हरदीप सबरवाल की तीन कविताएं

हरदीप सबरवाल की तीन कविताएं

कविता-1

 पंखे पर लटकी रोटी

 

स्कूल जाते वक़्त

मां बच्चे के टिफिन में

रख देती एक रोटी

और साथ ही साथ

बहुत सारी रोटियां रख देती

उसके दिमाग में

बच्चा जान गया

उसके स्कूल जाने का मतलब

सीखना नहीं

भविष्य की रोटियों का

इंतजाम भर है

 

दिमाग में पड़ी पहली रोटी

उसे ले चलती है

गली के नुक्कड़ पर खुली

ट्यूशन क्लास तक

 

दूसरी किसी नामी गिरामी

कोचिंग संस्थान के दरवाजे तक

प्रतिशत की एक संख्या बनाती

 

बड़ी बड़ी रोटियां ले आती हैं

उसे बड़े बड़े शहरों के

डिब्बे नुमा कमरों में

बड़ी बड़ी प्रतिस्पर्द्धा तक

पर ये रोटियां कई बार

इतनी अधिक भारी हो जाती हैं

कि उसे ले आती हैं

बन्द कमरे में लटके

किसी पंखे तक

आराम से झूल जाने के लिए..

 

२.

कितने कुलधरा

फिर एक के बाद एक

वो उतरते चले गए…

 

फिर एक बाद एक

वो निकलते चले गए , मन से …

उस मन से

जहां कितने समय वो बसे रहे

नवकिरण की भोर से

सुरमई शाम तक

अनगिनत खुशियों को

असंख्य आरजूओं को

जन्म देते, पालते पोसते रहे

 

जहां कितने समय तक वो बसे…

और सिर्फ बसे ही नहीं

उस मन की मिट्टी को गहरा खोद

बिछाई नींव,

खड़े किए अनगिनत हवाई किले

और लहराए उम्मीदों के परचम

 

उस मन से वो चले ही गए आखिर…

जाने के लिए उनके अपने तथ्य थे

उनकी अपनी इच्छाएं, चाहतें

फिर कौन नहीं चाहता होगा

बेहतर जगह, बेहतर संभावनाएं

और कुछ नहीं तो सुरक्षा के कारण रहें होंगे

 

अब जब गए सब ,

पीछे छोड़ गए, अनगिनत प्रश्नचिन्ह

अपने अपने बनाए हवाई किले पर

मन की मिट्टी में से बने घरोंदो को

मिट्टी में मिलने को छोड़

 

कुलधरा, कहीं दूर बसा, उजड़ा

एक गांव भर तो नहीं

मन में ही

बसते, उजड़ते रहते हैं

ना जाने कितने, कुलधरा…

 

  ३.

रैस्टरूम में स्टूडेंट्स

पहले पीरियड में ही
बुझे चेहरे के साथ, लाचार हो
पहुंच जाते,  हाजिरी लेते
कक्षा अध्यापक के पास
अचानक किसी का सरदर्द, पेट दर्द
किसी को लगता
आने वाली है उल्टी
मौसम के थपेड़ों से त्रस्त

अपने साथी से कह
स्लिप बनवा, क्लास इंचार्ज के दस्तखत करवा
टिफिन , वाटर बॉटल उठा
पहुंच जाते स्कूल के रैस्टरूम में
अपनी अपनी तकलीफों को
बिस्तर पर लिटा आराम करते

रैस्टरूम में ही कुछ विद्यार्थी
खिड़की से बाहर झांकते
पिकनिक सा आनंद लेते
अगले पीरियड में होने वाले
क्लास टेस्ट से बचते
बचते गृह कार्य न करने की डांट से

रैस्ट रूम में विद्यार्थी, कितनी बार
व्यवस्था को धता बता
नादान उम्र में ही
उसके लूपहोल पर हंसते खिलखिलाते…

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