सईद मिर्ज़ा की पांच फ़िल्में

सामाजिक सिनेमा

सईद मिर्ज़ा की पांच फ़िल्में

बालेंदु शेखर मंगलमूर्ति

 

कल से सईद मिर्ज़ा की पांच फ़िल्में देखीं।

अरविन्द देसाई की अजीब दास्तान!

फिल्म शहर में युवा वर्ग के बेमकसद जिए चले जाने और इसका हर्ज़ाना चुकाने की दास्ताँ है। पर दिक्कत तो ये है कि अरविन्द देसाई का मार्क्सिस्ट दोस्त जो कॉलेज में पढ़ा रहा है और जिसकी जिंदगी करीने से सजी दिखती है और जो अपने कदम को प्लान करता है, से जब अरविन्द देसाई पूछता है इस बारे में तो एक ऐसे युवा की तस्वीर उभर कर सामने आती है जिसके विचारों और काम में साम्यता नहीं है और वो वर्तमान व्यवस्था में खुद को घुटा पाता है।

अल्बर्ट पिंटू को गुस्सा क्यों आता है?

अल्बर्ट पिंटो एक मेकैनिक है और उसका पिता बॉम्बे के कॉटन मिल में काम करता है। अल्बर्ट पिंटो का ख्याल है कि अगर कड़ी मेहनत की जाए तो जीवन में सब कुछ हासिल किया जा सकता है। वो हड़ताल आदि को बदमाशों का काम मानता है और उसे लगता है कि अमीर कार वाले कस्टमर्स उसके दोस्त हैं। पर जब हक़ीक़त से उसका वास्ता पड़ता है तो उसकी विश्वास की दीवार दरक जाती है और वो चीजों को नए दृष्टिकोण से देखने को बाध्य होता है।

इस फिल्म में बॉबे मिल स्ट्राइक की छाया स्पष्ट रूप से है। इस दौर में बनने वाली मेनस्ट्रीम की फिल्मों ने बॉम्बे शहर के चरित्र को बदल कर रख देने वाली इस महत्वपूर्ण घटना को लगभग नज़रअंदाज़ किया है।

मोहन जोशी हाज़िर हों!

एक बेहद खूबसूरत अंदाज़ में बनी फिल्म जिसमे वकील की भूमिका में नसीर, तो बिल्डर की भूमिका में नसीर, प्रमोटर की भूमिका में पंकज कपूर और सबसे बढ़कर बदहाल चॉल में किरायेदार मोहन जोशी और उनकी पत्नी की भूमिका में भीष्म साहनी ( आह, कितने अच्छे अभिनेता थे ह्यूमनिस्ट राइटर !) और दीना पाठक। व्यवस्था का क्रूर हास्य! कानून, जो न्याय का माध्यम होना चाहिए, वह खुद एक प्रदर्शन बन जाता है।

सलीम लंगड़े पर मत रो !

देश में मुस्लिम युवाओं की उम्मीदें, निराशाएं, पैरों में जंजीरे और उड़ना चाहें तो गिलास सीलिंग- सपनों और निराशाओं के बीच बिखर जाने वाले सलीम लंगड़े की कहानी है। एक बार फिर फिल्म में बॉम्बे मिल स्ट्राइक एक पावरफुल बैकग्राउंड इन्फ्लुएंस की तरह है। जब सलीम के पिता की नौकरी चली जाती है।

नसीम!

नसीम का मतलब क्या होता है? पोती हमेशा बिस्तर पर पड़े रहने वाले बीमार दादा से पूछती है, तो दादा ( कैफ़ी साहब ने कितनी खूबसूरती से अभिनय किया है !) कहते हैं, सुबह की हवा को नसीम कहते हैं, जो बेहद खूबसूरत होती है अपनी तासीर में,। तुम हो नसीम।

दादा अपनी पोती को कहानियां सुनाते हैं। देश बदल रहा होता है, रामजन्मभूमि आंदोलन जोर पकड़ रहा है। देश की हवा खराब हो रही है। सांप्रदायिक माहौल ख़राब हो रहा है। दादा पुराने जमाने के इंसान हैं जब देश ऐसा ध्रुवीकरण नहीं देख रहा था, चुनौतियाँ उस समय भी थीं, पर एक सांझा सपना भी था, एक उम्मीद भी थी।

इस ख़राब होते माहौल में बेटा पूछता है, पार्टीशन के समय आप पाकिस्तान क्यों नहीं चले गए थे?
पिता ( नसीम के दादा) कहते हैं, आगरा में हमारे घर के आँगन में एक पेड़ हुआ करता था। मुझे वो बेहद पसंद था। तुम्हारी अम्मी को भी बेहद पसंद था।
बेटा चुप हो जाता है।

नसीम अपने दादा से पूछती है: क्या सिर्फ एक पेड़ की वजह से !

ये एक छोटा सा संवाद राष्ट्र, डिस्प्लेसमेंट, आम इंसान की जड़ों से जुड़ाव ( जिसके लिए बड़ी बातों का उतना महत्त्व नहीं है, जिसके भावनात्मक लगाव, मिटटी से जुड़ाव बेहद मामूली स्तर हैं, जिसकी समझ बड़े बड़े राजनीति शास्त्र के पंडितों की बुद्धि से बाहर हो सकती है। ) पर एक बेहद गंभीर टिप्पणी है।

माहौल ख़राब होता जाता है। 6 दिसंबर को अयोध्या में मस्जिद गिरा दी जाती है। देश की खूबसूरत आत्मा में यकीं करने वाले नसीम के दादा के लिए बेहतर था ये दिन न देखते। इसी दिन उनका देहांत हो जाता है।

नसीम याद करती है अपने दादा को। एक मर्तबा उनकी कही बात को। दादा, आसमान का रंग नीला क्यों होता है? दादा की बात सुनकर नसीम हंसी थी। ओह आप कितने unscientific हैं! दादा ने कहा था, आसमान का रंग नीला हो, पीला हो क्या फर्क पड़ता है, असल चीज है मुस्कुराना। तुम मुस्कुरायी, ये जरुरी है।

दादा का कमरा खाली है। दादा इसी कमरे के बिस्तर पर लेटे लेटे उसे कहानियां सुनाया करते थे। नसीम अपने दादा की बात याद करके हलके से मुस्कुरा देती है।

फिल्म देखते हुए मैं सोच रहा था, हम किस तरह की कहानियों के साथ बड़े होते हैं, ये हमारे व्यक्तित्व निर्माण को निर्णायक रूप से प्रभावित करता है। स्कूलों में नैतिक शिक्षा का अध्ययन ख़त्म कर दिया गया है। इसका खामियाजा एक जनरेशन भुगत रही है। कहानियां जो हमारे दादा, नाना, दादी नानी, माँ के पास हैं, उन कहानियों का हमारे बाद हमारे बच्चों तक हस्तांतरित किया जाना चाहिए। नसीम में दादा जो कहानियाँ सुना रहे हैं, वह सिर्फ nostalgia नहीं है, वह एक नैतिक ढाँचा बना रही हैं।

बालेंदु शेखर मंगलमूर्ति के फेसबुक वॉल से साभार 

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