रोशनी के आज का सच
कहानी का इतिहास भी शायद उतना ही पुराना है जितना मानव समाज का इतिहास। हमारे पुरखे अपने जीवन के अतीत के अनुभवों को आगामी पीढ़ियों को बताने के लिए कहानी का इस्तेमाल करते रहे होंगे। पहले मौखिक रूप में और लिपि के अविष्कार के बाद कहानी लिख करके इतिहास को संरक्षित करना शुरू किया होगा? तभी से कहानी हमारे जीवन से जुड़ गई है। बाद में कहानी पर नाटक और फिल्में भी बनने लगीं : यहां हम संघर्षरत रहे लेखक ओमसिंह अशफ़ाक की 45 साल पहले लिखी गई कहानी ‘रोशनी’ प्रस्तुत कर रहे हैं जो पहली बार ‘कथन’ में, दूसरी बार उनके प्रथम कहानी संग्रह ‘आज का सच’ में प्रकाशित हुई थी जोकि अब अनुपलब्ध है। बाद में इस कहानी को 20वीं सदी की 6 प्रतिरोधी कहानियों में स्थान मिला और अतिथि संपादक महेश दर्पण ने ‘उद्भावना’ पत्रिका के “प्रतिरोधी कहानी विशेषांक” में इसको पुनर्प्रकाशित किया- संपादक।
कहानी
रोशनी
ओमसिंह अशफ़ाक
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ओ३म् सर्वम् वै पूर्णम् स्वाहा..।।
हमेशा की तरह आज भी साप्ताहिक यज्ञ की पूर्ण आहुति दी गयी। महाशय प्रभुदयाल बजाज ने अपनी प्रिय ईश-प्रार्थना का उवाच शुरू किया, “यज्ञरूपी प्रभो, हमारे भाव उज्जवल कीजिए। छोड़ देवें छल-कपट को, मानसिक बल दीजिए।..सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तुः मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत्।” इस कामना के साथ ही शांतिपाठ का सामूहिक जप करके अनुष्ठान संपूर्ण हुआ।
लेकिन महाशयजी का मन आज शांतिपाठ के समय भी एकाग्र नहीं हो रहा था, उद्वेलित-सा था और बार-बार प्रयत्न करने के बाद भी चलायमान हो रहा था। कारण महाशय जी समझ रहे थे, पर करें क्या।
महाशय जी स्थानीय आर्यसमाज के प्रधान हैं। प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं नगर के। केसरिया रंग का तुर्रेदार साफ़ा उनके सिर पर ख़ूब फबता है। शरीर चेहरे से एकदम स्वस्थ और चुस्त । पैंसठ के हो गये हैं, फिर भी शीर्षासन से लेकर मयूरासन तक बख़ूबी कर लेते हैं। हिन्दी के शब्द उच्चारण पर पूरा अधिकार है उनका। धाराप्रवाह बोलते हैं। छोटा हो या बड़ा, नाम के बाद ‘जी’ लगाये बगैर कभी नहीं पुकारते। संध्या और हवन के सब मंत्र कंठस्थ हैं उन्हें। सत्यार्थप्रकाश और संस्कार विधि का तो सांगोपांग अध्ययन किया है कई बार। संध्या के मंत्रों का छोटा गुटका हर समय कोट-कुरते की जेब में रखते हैं। सत्यार्थ प्रकाश का कोई भी प्रसंग हो समुल्लास की संख्या तक जबानी बता देंगे।
दूरदर्शी भी कम नहीं हैं महाशयजी। एक बार ‘वैदिक समाजवाद’ पर काफी शंकाएं उठ खड़ी हुई थीं। यहां तक कि आर्यसमाज के कोषाध्यक्ष श्री रामलालजी वधवा (अब रामलालजी आर्य) ने भी कह दिया था, ‘अवश्य ही छद्म-वेश में कोई कोमनिष्ट है।’ इस पर महाशयजी स्वामी अग्निवेशजी को अलग कमरे में लेकर घंटों बैठे थे, गहरा वार्तालाप किया था और फिर देखते-देखते सबकी शंकाएं दूर कर दी थीं, “अरे, वैदिक समाजवाद कम्युनिस्टों वाले समाजवाद से बिल्कुल अलग चीज़ है। इसमें किसी की संपत्ति थोड़े ही छीनी जायेगी। यह तो नये नाम से वैदिक-व्यवस्था का ही पुनस्र्थापन है। शंका की कोई बात नहीं है।”
“फिर इसे समाजवाद नाम देने की क्या आवश्यकता थी ?” एक अन्य आर्यमित्र ने प्रश्न किया। महाशय जी ने समझाया था, “अरे! आर्य युवक कम्युनिस्ट बनते जा रहे हैं। कहते हैं- आर्यसमाज तो संध्या-हवन एंड कंपनी प्रा० लि० बन गया है। बड़ी धृष्टतापूर्ण बातें करने लगे हैं युवक। इन्हें वैदिक व्यवस्था में तो रुचि है नहीं। नया युग है, नयी बात, नया नाम चाहते हैं।” उबलते दूध पर पानी के छींटों का काम किया था महाशयजी की बात ने। सबका शंकासमाधान हो गया था एक पल में।
इधर बड़ा परिश्रम और दौड़-धूप करके इस मुहल्ले (या कॉलोनी) में आर्यसमाज मंदिर की स्थापना करायी थी उन्होंने। और मुहल्ले का नाम ‘आर्यनगर’ क्या कोई आसानी से तब्दील हुआ था ? शिक्षा और समाजकल्याण मंत्री तक पहुंचना पड़ा था उन्हें। आख़िर बाजी मार लाये थे। भव्य स्वागत और ‘इक्यावन सौ की माला’ का वचन दिया था, तब कहीं आने पर रजामंद हुए थे मंत्री महोदय। लेकिन मंत्रीजी द्वारा ‘समाज मंदिर’ के उद्घाटन के बाद महाशय जी की खूब चढ़ बनी।
बजाज एंड संस के नाम से मशहूर उनकी कपड़े की दुकान ठसाठस भरी रहने लगी ग्राहकों से। लोग उनके बढ़ते यश और व्यापार की प्रशंसा करते तो महाशयजी बड़े निर्लेप भाव से सिर्फ़ इतना ही कहते, “सब ईश्वर की कृपा है।”
आस-पास के गांवों के लोग महाशयजी से संपर्क बढ़ाने के लिए बिना जुगाड़ के भी कपड़ा खरीदने पर मजबूर होते। सोचते, चलो सौ-पचास के लत्ते के पीछे महाशय से जान-पहचान हो जाये, क्या कम है? छोरा चौदहवीं जमात में पढ़ता है, महाशय सिफ़ारिश कर देंगे तो कहीं रुजगार ही लग जायेगा। मंत्री जी तो उनके खासमखास आदमी हैं-कभी कहा नहीं मोड़ सकते। बात बस इतनी सी है कि महाशय ज़रा दिल से कह दें।
महाशयजी के ऊपर दिनोंदिन सामाजिक दायित्वों का भार बढ़ता जा रहा है। फिर भी हर नया दायित्वपूर्ण पद सहर्ष स्वीकार लेते हैं। कभी इनकार करना तो जाना ही नहीं। श्रेष्ठ आत्मा हैं! वाकई। अभी पिछले दिनों ‘व्यापार मंडल’ के प्रधान का पद भी उन्हें सौंपा गया। महाशय जी गद्गद हो गये थे अभिनंदन के समय।
पर ईर्ष्यालु और दुष्ट व्यक्ति कहां नहीं होते ? उन्हें दूसरों के बढ़ते यश और मान से चिढ़ होती है। उनका काम ही बाधाएं खड़ी करना होता है। ऐसी ही एक साजिश यहां भी हुई। कुछ सिरफिरों ने कमेटी के भंगियों को हड़ताल के लिए उकसा दिया। सारे भंगी हड़ताल कर बैठे। नये वेतनमान की मांग के साथ गरम वर्दी, चप्पलें और महंगाई भत्ते की मांगें भी जोड़ लीं। कुल मिलाकर पांच हजार का अतिरिक्त बजट चाहिए था।
दो दिन में सारा कस्बा गंदगी से सड़ने लगा। महाशयजी को अपनी दुकान और नयी कोठी के सामने गंदगी बिल्कुल पसंद नहीं। जिस दिन से हड़ताल हुई, संध्या-हवन में भी मन एकाग्रचित्त न होता।
आखिर उन्होंने नगरपालिका के प्रशासक से टेलीफोन मिलाया, “श्रीमान्, इस तरह तो कस्बे में बीमारी फैल जायेगी। सख्ती से निपटिये इनके साथ। दिमाग ख़राब हो गये हैं दुष्टों के! धूर्त हैं। महंगाई क्या सिर्फ़ इसी कस्बे या देश में बढ़ी है। सारी दुनिया में महंगाई बढ़ गयी है। भाव और मौत पर किसी का वश होता है ? ईश्वर के अधीन है। जी, हां-हां, अवश्य कीजिए श्रीमान्। स्कूल-कालेजों के विद्यार्थियों में भी समाजसेवा की भावना का विकास होना चाहिए। प्रिंसिपल साहब तैयार हो गये हैं? बहुत अच्छा साहब ! धन्यवाद श्रीमन् ! जी हां, आर्यसमाज और व्यापार मंडल तो हमेशा तत्पर है। पूरा-पूरा सहयोग देंगे श्रीमन् !”
दस बजते ही कालेज के छात्रों का हजूम कस्बे के शहीद चौक में आ पहुंचा। साथ आये अध्यापक ने सबको झाडू, तसले और कस्सी लेने का आदेश देकर चौक से जुड़ने वाली चारों गलियों पर जुटा दिया। कचरे की ट्रॉली भरी जाने लगी। दो घंटे बाद ‘सफ़ाई’ करके काफिला लौट गया। शिक्षक कालेज में और छात्र मुंह-हाथ-पैर धोकर सीधे घरों को।
नगरपालिका स्वीपर्स यूनियन के कार्यकर्ताओं में क्षोभ की लहर दौड़ गयी। कुछ ने कहा, “हड़ताल फेल होगी, नहीं चलेगी। गरीब का साथ कौन देता है? हमने के बिगाड़ा है इन पढ़णियां छोरां का? अपने पेट की खातिर लड़ें हैं। सबके पेट हैं। रोटी तो सबको चाहिए। फिर क्यूं म्हारे पेट पै लात मारें हैं ये छोरे?” यूनियन के प्रधान बिरजराम को कालेज में प्रिंसिपल के पास भेजा गया।
बहुत खुशामद की बिरजू ने, पर प्रिंसिपल साहब टस से मस न हुए। साफ कह दिया, “एडमिनिस्ट्रेटर के पास बहुत बड़े इख्तियारात हैं बुड्ढे ! एस डी एम की पॉवर्स भी उन्हीं के पास है। कहां हड़ताल के चक्कर में पड़ गये हो, जाकर माफ़ी मांग लो, बख्श देंगे। मैं भी सिफ़ारिश कर दूंगा।”
बिरजू का हलक सूख गया। रुआंसा होकर बाहर निकल आया। अनेक प्रकार के विचार दिमाग में घूमने लगे-कहीं हड़ताल करके वाकई गलती तो नहीं हो गयी ? ग़रीब आदमी की भला क्या औकात कि हाकिमों से लड़ाई करे ? हाकिम भी तो सरकार होते हैं। उनकी कलम में बंदूक से ज्यादा ताकत है। हाकिम जज भी तो होते हैं। किसी को फांसी लिख दें तो क्या हड़ताल उसे बचा लेगी ? नहीं, सरकार से कोई नहीं लड़ सकता। गलती की हमने। हां, गलती की। जाकर समझाऊंगा। छोरे-छपाटे हैं, मान जायेंगे। तीन-चार ही उद्दंड हैं- सुरेश, मांगी, नत्थी और रोशनी। अब्वल तो सुरेश और रोशनी ही। बड़ी अहमक लड़की है। उसी ने सारे बीज बोये हैं। नये जमाने की हवा लग गयी है उसको। कहती है, सब हड़ताल करके उजरत बढ़वा लेते हैं तो हम क्यों नहीं बढ़वा सकते ?- सोचता हुआ बिरजू बाल्मीकि बस्ती में लौट आया।
बात सुरेश ने शुरू की, “क्या रहा दादा? क्या बोला पिरंसपल ?” उत्तर में बिरजू ने सारा वार्तालाप दोहरा दिया और अपना सुझाव भी कि हड़ताल ख़त्म कर देनी चाहिए। हाकिम की खुशामद करने की जिम्मेदारी भी स्वयं ले ली। लेकिन हड़ताल खत्म करने के सुझाव का तीखा प्रतिरोध हुआ। रोशनी सबसे पहले बोली, “क्यों खतम करें हड़ताल ? हाकिम है, सरकार है, तो हमें खायेगा?” समवेत स्वर में, सुरेश, मांगी और नत्थी तीनों बोल पड़े, “हड़ताल चलेगी, बिलकुल ख़तम नहीं होगी। अपने हक लेकर रहेंगे।” कहते हुए वे तीनों पांच-सात हमउम्र लड़कों को लेकर ओबरे में चले गये। अलग मीटिंग होने लगी।
रोशनी भी उनकी मीटिंग में जाकर बैठ गयी और बोली, “दादा पुराने जमाने का है। हाकिमों से डर जाता है। मैंने कहा था, मैं जाऊंगी दादा, तेरे साथ। पर नहीं ले गया। उल्टा डपट दिया- तुझे तो कभी न ले जाऊं। तूं जरूर वहां चिरड़-मिरड़ करेगी। बात बनती होगी तो भी बिगाड़ देगी तू। अब देख लिया ? उल्टी सीख मान कर चला आया।”
अचानक नत्थी को कुछ याद आया, “अबे सुरेश। पिरंसपल तै बात क्यूं करें ? और फिर इस बात की के गारंटी कि पढ़णियां छोरे पिरंसपल की बात मान ही जांगे। भई, मन्नै तो एक होर बात सूझती है। हां, तम भी तो थे उस दिन ? पढ़णियां छोरे झलूस ले कै गये थे डी सी की कोठी पै। वो दो-तीन छोरे थे ना झलूस के लीडर के नाम हां, बलवीर, अरै बलबीरा दाढ़ी वाला़ और कैलासिया-कैलाश। सुणा है भोत समझाया था पिरंसपल ने। पर नहीं माने। धुर डी०सी० की कोठी पै लेगे थे झलूस। भई, उन तै बात करणी चाहिए।”
मांगी ने समर्थन किया, “भई, छोरे तो छोरयां की बात मान सकें। उनके कहण ते बेशक टाल़ कर दें सफाई की। और फिर बलबीरा तो कुछ कुमनिस्ट-वुमनिस्ट के चक्कर में भी है। मजदूरों की बात जरूर मान जागा।”
तय हुआ कि शाम को कालेज के हॉस्टल में बलबीर और उसके साथियों से बात की जाये।
बलबीर बी०ए० फाइनल का छात्र है। बहुत सौम्य और मिलनसार। अथक परिश्रमी भी। छात्र-आंदोलन के सिलसिले में अभी-अभी यूनिवर्सिटी से लौटा था दो दिन के बाद। घी का डिब्बा उठाकर मैस में खाने के लिए जा ही रहा था कि सुरेश, मांगी और नत्थी तीनों पहुंच गये। नमस्ते करके सुरेश बोला, “भाई बलबीर, हम तो कुछ काम से आये थे।”
“हां, आओ ना, अंदर बैठकर बात करते हैं।” कहते हुए बलबीर ने वापस मुड़कर कमरे का दरवाजा खोल दिया।
चारों बैठ गये और भंगियों (सफाई कर्मचारियों) की मांगें, हड़ताल और कॉलेज के छात्रों द्वारा कस्बे की सफाई-सारी बातें बता दीं सुरेश ने।
“छात्रों ने सफाई की? आपकी हड़ताल के दौरान ?” बहुत गुस्सा आया बलबीर को। हॉस्टल के सारे छात्रों को उसने फौरन इकट्ठा कर लिया। बड़ा लज्जित किया सबको, “मजदूरों के साथ गद्दारी की है हमारे कालेज के छात्रों ने। शर्म से डूब मरो। मां-बाप की कमाई पर पल़ रहे हैं ना हम लोग। पता चलेगा जब सड़कों पर चप्पल फटकारते फिरेंगे नौकरी के लिए। नूण-तेल का भाव मालूम पड़ जायेगा।”
छात्रों ने बलबीर को विश्वास दिलाया कि कुछ भी हो जाये, कल से कालेज का कोई छात्र नहीं जायेगा सफाई करने। लेकिन जैसा कि होना था, छात्रों के फैसले की बात सुबह ही प्रिंसिपल के जरिये एस० डी० डम० तक पहुंच गयी।
दोहरा मोर्चा खोलना ठीक नहीं था, अतः एस० डी० एम० ने संयम से काम लिया। बजाज एंड संस का नंबर मिलवाया और महाशय प्रभुदयाल को आर्यसमाज और व्यापार मंडल के सहयोग की बात याद दिलायी।
महाशय जी उधर से बोले, “हमें पहले ही अनुमान था श्रीमन् ! पूरी तैयारी कर रखी है हमने। रात ही व्यापार मंडल और ‘समाज’ की मीटिंग बुला ली थी मैंने। आप लेशमात्र भी चिंता न करें। अभी दोनों संगठनों के स्वयंसेवक सफाई अभियान प्रारंभ करने ही वाले हैं। जी, यह भी कोई बात है, श्रीमन् ? धन्यवाद और आभार कैसा। समाज सेवा का काम अपना काम।
ईश्वर की कृपा है।”
लेकिन बात इतनी सरल और आसान नहीं रह गयी थी।
स्वयंसेवकों के साथ महाशय जी ने सफाई में हाथ लगाया ही था कि हड़तालियों का जुलूस उधर आ निकला। पास आते ही तू-तू-मैं-मैं शुरू हो गयी। एक स्वयंसेवक ने जुलूस में शमिल नत्थी के सिर पर झाडू की मूठ से वार कर दिया। नत्थी का सिर तो ऊक गया, पर कंधे पर भरपूर चोट पड़ी। लेकिन भंगियों में उत्तेजना फैलने की संभावना देखते ही महाशय जी अपनी झाड़ू फेंक, हाथ जोड़कर बीच में आ खड़े हुए। नत्थी पर प्रहार करने वाला स्वयंसेवक उनका इशारा पाकर भीड़ में गायब हो गया और महाशय जी किसी अमूर्त सत्ता को अहिंसा का उपदेश देते हुए शांति स्थापित कराने लगे। खैर, बीच-बचाव हो गया।
लेकिन तभी लोगों ने देखा कि रोशनी भीड़ में से निकली और महाशय जी से उलझ पड़ी। उनके लंबे सफेद-चिट कुरते का पिछला पड़त पकड़ कर बोली “मूँठ की तरफ से झाडू घुसेड़ दूँगी, मोर बण्या फिरेगा। बण्या फिरै महाशा ! सिंध्या-हबन रचावै- मजदूरों का खून पीणा चाहवें ?”
महाशय जी ने तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की, “दुष्ट कहीं की! बेगार करते हो ? नगरपालिका वेतन देती है। पाख़ाना साफ़ करते हो तो क्या मुफ़्त में ? पैसे नहीं मिलते ?”
रोशनी तैश में आ गयी, “नपूत्ते, लफंगे, म्हारी टट्टी उठा कै देख एक दिन। पता चलेगा तेरे रिश्तेदारों तक।”
महाशय जी बाजी हार गये। उनके पास रोशनी की बात का कोई जबाब नहीं था। दौड़े-दौड़े दुकान के अंदर गये और टेलीफोन का रिसीवर उठाकर एस० डी० डम० का नंबर मांगा।
इधर हड़तालियों का जुलूस कस्बे की मुख्य सड़क से गुजरता हुआ एस०डी०एम० की कोठी की तरफ बढ़ ही रहा था कि मोड़ पर बलबीर और उसके साथियों का दल हाथों में जलती मशालें लिये जुलूस में आ मिला।
“अंधों को दिखाने के लिए दिन में भी रोशनी चाहिए; हर जोर-जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है। मजदूरों पर जुल्म करे जो वो अफ़सर ती ज़ालिम है” के गगनभेदी नारे लगाता हुआ जुलूस दस मिनट में प्रशासक की कोठी पर पहुंच गया।
बस, यहीं पर एस०डी०एम० चूक गये। महाशयजी ने उन्हें टेलिफोन पर सूचना दी थी, “श्रीमन आपकी कोठी को फूंकने और आपकी हत्या करने का षड्यंत्र है।” एस०डी०एम० ऐसे गुमराह हुए कि होश ही खो बैठे। कोठी पर तैनात पुलिस को फायरिंग का आदेश दे दिया।
ठांय-ठांय-ठाय
बारह राउंड गोलियां दागी गयीं। जुलूस में भगदड़ मच गयी। बाल्मीकि बस्ती में पहुंच कर ही लोगों ने दम लिया। सुस्ताने भी न पाये थे कि बलबीर हांफता हुआ आ पहुंचा।
“दादा, बिरजू को गोली मार दी।” सुन कर बिजली का-सा करेंट लगा सबको।
पोस्टमार्टम के बाद दूसरे दिन बिरजू की लाश मिली थी। आतंक का अंधेरा दिन दोपहर पसर गया था बस्ती में। मंझोली-बिरजू की विधवा-भयानक चीत्कार करके डकरा रही थी, “हाय रे, किसके सहारे जीऊंगी
“एक नहीं, तेरी पांच-पांच औलाद हैं दादी।” कहते हुए रो पड़े थे सुरेश, मांगी, नत्थी, बलबीर और रोशनी। फिर रोशनी ने कहा, “तेरे पेट से जनम नहीं लिया तो क्या हुआ। भरोसा कर दादी, भरोसा कर हम पर। काश! दादा की जगह मुझे गोली लग जाती।”
मंझोली ने डबडबायी आंखों से रोशनी को देखा और उसे बांहों में भर कर छाती से लगा लिया। उसके चेहरे पर घिरे शोक के बादलों के बीच से वातसल्य भरी मुस्कान की एक किरण फूटी।
(कथन, मई-जून 1981)
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