्रतिशत अंक लाने वाला बच्चा भी स्वयं को असफल मान बैठता है। उसका दुख यह नहीं होता कि उसने कम सीखा। उसका दुख यह होता है कि किसी और ने उससे अधिक अंक प्राप्त कर लिए।
क्या यही शिक्षा का उद्देश्य था?

शायद नहीं।

शिक्षा का अर्थ केवल सूचना इकट्ठा करना नहीं है।
शिक्षा वह है जो व्यक्ति को बेहतर इंसान बनाए।
जो उसे प्रश्न पूछना सिखाए।
जो उसे समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना सिखाए।
जो उसके भीतर संवेदनशीलता, रचनात्मकता और आत्मविश्वास विकसित करे।

लेकिन आज रटने की संस्कृति ने समझने की प्रक्रिया को पीछे धकेल दिया है।

बच्चे कई बार परीक्षा तक सब कुछ याद रखते हैं।
परीक्षा समाप्त होते ही बहुत कुछ भूल जाते हैं।
अंक रह जाते हैं।
ज्ञान खो जाता है।

इसका सबसे गहरा प्रभाव बच्चों के मन पर पड़ रहा है। आज परीक्षा का मौसम केवल परिणामों का नहीं, तनाव का मौसम भी बन गया है। अनेक बच्चे चिंता, अनिद्रा, आत्मविश्वास की कमी और अवसाद जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। कुछ बच्चों के लिए एक मार्कशीट उनके पूरे व्यक्तित्व का निर्णय बन जाती है, जबकि सच यह है कि कोई भी मार्कशीट किसी इंसान की पूरी क्षमता नहीं बता सकती।
यह भी सच है कि समय बदल चुका है। प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों के लिए मूल्यांकन आवश्यक है। हम पुराने समय में पूरी तरह लौट भी नहीं सकते।
लेकिन क्या हम उस समय की कुछ सीख आज नहीं अपना सकते?
क्या हम अपने बच्चों को यह नहीं बता सकते कि उनका मूल्य केवल प्रतिशत से तय नहीं होता?
क्या हम उन्हें यह विश्वास नहीं दे सकते कि असली सफलता अच्छे इंसान बनने में भी है?

आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी कौशल-आधारित और समग्र शिक्षा की बात करती है। यह स्वागतयोग्य कदम है। क्योंकि आने वाला समय केवल अच्छे अंक लाने वालों का नहीं, बल्कि अच्छा सोचने, मिलकर काम करने, नई समस्याओं का समाधान खोजने और संवेदनशील नेतृत्व करने वालों का होगा।
अंततः
शिक्षा का उद्देश्य प्रतियोगिता नहीं, क्षमता है।
मार्कशीट नहीं, व्यक्तित्व है।
डिग्री नहीं, दृष्टि है।

शायद इसलिए आज भी कभी-कभी मन उस दौर को याद करता है…
जब परिणाम आने पर घर में केवल एक सवाल पूछा जाता था- “पास हो गए?”
और “हाँ” सुनते ही माँ की आँखों में खुशी आ जाती थी।
मिठाई बँटती थी।
आशीर्वाद मिलता था।
और बच्चा यह महसूस करता था कि उसे उसके अंकों से नहीं, उसके होने से प्यार किया जाता है।

शायद हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी सबसे अधिक इसी विश्वास की आवश्यकता है।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर,करनाल हैं

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