कवि शमशेर बहादुर सिंह की याद में 

कविता

कवि शमशेर बहादुर सिंह की याद में

(13.01.1911 से 12.5.1993)

 

शमशेर-स्मृति

ओमसिंह अशफ़ाक

 

लो, अब खड़ा हूँ उदास

ऐलम की सड़क पर

इस दरख्त के पास!

आस लिये मिलन की निराश-

निरुपाय, निस्सहाय हाय !

**

किस से कहूँ

दुखी मन की व्यथा

पूछूं किससे उनके घर का पता

कोई कहता क्यूँ नहीं

कि हाँ-मिले थे-

हमें भी यहीं एक बार

करते इंतजार मोटर या रेल की

बातें भी हुई थीं बहोत-

प्यार और मेल की..

**

पर अब तो मुद्दे क्या थे-

वो भी याद नहीं?

बस इतना है याद-

मिले थे यहीं-कहीं!

सुना है, वे आये थे

दुबारा एक बार

पर रुके नहीं,चले गए

हाय! हम छले गए!

**

भला तब किसे था पता

कि फिर कभी न मिलेंगे-

गर्मजोशी के वे हाथ

फिर कभी न हिलेंगे!

भाई, हमसे बड़ी भूल हुई

अब दिल में चुभता है शूल-

जुदाई का..!

**

चलूँ, किसी और से पूछूं!

कोई तो बतायेगा-

बचपन के उनके किस्से सुनायेगा!

पर अफसोस –

उन्हें यहां कोई नहीं जानता?

बंजर है ये भूमि-

यूँ मन नहीं मानता!

अगर ऐसा होता-

तो शमशेर यहाँ नहीं होते

और बहता नहीं यहाँ-

उनकी कविता का सोता !

**

मिट्टी ने इस गाँव की

मोह लिया है मेरा मन

शीतल छाया पेड़ों की

हरती है मन की थकन

लो,अब ले उड़ी है कल्पना

विचारों को-

भटकन भरे चक्रव्यूह में

जिसका न कोई अन्त है

न कोई प्रारम्भ!

**

रश्क होता है मुझे

यहाँ चलते हुए

चले होंगे शमशेर कभी

इसी सड़क पर-

कविता का तेवर बदलते हुए

ताजिंदगी नहीं हुआ मिलन

जानें कहाँ-कहाँ रहे?

भोगा बनवास,अज्ञातवास

क्या-क्या दुःख सहे-

अब कौन कहे ?

**

कैसे-कब जहर का घूँट पिया

पर कविता को आदमकद जिया

कब सांझ का सूरज डूबा

कब भोर का तारा टूटा

कुछ नहीं ख़बर!

लीन रहे मगर

काव्य-समाधी में

**

मैं मूर्ख

रहा पड़ा अज्ञान कूप में

वे बार-बार खिलते रहे

सदाबहार मिलते रहे

उन्हें,चाहत थी जिन्हें

कविता की।

**

इस गाँव की मिट्टी में

जज्ब है उनके बचपन की महक

और चिड़ियों की चहक में

झरती हैं कविताएं!

बतियायी होंगी जो

चिड़ियों के साथ

मौन-संवाद में-

सृजन से पूर्व,रचना के पश्चात्

लेखन से पहले या लिखने के बाद!

**

गुम हो गयी होंगी या

कुरते की जेब में

धुल गयी होंगी

या जल गयी होंगी

पिता के क्रोध में

विचित्र भाव-बोध लिये

रुल़ गयी होंगी धूल में

फूल-सी कोमल कविताएं!

**

कैसी होंगी वेः

कैसे रहे होंगे उनके सपने-

पराये-अपने सभी रहे होंगे मौजूद

उन कविताओं में ?

**

नहीं!

माँ का वियोग रहा होगा प्रमुख

बाल-स्मृति में

देखी होंगी सौ-सौ भंगिमायें

विस्मृति में-

कई-कई बार सुनी होगी

अज्ञात दिशा से

माँ की स्नेहिल पुकार-

मेरे चाँद यहाँ हूँ मैं,

यहीं तेरे पास-एकदम पास!

बालक हुआ होगा विस्मित

फिर उदास!

सुनकर माँ का स्वर..

**

माँ-पुचकारती दुलारती इठलाती

बेटे के हुनर पर इतराती

लेती सौ-सौ बलाएं!

सफल जीवन की देती दुआएँ

फिर आयी होगी याद

दुत्कार पिता की

ख़फ़ा थे जो बहुत

देखकर कविताएं

नन्हें कवि की

**

किया होगा विमर्श जरूर

दुनियादार मित्रों से

मिली होगी नसीहत-

बिन माँ का बच्चा

और कविताएं ?

हुजूर मुआफ करें-

होनहार बालक और

कच्ची उम्र में वैराग्य-

यूँ तो डिप्टी-कलेक्टरी का सपना

बस रह जायेगा दुसाध्य!

सख्ती बरतो, बुढ़ापा संवारो

बालक को इस रोग से उबारो

एक तो बच्चा नादान

तिस पर ऐसे इल्म की हवा?

**

भला शाइर-कवि की भी

जिन्दगी है कोई

घर-न-द्वार

न चुल्हा-रसोई!

हमें तो लगता है

लड़का हाथ से गया?

तारीफ सिंह का भाग्य

जानो बंजर ही रहा..!

**

आज

शमशेर के उसी घर में

बैठी है एक वृद्धा

निचुड़े स्तन लटकाये

भादों की तपती दोपहरी में

एक आस लिए-

शायद फिर जन्मेगी

वही महान आत्मा

फिर निसरेगा दूध

ऐलम की बुढ़िया के

सूखे स्तनों में..

(सितम्बर 1993)

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