कविता
आज का दौर
रणबीर सिंह दहिया
दुनिया की क्या हालत हो गई बाजार चारों ओर छाया।।
भैंस बंधी है घर घर में पर दूध ढोलों के अंदर पाया।।
1
दूध बेच भैंसों का लोग गांव के करते हैं आज गुजारे
लुप्त हो गए घरों से आज घी के जो हुआ करते बारे
थोड़ा साँस आया करता आज घूटन मानते हैं सारे
महिलाओं के अनीमिया ने फिर से जोर के डंक मारे
बाजरे की खिचड़ी गौजी का आज जोड़ा तोड़ बगाया।।
2
पहले भाई चारा था छोरे बहू लेने आया करते
जिब रोटी जिम्मन बैठते खांड बूरा खाया करते
पड़ौसी दूध के बखौरे बटेऊ वास्ते ल्याया करते
दूजे का बटेऊ पड़ौसी आंखों पे बिठाया करते
बैठे रहते फूंक बुढ़िया सी अब अपना ही बटेऊ ना भाया।।
3
आबो हवा मैं जहर घुला कीटनाशक छागये हैं
युवा के नर्वस सिस्टम पे दोष गुस्से का लागये हैं
पेट को पकड़े घूम रहे डॉक्टर भी हाथ ठागये हैं
हमारी कष्ट कमाई को ये अमीर क्यों खागये हैं
टैस्ट क्यों नहीं होते मैडीकल मैं नहीं किसी ने कष्ट उठाया।।
4
किलो दूध मिले पचास का उसमें आधा पानी पावे
महंगाई के क्या कहने कोई क्या खाएं क्या नहीं खावे
कुपोषण बालकों में आज दिन दिन क्यों बढ़ता जावे
बाजार व्यवस्था दोषी है पर दोष क्यों कोई नहीं लावे
राम की इच्छा कैहकर रणबीर हमारा क्यों मोर नचाया।।
