प्राचीन कंबोज महाजनपद के इतिहास के झरोखे से
प्राचीन कंबोज महाजनपद और महिला सशक्तिकरण: एक समीक्षा
डॉ. रामजीलाल
प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि कंबोज जाति का इतिहास सर्वाधिक पुराना है तथा महा भारत काल में कंबोज उत्तरापथ एक शक्तिशाली महाजनपद (गणराज्य) था. प्राचीन भारत के प्राचीन ग्रंथो जैसे महाभारत , बौद्ध अंगत्तुर,महावस्तु , चाणक्य (कौटिल्य) के अर्थशास्त्र, पाणिनि की अष्टाध्यायी(15महाजनपदों) के अनुसार कंबोज महाजनपद प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों में से एक शक्तिशाली महाजनपद था. इसका क्षेत्र मुख्य रूप से उत्तरी -पूर्वी अफगानिस्तान (हिंदूकुश क्षेत्र), उत्तरी पाकिस्तान( हजार जिला) और कश्मीर के राजौरी (राजपुर) उत्तर- पश्चिम सीमावर्ती में स्थित था.कंबोज महाजनपद की राजधानी राजौरी (राजपुर)या नंदपुर थी.कंबोज जाति के लोग सुंदर,असाघारण बहादूर यौद्धा,युद्ध कौशलता, घुड़सवार सैनिक,व्यापार लिए प्रसिद्ध थे.उनका मुख्य व्यवसाय कृषि व गांय ,बैल,घोड़े इत्यादि,पशुओं के पालन व घोड़ों व कंबल का व्यापार था. वेदों और महाभारत के अनुसार कंबोज बहुत सुंदर थे तथा उनके पास बहुत बेहतरीन श्र्वेत घोड़े थे. महाभारत के युद्ध में महाराजा सुदक्षिण कंबोज अपनी बहन भानुमति जो दुर्योधन की महारानी थी के मान-सम्मान व सुरक्षा हेतु कौरवों के साथ 6,000 घुड़सवारों, सुनहरे रथों और श्र्वेत घोड़ों की सेना की कमान संभालते हुए कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन के विरूद्ध लड़ते हुए युद्ध के तेरहवें दिनवीर गति को प्राप्त हए. राजा सुदक्षिण की मृत्यु के पश्चात उनकी माता और कंबोज महाजनपद की राजमाता महारानी सुदर्शन कंबोज ने कंबोज महाजनपद की सत्ता संभाली व शासन किया. एक और ऐतिहासिक नाम महारानी कृपा कंबोज का है. जब कंबोज और सिकंदर के बीच लड़ाई में उनके पति और पुत्र वीरगति को प्राप्त हुए तो उस समय सेना की कमान संभाली और युद्ध क्षेत्र में सेना का नेतृत्व किया था.
प्राचीन कंबोज महाजनपद -महिला सशक्तिकरण विभिन्न पहलू
प्राचीन कंबोज महाजनपद में महिला सशक्तिकरण के विभिन्न पहलुओं का वर्णन निम्नलिखित है:
सामाजिक: कंबोज महाजनपद के पुरुष और महिलाएं शैव रीति-रिवाजों का पालन करते थे, जो मुख्य धारा के वैदिक सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के बिल्कुल विपरीत थे. कंबोज महाजनपद में शैव रीति-रिवाज धार्मिक और सामाजिक जीवन का सबसे ज़रूरी हिस्सा थे व इनका पालन सख्ती से किया जाता था. गायों को पालना और देवी-गौ माता की तरह पूजा करना, और गाय माता की रक्षा के लिए वे कोई भी बलिदान दे सकते थे. एक और उल्लेखनीय और पवित्र परंपरा रक्षा बंधन का उत्सव है, जो बहनों के प्यार, सम्मान और सुरक्षा को दर्शाता है. कंबोज महाजनपद में स्त्रियों पर वैदिक धर्म के कर्मकांडों के कठोर बंधन नहीं थे. क्योंकि कंबोज प्रारंभ में मुख्य धार से संबंधित वैदिक संस्कृति की अपेक्षा शैव परम्पराओं को मानते थे. महिलाओं को शिक्षा और अपना पति चुनने का अधिकार था. स्वयंवर या गंधर्व विवाह तथा अंतर्जातीय विवाह प्रचलित थे. अंतर्जातीय विवाह शाही परिवारों के बीच वैवाहिक संबंधों का मुख्य उदाहरण सुदक्षिण कंबोज की बहन, भानुमती, राजा चित्रांग कंबोज और महारानी चंदेरा मुद्रा की बेटी, का दुर्योधन से विवाह था. पाणिनि व अन्य ग्रंथों के अनुसार कंबोज महिलाएं पर्दा प्रथा से मुक्त होने के कारण सार्वजिक जीवन में सक्रिय सहभागिता निभाती थी. पितृसत्तात्मक व्यवस्था के बावजूद भी कम्बोज महिलाएँ अपने घरों की स्वामी थीं और स्वतंत्र सार्वजनिक निर्णय लेने की शक्ति रखती थीं।
2.रक्षाबंधन का त्यौहार: प्राचीन कंबोज महाजनपद में रक्षाबंधन का त्यौहार सर्वोतम माना जाता था . इस दिन बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधती थी और यह वचन लेती थी कि आज के दिन हथियार नहीं उठाए जाएंगे तथा यह खून -खराबे की अपेक्षा शांति प्रेम व अहिंसा का त्यौहार था . रक्षा बंधन का उत्सव बहनों- भाइयों के प्यार, सम्मान और सुरक्षा को दर्शाता है. ऐसा माना जाता है कि दसवीं सदी में कंबोज पाल वंश ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया . परंतु लोक कथाओं के अनुसार गौड़ सेना ने रक्षा बंधन के दिन कंबोज सेना को घेर लिया .परंतु रक्षा बंधन के वचन को सर्वोपरि मानते हुए कंबोज सेनापति हथियार न उठने ऐतिहासिक भूल कर गए .युद्ध की रणनीति व कूटनीति के अनुसार वचन बद्धता व घर्म को देश घर्म की अपेक्षा प्राथमिकता देने कारण हार गए और इसके पश्चात कंबोज सेनापतियों ने रक्षा बंधन का परित्याग कर दिया. कुछ कंबोज क्षेत्रों व गोत्रों में यह परंपरा आज भी जारी है .
3.आर्थिक : कंबोज महाजनपद व्यापार के लिए बहुत अधिक प्रसिद्ध था. मध्य एशिया व कंबोज महाजनपद के व्यापारिक संबंध होने के कारण कंबोज महिलाएं ऊन,कंबल ,पशु पालन विशेषतौर पर गायों व घोड़ों के पालन की माहिर थी. कंबोज महाजनपद के अश्व सफेद रंग के साथ-साथ अधिक शक्तिशाली व फुर्तीले होंने के कारण भारत के विभिन्न महाजनपदों व मध्य ऐशिया के शासकों की सवार्धिक पंसद थे . इसके परिणामस्वरूप प्राचीन कंबोज महाजनपद में महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई और आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई.
4.सैनिक :
पाणिनि के समय में कंबोज महाजनपद में एक रिपब्लिकन राज्य था.कंबोज एक क्षत्रिय य़ोद्धा समाज होने के कारण महिलाएं सेना में सक्रिय भाग लेती थी तथा वे जिम्नास्टिक, तीरंदाजी, घुड़सवारी और युद्ध के मैदान में सेनाओं का नेतृत्व करने में अत्यधिक कुशल थी. जातक कथाओं में एक ‘कंबोज महिला सभा’ का भी ज़िक्र है, जिसके ज़रिए राज्य-कम्बोज महाजनपद -की रक्षा और युद्ध की रणनीति के बारे में फ़ैसले लिए जाते थे. कंबोज महिला सभा’ सेनाओं के कमांडरों के चयन में भी भाग लेती थी. यह कहना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि आज भी पूरी दुनिया में ऐसी कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है. वह कंबोज रानियों की बहादुरी वाली परंपराओं से जुड़ी हैं, जहाँ रानियों के पास युद्ध कौशल और प्रशानिक कला दोनों थे, उन्होंने युद्ध में अपने पति की मौत के बाद राज्य पर सफलतापूर्वक शासन किया, और कमांडर के तौर पर युद्ध के मैदानों में सेनाओं का नेतृत्व भी किया(झा 1942; रॉलिंसन 1912; शर्मा 1970; टार्न 1948). महत्वपूर्ण नाम रानी कृपा कंबोज का है. उनके पति और बेटे’’ कंबोज बनाम सिकंदर’’ की लड़ाई में मारे गए थे. रानी कृपा कंबोज ने कमांडर के तौर पर युद्ध के मैदानों में 30,000 घुड़सवार,38,000 पैदल,30 हाथियों,व 7,000 भाड़े के सैनिकों नेतृत्व किया.
संक्षेप में, प्राचीन काल में कंबोज महिलाएं सिर्फ घर तक सीमित नहीं थी अपितु वह ऋषिका (अपाला कंबोज), रूपवान , योद्धा ,कूटनीतिक व व्यापारी के रूपों में भी थी. महाभारत के अनुसार कंबोज स्त्री और पुरुष दोनों ही “परम रूपवान” थे.यूनानी लेखकों के अनुसार उत्तर पश्चिम कबीलों की महिलाओं – कंबोज महाजनपद -की महिलाओं को “अन्य भारतीय की महिलाओं से अधिक स्वतंत्रता” प्राप्त थी.महाभारत और बौद्ध धर्मग्रंथों में युद्ध कला में महिलाओं की भागीदारी और उनकी आर्थिक भागीदारी का उल्लेख है. पर्दा प्रथा के अभाव के कारण स्वाभिमान एवं आत्मनिर्भरता काम्बोज महिलाओं के जीवन के प्रमुख गुण थे। पितृसत्तात्मक समाज होने के बावजूद भी महिला सशक्तिकरण का सबसे अच्छा उदाहरण कंबोज महाजनपद में मिलता है.
