छह साल जेल में रहने के बाद पिछले वर्ष बाहर आये मराठी कवि सुधीर ढबले की कविता जिसे मज़दूर आंदोलन के उफान के बीच ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।
कविता
मैं मज़दूर हूँ
– सुधीर ढवळे
मैं मज़दूर हूँ
हाँ, वही
जिसके हाथों की सख़्त पड़ चुकी खाल ने
तुम्हारे शहरों की इमारतें खड़ी कीं
जिसके पेट की भूख ने
तुम्हारी इकॉनमी का ढोल फुलाकर दिखाया
और जिसके पसीने पर तुम्हारी दौलत खड़ी है
मगर सुनो
मैं सिर्फ़ फैक्ट्री में नहीं हूँ
मैं नाके पर खड़ा हूँ
मोबाइल की स्क्रीन में क़ैद
मैं वही गिग वर्कर हूँ
जिसकी आँखों में हर सुबह
काम की तलाश में उगती है एक भिखारी-सी उम्मीद
और शाम होते-होते
वही उम्मीद पेट से चिपकी भूख बनकर लौट आती है
मैं वही मज़दूर हूँ
जिसके हाथ में ज़मीन-जायदाद नहीं
जिसके नाम पर आज भी
इंसान होने का हक़ नहीं
मैं काम करता हूँ शहर बसाने के लिए
मगर मेरी झोपड़ी पर
तुम्हारी नज़रों से ही गिरती है अस्पृश्यता की परछाई
मैं हूँ
हर उस हाथ में
जहाँ मेहनत है मगर क़ीमत नहीं
हर उस पेट में
जहाँ भूख है मगर आवाज़ नहीं
मैं सुबह उठता हूँ तो
सूरज नहीं
मेरे दिमाग़ में सायरन बजता है
और रात को सोता हूँ तो
ख़्वाब नहीं
बस थकावट की घनी दीवार होती है
दस हज़ार की नोट में
तुम्हें इकॉनमी दिखती है
मुझे दिखते हैं
फटे जूते
आधा-अधूरा खाना
और बच्चे की आँखों में वो ख़त्म न होने वाला सवाल…
“अब्बा, कल स्कूल जाऊँ क्या?”
मैं जवाब नहीं देता
क्योंकि मेरे हाथ में
सिर्फ़ काम है
हक़ नहीं
तुम कहते हो
“मुल्क तीसरी इकॉनमी बन रहा है!”
मगर मुझे बताओ
मैं किस नंबर पर हूँ?
भूख की लिस्ट में?
या बेइज़्ज़ती की?
ये मुल्क हमारी हड्डियों पर खड़ा है
और अगर हम खड़ा होना छोड़ दें
तो तुम्हारा सब कुछ ढह जाएगा!
दस हज़ार की तनख़्वाह में
तुम हमें ज़िंदा रखते हो
मरने नहीं देते
मगर जीने भी नहीं देते!
ये तनख़्वाह नहीं
ये धीरे-धीरे दी गई सज़ा-ए-मौत है!
जब फैक्ट्री के गेट पर ताला लगता है
और सर पर कर्ज़ का पहाड़ बैठ जाता है
तो जो पहली आवाज़ उठती है
वही हमारा नाम होता है
उस दिन
मैं सड़क पर खड़ा हुआ
पहली बार
बिना डर के…
क्योंकि मज़दूर होना
सिर्फ़ काम करना नहीं
लड़ना भी है
मेरी आवाज़ में
सिर्फ़ मज़दूरी नहीं थी
थी
मेरी ज़िंदगी
मेरा वजूद
मेरी अस्मिता
मगर उन्होंने क्या किया?
बाउंसर भेजे
लाठियाँ बरसाईं
जैसे हम मुजरिम हों…
हमारे हाथ में सिर्फ़ तख़्तियाँ थीं
तुम्हारे हाथ में लाठियाँ…
मगर याद रखो
लाठियाँ ख़ौफ़ पैदा करती हैं
भूख बग़ावत पैदा करती है!
तुम हम पर झूठे इल्ज़ाम लगाते हो
‘क़त्ल की कोशिश!’
हाँ
हम कोशिश कर रहे हैं
इस नाइंसाफ़ी के निज़ाम का क़त्ल करने की!
क्योंकि ये निज़ाम
हमें रोज़ मारता है!
मेरी बीवी को धक्का दिया उन्होंने
उसके होंठ से ख़ून निकला…
वो हँसी
और बोली
“डर मत…
हम ग़लत नहीं कर रहे!”
उस लम्हे मुझे समझ आया
इंक़लाब क्या होता है…
तुम हमारी औरतों पर हाथ उठाते हो
हमारी आवाज़ को बेड़ियों में जकड़ते हो
मगर भूलो मत
जिन हाथों ने तुम्हारी फैक्ट्रियाँ खड़ी कीं
वही हाथ
तुम्हारे दरवाज़े भी तोड़ सकते हैं!
हक़
भीख माँगकर नहीं
छीनकर ही लेना पड़ता है
इसके लिए मज़दूर उठ खड़े हुए
तो बस्स
अहंकार में जल उठे विश्वगुरु
विकृति में डूब गए विश्वगुरु
जो मज़दूर को इंसान नहीं समझते
वो अंदर से टूटे हुए होते हैं
वो इंसान की परछाई से डरते हैं
इसलिए वो हमेशा झूठी कहानियाँ फैलाते हैं
‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ कहने वालों को
वो ‘अर्बन नक्सल’ कहते हैं
मज़दूरों को संगठित करने वालों को
‘पाकिस्तानी एजेंट’ ठहराते हैं
उन्हें फसाद चाहिए
उन्हें दंगा दंगा चाहिए
मगर हम टूटेंगे नहीं
क्योंकि हम मशीन नहीं
जिसे बंद-चालू किया जा सके
हम वो हाथ हैं
जिन्होंने तुम्हारी दुनिया बनाई है!
आज मैं यहाँ खड़ा हूँ
खाली जेब में
मगर भरी हुई आवाज़ के साथ…
मैं पुकारता हूँ
हमें हमारा हक़ चाहिए!
हमें जीना है
सिर्फ़ जीना नहीं
इंसान की तरह जीना है!
३०,००० की तनख़्वाह: हमारा हक़!
पक्की नौकरी: हमारा हक़!
यूनियन: हमारी साँस!
तो तुम 4 नई लेबर कोड्स थोपते हो
हमें गुलामी की नई ज़ंजीरों में जकड़ते हो
इसलिए
ये लड़ाई सिर्फ़ तनख़्वाह की नहीं
ये लड़ाई है
सेठजी-भटजी-लाटजी का मर्मस्थल तोड़ने वाली
तुम्हारे खोखले राष्ट्रवाद पर थूकने वाली
तुम्हारे मज़हब के अफ़ीम को धुएँ में उड़ाने वाली
समानता की
सीधे जड़ पर वार करने वाली
आज हम सड़क पर हैं
कल फैक्ट्रियाँ रुकेंगी…
और परसों
इतिहास लिखा जाएगा!
हम ख़ौफ़ नहीं
हम तूफ़ान हैं!
हम इल्तिज़ा नहीं
हम बग़ावत हैं!
“मैं मज़दूर हूँ
मैं चमकती तलवार हूँ…”
और
मैं अकेला नहीं
मेरे जैसे लाखों हैं
गुरुग्राम से भिवंडी तक
नोएडा से मानेसर तक…
हम सब मिलकर कहते हैं –
हम अभी खड़े हैं…
हम अभी लड़ रहे हैं…
कि इंसानियत ज़िंदा रहे…
मेरे पसीने की हर बूँद से
अब चिंगारी उठ रही है
अगर ये चिंगारी भड़क उठी
तो मैं क्या करूँ?
(22 अप्रैल 2026 : व्लादिमीर लेनिन का जन्मदिन)
