अपने विचार

अपने विचार

– मंजुल भारद्वाज

 

हम सब हमेशा बोलते हैं यह मेरे विचार हैं। मेरे विचार में ऐसा हो सकता है। मेरा विचार है…आदि आदि…

पर क्या यह सही में अपने विचार होते हैं या हम स्थिति अनुसार पहले से प्रचलित विचार को अपना लेते हैं। अपनी सुविधा, तर्क, स्थिति के अनुसार प्रचलित विचारों का एक गुलदस्ता अपने पास रख लेते हैं और भ्रम पालते हैं कि यह मेरे विचार हैं।

सबके अपने विचार हैं तो आज ट्रंप से जुमलेबाज तक विकारी लोग सत्ता पर काबिज़ क्यों हैं? शोषण क्यों है? ग़रीबी क्यों हैं? मुफलिसी क्यों है? अत्याचार क्यों है? नस्ल ,वर्ण,वर्ग भेद क्यों हैं? जबकि विचार तो इन सब से मुक्त करता है!

दरअसल विचारों के परजीवी हैं हम ! महान विचारकों के भक्त हैं ! उन महान विचारकों के वाहक हैं। जिसे हम वाद कहते हैं। वाद का अर्थ है विचारों को मानने वालों का देश,समाज,समूह,पार्टी , संगठन आदि आदि …

जब विचार वाद में परिवर्तित हो जाता है तब वो परंपरा का रूप अख्तियार करता है। परम्परा धीरे धीरे जड़ हो जाती है। परम्परा का मतलब है चैतन्य विलुप्त कर्मकांड!

हम इतने मूढ हैं कि परम्परा को भी विचार मानते हैं। हम कभी यह विचार ही नहीं करते कि विचार का अर्थ क्या है?

विचार का अर्थ है सुविधा, दुविधा,चुनौती ,संकट आदि में सत्ता अनुकूलन को सवाल करना ! प्रश्न उठाना !

लेकिन जब विचार का वाद बन जाता है तब वाद पर सत्ता बनती है। जब वाद पर सत्ता बनती है तो वो विचार को छोड़ वाद को जपती है और विचार कहीं कोने में सिसकता रहता है!

दरअसल विचार जन्मता है वर्षों में जब कोई सुविधाओं को छोड़ चुनौतियों को मथता है। सवालों को मथता है सतत, लगातार …
सवालों को मथने का मतलब यह नहीं है कि हर आयाम, पहलू या विचार को नकार दो , सवालों को मथने का अर्थ है सत्ता अनुकुलन से जन्म ले रही जड़ता को तोड़ना । जब आप जड़ता को तोड़ते हो तब कहीं विचार की एक हल्की सी कल्पना आपके मस्तिष्क में कौंधती है जिसको यथार्थ के, व्यवहार के धरातल पर आजमाना और परखना होता है। जब विचार की कल्पना यथार्थ के धरातल पर खरी उतरती है, दुनिया को सत्य का अहसास कराती है तब कहीं विचार जन्मता है!

आओ अपने विचार के भ्रम जाल से निकल कर विचार को सृजित करें!

लेखक के अपने विचार हैं।

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