हाजिर जवाबी हरियाणा की !

व्यंग्य

हाजिर जवाबी हरियाणा की !

रणबीर सिंह दहिया

 

सत्ते, फत्ते, नफे, सरिता, कविता, सविता, सरतो, भरतो अर भरपाई शनिवार की सांझ नै फेर कट्ठे होगे। संतोष नोडल प्रेरक भी आरी थी आज। सरोज प्रेरक माड़ी सी टैंस होरी थी। खैर सारे कट्ठे होगे तै चर्चा हुई अक आज चर्चा किस बात पै होवै?

सत्ते बोल्या – इस डीजे पै काटकड़ उतररया सै इसपै चर्चा करल्यो। फत्ते बोल्या – ये आर्य समाजी सहशिक्षा का विरोध क्यों कररे सैं इसपै चर्चा होज्या। सविता बोली – भोपाल मैं उमर अर प्रियंका की शादी पै लोग सड़कां पै क्यूं आगे, इसपै चर्चा करल्यो। ताई भरपाई बोली – आज तो चर्चा होणी चाहिए म्हारे आपणे गाम अर आसपास के चुटकल्यां पै।

सारे बोले – ताई भरपाई शुरू करैगी। ताई भरपाई नै सुणाणा शुरू करया – बोली मेरे चुटकुले का नाम सै ‘देखण आला आरया सै’ – एक बै एक भूभलनी और उसका घर आला दोनूं आपणा सामान बेचण खातिर एक गांव तै दूसरे गांव मैं जावैं थे। लुहारी आगे कै चढ़गी। लुहार पिछली खिड़की म्हां कै चढ़ग्या। कंटक्टर नै दो टिकट काट कै लुहार ताहिं पकड़ा दी। फेर आगे नै जाकै लुहारी ताहिं टिकट की कहण लाग्या। लुहारी नै बता दिया कि टिकट तो पाछै लुहार ने ले ली।

फेर परिचालक मजाक करण का मारया कोण्या मान्या अर बोल्या टिकट तो तेरी काटूंगा। तै लुहारी हार कै बोली – ओ लुहार एक बै आगे नै लखाइये। लुहार बोल्या क्यांह तै, के बात सै? लुहारी बोली – तन्नै देखण आला आ रया सै। (देखण आले का मतलब सगाई आला होवे सै)। कंडक्टर बेचारा चुप होग्या अर बस की सवारी जोर-जोर तै हसण लाग्गी।

सरिता बोली – हाजिर जवाबी का तोड़ कर दिया उस महिला नै। कविता बोली – ताई भरपाई नै बात भूभलियां तै शुरू कर दी तो एक बात याद आगी – भूभलियां की गेल्यां आमतौर पर गाम आले मजाक करते रहे हैं। बस मैं एक लुहारी बैठी थी अर उसके साथ कई बालक भी थे।

कंडक्टर आया और टिकट की कहने लगा। लुहारी बोली – एक टिकट दे दे।

कंडक्टर बोल्या बस एक टिकट? अर या आधी जनैत गैल लेरी सै, इसकी टिकट कौन लेगा? जनेत मैं जाकै सारयां का जनैती रुपइया मांगोगे। लुहारी नै शांत भाव तै उत्तर दिया – भाई टिकट तो एक ही दे दे पर जै यो थारै जनेती आज्यां तै जनेती रुपइया मत दिये।

सविता बोली बहोत बढ़िया, फेर ईब बात भूभलियां पर तै बदलो। उसनै सुणाणा शुरू कर दिया – हरियाणा मैं भात न्योतन की प्रथा सै। एक बै एक ताई भात न्योतन दिल्ली के बवाना गाम मैं जा थी। औचंदी बार्डर पै पुलिस नै भैली (पांच किलो गुड़) पकड़ ली अर थानेदार बोल्या – ताई यो गुड़ दिल्ली मैं नहीं जा सकदा। ताई बोली – भाई मेरी भाभी गर्म सुभा की है। जै गुड़ नहीं ले कै गई तो बेरा ना के के सुणावेगी। मन्नै यो गुड़ ले ज्याण दे। थानेदार की हथेली भी खजावै थी अक ताई किमै सेवा पाणी करदे तो जा लेण देंगे। ताई बहोत गिड़गिड़ाई फेर थानेदार नहीं मान्या।

सोच-सोच कै ताई बोली – भाई बिना भेली तो मैं नहीं जां अर भेली तूं नहीं ले जाण दे तौ फेर न्यूं कर चार मार्च का फाग आले दिन का ब्याह सै या भेली तैहि राख अर उस दिन आ जाइये। कविता बोली – थानेदार का तो सही राह बांध दिया। एक बात मेरे बी याद आगी – एक आदमी गंजा था। उसकी पत्नी कानी थी पर वो बात-बात मैं उसपै तान्ने मारे जावै था। एक बर वो आदमी अखबार पढ़ै था। उसकी पत्नी बोली अखबार मैं के खबर आरी सै। वो बोल्या काहनोन्दे मैं आग लागगी। उसनै बी ओस्सान सा आग्या इतनी वार मैं अर वा बोली – फेर तै गंजूड़ के गंजूड़ जले होंगे।

नफे की बारी आगी। बोल्या – एक बै सरकार नै रूरल इंडस्ट्री लाण का प्रोग्राम शुरू करया था। भरतू गरीब किसान था। उसनै भी लोन ले कै एक पोल्ट्री फार्म खोल लिया। मेहनत करी चूजे ऊपर नै होगे तो लोन महकमे का अफसर चैकिंग पै आग्या। सब किमै देख दूख कै बोल्या – इन चूज्यां नै के खवाया करो। किसान बोल्या – काजू, किशमिश, अखरोट अर और बेरा ना के के। अफसर बोल्या – यो सब खवा कै तो चला लिया मुर्गी खाना। मैं जाकै इसनै बंद करण की सिफारिश करूंगा।

भारतू गिड़गिड़ाया पर कोनी मान्या तो दो सौ रुपइये अफसर की गोज में घाल दिये अर बोल्या जी आगे तै ख्याल राखूंगा। दो म्हीने पाछै अफसर फेर पहोंचग्या। देख द्वाख कै बोल्या – इन चूज्यां नै के खवावै सै। भरतू बोल्या – के खवाना सै यो हे घासफूस खालें सै। अफसर बोल्या – इननै मारैगा। म्हारी बदनामी होगी। तेरा लोन वापस लेवण की सिफारिश करूंगा जाकै। भरतू नै फेर दो सौ रुपइये गोज में घाल दिये।

अफसर बोल्या आगे तै ख्याल रखना। दो म्हीने बाद अफसर फिर पहोंच गया। मुआइना करने के बाद पूछा – इन चूजों को क्या खिलाते हो। भरतू बोल्या – जी मैं तो इनको कैश पेमैंट कर देता हूं इनका जो जी करै वो खालें। सारे बोले भरतू नै सही जवाब दिया। हरियाणवी जीवन मैं हाजिर जवाबी, साफगोई, व्यंग और मजाक बहोत गहरे तक पैठ बनाये हुए थे।

फेर आज काइयांपन बहोत घणा आग्या। महिला विरोधी, दलित विरोधी, जात विरोधी चुटकुले बहुत मिलते हैं। इनसे तो छुटकारा पाकै ढंग के हंसी मजाक गायब होते जावण लागरे सैं वे ल्याणे होंगे। हरियाणा बोली कदे भाषा बणैगी इस बात पै कुछ नहीं कहया जा सकता। हां हिंदी मैं म्हारी बोली के खास शब्द शामिल करके हिंदुस्तानी भाषा का विकास करना बहोत घणा जरूरी सै। करै कौन? हमनै ताश खेलण तै कड़ै फुरसत सै।

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