छिप गया वह सुंदर मुख : ओम प्रकाश वाल्मीकि

(30-6-1950 — 18-11-2013)

संस्मरण:

 

छिप गया वह सुंदर मुख : ओम प्रकाश वाल्मीकि

ओमसिंह अशफ़ाक

 

ओम प्रकाश वाल्मीकि जी से मेरी मुलाकात सिर्फ तीन बार हुई। लेकिन फोन पर चार-पाँच बार की बातचीत ने हमारे बीच काफी आत्मीयता पैदा कर दी थी।

बल्कि उससे भी पहले ‘जूठन’ पढ़ते हुए ही इस आत्मीयता और घनिष्ठता की बुनियाद पड़ चुकी थी।

कुछ यूँ हुआ कि उनकी आत्मकथा पढ़ते हुए मैं बेहद पिघल गया था—पढ़ता गया, रोता गया और उनके बचपन और स्कूली जीवन से गुजरते हुए अपने बचपन से भी पुनः साक्षात्कार करता गया।

अपने बालमन पर चढ़े पारिवारिक-सामाजिक संस्कारों का स्मरण-विस्मरण करता रहा।

‘जूठन’ से ही मुझे समझ आया कि हमारे व्यक्तित्व के निर्माण में हमारे परिवेश की कैसी भूमिका होती है और किस तरह असामाजिक, अस्वाभाविक और अमानवीय व्यवहार भी हमें स्वाभाविक लगने लगते हैं।

यहाँ तक कि बच्चों की पिटाई भी हमें स्वाभाविक लगने लगती है।

हम सभी बचपन में बड़ों से और माँ-बाप से पिटते रहे ही हैं। डांट-डपट तो बात-बात पर या बिना-बात भी होती रहती थी और हमारे मन ने मान लिया था कि यही कुदरती ढंग होता है?

बालक में इतनी विश्लेषणात्मक बुद्धि कहाँ से आती? वह तो उम्र बढ़ने पर अनुभव जगत के विस्तार से ही हासिल हो सकती है। सो बाद में थोड़ी बहुत हुई भी होगी?

लेकिन मुझे लगता है कि ‘जूठन’ के अध्ययन के दौरान ही मेरे व्यक्तित्वान्तरण(transformation) की प्रक्रिया शुरू हुई और इसके अध्ययन ने ही मुझे “न्याय, समानता और स्वतंत्रता” की जरूरत का अहसास कराया। अन्याय-उत्पीड़न के प्रति आक्रोश तथा अन्यायी और उत्पीड़क के प्रति घृणा के भाव का संचार किया था।

वाल्मीकि के व्यक्तित्व का निर्माण किन परिस्थितियों में हुआ था, उसके कुछ साक्ष्य उनकी आत्मकथा में भी मिल जाते हैं:

‘चारों तरफ गंदगी भरी होती थी। ऐसी दुर्गंध कि मिनट भर में सांस घुट जाए। तंग गलियों में घूमते सूअर, नंग-धड़ंग बच्चे, कुत्ते, रोजमर्रा के झगड़े, बस यह था वह वातावरण जिसमें बचपन बीता।

‘इस माहौल में यदि वर्ण-व्यवस्था को आदर्श व्यवस्था कहने वालों को दो-चार दिन रहना पड़ जाए, तो उनकी राय बदल जाएगी।’

खैर, मुझसे रुका नहीं गया और रोते-रोते मैंने वाल्मीकि जी को एक पोस्टकार्ड लिख डाला।

उस स्थिति में क्या-क्या लिखा गया, स्पष्ट तौर पर याद नहीं, परंतु एक बात जरूर याद है

कि—’वाल्मीकि जी, मैं आपको साथ लेकर एक बार बरला गाँव में जाना चाहता हूँ और उन जगहों और महानुभावों को देखना-मिलना चाहता हूँ।

‘उनसे पूछना चाहता हूँ कि उन्होंने आपके साथ इतना क्रूर-व्यवहार क्यों किया और क्या वे किसी रूप में आज इसका प्रायश्चित करना चाहते हैं या अभी भी अपने उन्हीं अन्यायकारी-उत्पीड़क विचारों पर अड़े हैं?..

‘यदि हाँ तो कृपया त्यागी-बंधुओं और मान्यवर चौधरियों, वैसी ही यातनाएं मुझे भी दे दो, ताकि मैं इस अपराध-बोध से मुक्त हो सकूँ, जो मुझे चैन से सोने नहीं देता है..

क्योंकि आज भी आपका तो मैं कुछ बिगाड़ नहीं सकता हूं। एक मामूली आदमी- वह भी एक निरीह लेखक उनका भला क्या बिगाड़ सकता है? सामंती, जातिवादी व्यवस्था तो आज भी बदस्तूर जारी है।

वाल्मीकि जी ने सही ही लिखा है—’दलित-जीवन की पीड़ाएं असहनीय और अनुभव-दग्ध हैं। ऐसे अनुभव जो साहित्यिक अभिव्यक्तियों में स्थान नहीं पा सके। एक ऐसी समाज व्यवस्था में हमने सांस ली है, जो बेहद क्रूर और अमानवीय है। दलितों के प्रति असंवेदनशील भी।’

मुझे याद नहीं कि खत पढ़ने के बाद खुद वाल्मीकि जी का फोन आया अथवा मैंने उनको किया था, जिसमें उन्होंने बताया था कि मेरा वह ख़त उन्होंने कहीं छपवा दिया है। और अफसोस भी जाहिर किया था कि मेरा नाम भी ‘प्रूफ़ की गलती’ वश कुछ और (यानी गलत) छप गया है। खैर।

मेरा जन्म दलित जाति में नहीं हुआ था। हाँ उसे बाद में कुछ प्रदेशों में ओ.बी.सी. में जरूर शामिल कर दिया गया है।

इस जाति के पास गाँवों में खेती-बाड़ी की जमीन भी होती है। सो मेरे परिवार के पास भी थोड़ी-बहुत है।

परंतु फिर भी ये लोग सामंती, जातिवादी संस्कारों, विचारों की गिरफ़्त में ऐसे जकड़े हुए हैं कि उनके बीच में आज भी बराबरी, जातिविहीनता और अंतर्जातीय विवाह जैसे विचारों की दाल गल़नी बहुत ही मुश्किल है।

आज भी ‘ऑनर किलिंग’ जैसे कांड भी वहाँ आसानी से हो सकते हैं। होते भी रहते हैं।

‘जूठन’ पढ़ते हुए मुझे मेरे साथ कई बार घटा एक प्रसंग बहुत याद आया : हमारे परिवार के पास डंगर-ढोर ज्यादा हो गए थे और पशुचारे की कमी पड़ गई थी। मुझे प्राइमरी स्कूल से हटाकर जमना के खा़दर (रेत-दोमट का अस्थाई डेल्टा जिसमें दूब,कांस,झांऊं,पटेरा, पनियाला,नरसल आदि-इत्यादि बहुतायत में उग जाते हैं) में पशु चराने भेज दिया गया। अब मैं पाली़ बन गया था। पाल़ियों की मंडली का हेड था—सुखबिरा।

वह लगभग मेरे बाप का हमउम्र था और उसकी नज़र भी जन्म से ही काफी कमजोर थी। हमारे समाज में एक नुक़्स यह भी है कि किसी आदमी की ‘अपंगता/आंशिक-कमी’ को ही उसका “उपनाम” बना लिया जाता है? सुखबिरा भी इसका अपवाद नहीं था। वह था तो बिना-ब्याहा,परन्तु अपने घर का चौधरी भी वही था।

भैंसों की खरीद-बेच से सुखबिरे ने काफी रुपया भी जमा कर लिया था, जिससे उसका ब्याज-बंट्टे का काम भी खूब चलता था। इसलिए गांव-समाज में उसका प्रभाव और कुछ रौब-दाब भी था।

वह मुझे बार-बार दूर निकल गई भैंसों को घेरने के लिए दौड़ाता रहता था। तकरीबन 8-9 साल का बालक आखिर कितना दौड़ सकता था?

बार-बार दौड़कर मैं थक जाता और भैंस घेरने से मना करता तो सुखबिरा मुझे लालू चूहड़े के लौंडे के साथ भिड़ाने (कुश्ती कराने) की धमकी देकर ‘ब्लैकमेल’ करता था।

लालू का लौंडा बेशक मेरा हमउम्र ही था, लेकिन मुझसे तगड़ा था और वह कुश्ती में भी आसानी से मुझे पछाड़ सकता था।

मुझे कुश्ती में सिर्फ हारने का गम कम, बल्कि एक अछूत से हार जाने का डर, ग्लानि और अपमान अधिक सताता रहता था।

और इसी मारे बार-बार भैंसों को घेरने दौड़ना पड़ता था। बाकी सब पाली़ उम्र में बड़े थे और बैठे मौज-मस्ती करते रहते थे।

कहने का भाव ये है कि बचपन से ही हममें छुआछूत और ऊँच-नीच के संस्कार कूट कर भर दिए जाते हैं, जिनसे छुटकारा पाना बड़ा मुश्किल है। पूरी तरह से छुटकारा तो शायद ही कभी होता हो।

अधिकांश मामलों में तो बिल्कुल नहीं हो पाता बावजूद पढ़ने-लिखने के, क्योंकि हमारी शिक्षा पद्धति ऐसी ही थी कि इसमें अच्छा इंसान कैसे बने?

ऐसा कोई अध्याय किसी पाठ्यक्रम में पढ़ाया ही नहीं जाता था। आज भी शायद न पढ़ाया जाता हो।

यदि होता तो छुआछूत, भेदभाव, पक्षपात, जातिवाद, संकीर्णता, कट्टरता और नफरत जैसी बुरी चीजें कब की खत्म हो चुकी होतीं।

वाल्मीकि जी से फोन पर लंबी बातचीत एक बार सन 2006 में जनवरी/फरवरी माह में हुई थी। कंवल भारती द्वारा संपादित मोटी पुस्तक ‘दलित निर्वाचित कविताएं’ इतिहास बोध प्रकाशन इलाहाबाद से छपकर आई थी। उसमें वाल्मीकि जी की 12 कविताएं छपी थीं।

मैंने फोन करके उन्हें बधाई दी, लेकिन पुस्तक उनके पास तब तक पहुँची ही नहीं थी। इसलिए उन्होंने फोन पर ही छपी हुई कविताओं की फेहरिस्त पूछी।

और मैंने उन्हें 12 कविताओं के नाम—ठाकुर का कुआँ, झाड़ूवाली, दया, तब तुम क्या करोगे, शायद आप जानते हों, मेरे पुरखे, वह दिन कब आएगा, बस बहुत हो चुका, कभी सोचा है, मुट्ठी भर चावल, वे भूखे हैं और पेड़ बता दिए..।

उनके छपने का क्रम और स्थान आदि सारा विवरण भी बताया।

अन्य कवियों के नाम भी उन्होंने पूछे तो मैंने क्रमशः उनको बता दिए—सर्वश्री मलखान सिंह, जय प्रकाश कर्दम, जय प्रकाश लीलवान, एच.एन. सिंह बैचेन, मोहन दास नैमिशराय, अरुण घोष, सी.वी. भारती, सुशीला टाकभौरे और रजनी तिलक, विपिन बिहारी, नंदकिशोर, सुखबीर सिंह, मुकेश मानस, अशोक भारती, शांति यादव, कंवल भारती सरीखे 16 दलित हिंदी कवि वाल्मीकि जी के संग छपे हैं।

गुजराती, तेलुगु, बांग्ला, असमी, पंजाबी, मलयालम और मराठी भाषा की 38 कवियों की दलित कविताएं भी इसी पुस्तक में छपी हैं।

ऐसा मैंने वाल्मीकि जी को फोन पर ही बताया था। बाद में पुस्तक भी उनको मिल गई होगी।

सन 2006 का एक और प्रसंग वाल्मीकि जी से जुड़ा है।

मैंने हरियाणवी लोक-भाषा में एक लंबी कविता लिखी थी, जिसमें 40 बन्द थे (बाद में 5और जुड़कर 45 छपे हैं) जोकि दलित उत्पीड़न, आर्थिक, सामाजिक उत्पीड़न और दबंगों के उत्पीड़न से संबंधित थे।

मैंने उसको ‘न्याय चालीसा’ शीर्षक दिया था और पांडुलिपि वाल्मीकि जी के पास भेजी थी कि वे उस पर अपनी राय दें और फ्लैप के लिए टिप्पणी भी लिख दें।

उन्होंने सार्थक टिप्पणी भी लिखी और सलाह दी कि कविता को ‘चालीसा’ का नाम न दें। उससे ‘हनुमान चालीसा’ जैसा भाव ध्वनित होगा।

उनकी सलाह वाजिब थी। मैंने पुस्तक और कविता का शीर्षक ‘जब इंसाफ कहीं न होता हो’ उपशीर्षक ‘अन्याय गाथा’ कर दिया था।

वाल्मीकि जी से तीन बार साक्षात मुलाकात हुई—एक बार मधुबन (करनाल) पुलिस अकादमी में डिनर पर। वहीं पता चला कि उन्हें बिरयानी बहुत पसंद है और तब तक मैंने बिरयानी कभी देखी भी नहीं थी। दलित चिंतक, लेखक डॉ. सुभाष चन्द्र भी उस डिनर में हमारे साथ ही थे।

1 दिसंबर, 2010 को दूसरी बार उनके साथ डिनर का मौका देहरादून में मिला।

कुरुक्षेत्र से एक प्राध्यापक मित्र के बेटे की बारात देहरादून जानी थी और मेरा नाम बारातियों की सूची में शामिल था। चलने का प्रस्ताव आ गया तो मैंने शर्त रखी कि मेरा एक मित्र देहरादून मंर है, उसे सपरिवार बारात में शामिल करने की अनुमति हो तो मेरा चलना संभव हो सकता है।

बारात जाटों की थी। इसके लिए मैंने मित्र का नाम और जाति का भी खुलासा कर दिया था। शुक्र है कि लड़के वालों ने मंजूर कर लिया तो हम भी बारात में देहरादून पहुंचे।

वाल्मीकि जी को पहले से ही फोन कर रखा था और सारी स्थिति बता रखी थी। वहाँ पहुँच कर फोन किया और उनकी नई पुस्तक ‘अब और नहीं’ लेते आने का आग्रह भी।

वाल्मीकि जी थोड़ी विलम्ब से पहुँचे और हमने पहले अपनी-अपनी किताबों की अदला-बदली की, फिर कुछ ‘स्नैक्स’ वगैरह खाए।

ड्रिंक से उन्होंने उस दिन मना कर दिया क्योंकि उनके साथ एक बच्ची भी थी (शायद श्रीमती चन्दा की भांजी) और उन्हें डिनर के बाद उसको छोड़ने उनके घर जाना था। श्रीमती चन्दा दोनों बार उनके साथ ही थीं।

तीसरी मुलाकात शायद 14-15 अप्रैल 2012 (सही समय याद नहीं) कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में सीनेट हाल में दलित साहित्य पर आयोजित एक कार्यक्रम में हुई थी।

वाल्मीकि जी सपत्नीक वहां उपस्थित थे। राजेंद्र बड़गुजर ने दलित लोक-गायक दयाचंद मायना (सांगी) की रागनियों की पुस्तक का विमोचन उनके हाथों से कराया था।

बाद में पुस्तक पर बोलते हुए उनका आक्रोश भी झलका कि जिस ग्रंथावली का उनसे विमोचन कराया गया है, उसकी अनेक रागनियों में सांप्रदायिक विचारों और मूल्यों की भरमार है।

उन्होंने अफसोस सा प्रकट किया कि ऐसे ग्रंथ का विमोचन उनके हाथों से हो गया है।

हालांकि राजेंद्र बड़गुजर ने हाल ही में हमें बताया है कि दरअसल दयाचंद मायना को पं. लक्ष्मीचंद समझ कर वह उक्त टिप्पणी कर गए थे। मायना की रचनाएं उन्होंने पढ़ी ही नहीं थीं।

अब यह बात तो रहस्य ही बनी रहेगी कि वाल्मीकि जी किस वजह से नाराज और उत्तेजित हुए थे।

कुछ साल पहले महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी रोहतक में भी ओम प्रकाश वाल्मीकि जी को किसी संस्था द्वारा बुलाया गया था। वह मंच पर मौजूद थे और वहाँ दलित साहित्य पर विमर्श चल रहा था।

उन्होंने बहस सुनते हुए आक्रोश प्रकट किया कि वहाँ पर वक्ता बिना उनके साहित्य को पढ़े ही अधिकारपूर्वक असंगत टिप्पणी कर रहे हैं।

वहाँ काफी हंगामा खड़ा हो गया था। इस प्रकरण बारे वाल्मीकि जी ने मुझे फोन पर विस्तार से उस घटना बारे खुद ही बताया था।

वाल्मीकि जी संवेदनशील, ऊर्जावान, मेधावी, प्रखर लेखक तो थे ही, वह समर्पित अभिनेता-नाटककार भी थे।

उन्होंने 69 से अधिक नाटकों में अभिनय किया। कई नाटकों में पति-पत्नी दोनों ने साथ काम किया। अनुवाद और आलोचना में भी उन्होंने हाथ आजमाया था।

परंतु उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ को सर्वाधिक ख्याति मिली और रचनात्मक साहित्य में वह मील का पत्थर बन गई, जिसका देशी-विदेशी अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। कई पाठ्यक्रमों में उनकी रचनाएं शामिल हुई हैं।

अपने 63 साल के सीमित जीवन में साहित्य जगत में उन्होंने बहुत ख्याति प्राप्त की। उनका व्यक्तित्व बहुत आकर्षक था और लेखन की भाषा भी खूब परिष्कृत है।

फिर भी वह लोक भाषा से प्यार करते थे और उसकी खुलकर सराहना करने में संकोच नहीं करते थे। उनकी बीमारी की सूचना मुझे प्रेस से मिली, जिसमें इलाज के लिए आर्थिक सहयोग की अपील भी थी।

मैंने जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव चंचल चौहान को फोन किया और आर्थिक सहायता तथा उपयुक्त चिकित्सा जुटाने में मदद की गुज़ारिश की।

चंचल ने बताया कि वे प्रतिनिधि मंडल लेकर कांग्रेस के बड़े नेता हरीश रावत और दिल्ली में साहित्य अकादमी के पदाधिकारियों से मिल चुके हैं। धन का इंतजाम शीघ्र हो जाएगा और अच्छे अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है।

फिर फोन किया तो उन्होंने बताया कि पाँचेक लाख रुपये की सहायता का प्रबंध हो गया है और इलाज चल रहा है। बाद में फोन किया तो चंचल ने बताया कि वाल्मीकि जी पुस्तक मेले में मिले थे। प्रसन्नचित्त दिख रहे थे।

आशा करते हैं कि संकट टल गया है और वे शीघ्र पूर्ण स्वस्थ हो जाएंगे। इस बात का आभास नहीं था कि वह हमें छोड़कर इस तरह चले जाएंगे।

उनसे अंतिम समय में न मिल पाने का अफसोस हमेशा मन में रहेगा। बहरहाल 19 नवम्बर 2013 को दिल्ली में डिफेंस कॉलोनी में उनकी शोक सभा में शामिल हुआ।

उनकी अनुपस्थिति साहित्य जगत को देर तक सालती रहेगी, क्योंकि उनकी रचनाओं में जीवन धड़कता है। इसके नमूने ‘जूठन’ में भी सब जगह बिखरे पड़े हैं। पाठक कुछ नमूने यहाँ भी पढ़ सकते हैं।

‘अस्पृश्यता का ऐसा माहौल कि कुत्ते-बिल्ली, गाय-भैंस को छूना बुरा नहीं था लेकिन यदि चूहड़े का स्पर्श हो जाए, तो पाप लग जाता था। सामाजिक स्तर पर इंसानी दर्जा नहीं था। वे सिर्फ जरूरत की वस्तु थे। काम पूरा होते ही उपयोग खत्म। इस्तेमाल करो, दूर फेंको।’

‘त्यागियों के बच्चे ‘चूहड़े का’ कहकर चिढ़ाते थे। कभी-कभी बिना कारण पिटाई भी कर देते थे। एक अजीब-सी यातनापूर्ण जिंदगी थी, जिसने मुझे अंतर्मुखी और चिड़चिड़ा, तुनकमिजाज बना दिया था।

स्कूल में प्यास लगे तो हैंडपम्प छूने पर बवाल हो जाता था।

लड़के तो पीटते ही थे। मास्टर लोग भी हैंडपम्प छूने पर सजा देते थे।

तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते थे, ताकि मैं स्कूल छोड़कर भाग जाऊँ और मैं भी उन्हीं कामों में लग जाऊँ, जिनके लिए मेरा जन्म हुआ था। उनके अनुसार, स्कूल आना मेरी अनाधिकर चेष्टा थी।’

‘मेरी ही कक्षा में राम सिंह और सुखवन सिंह भी थे। राम सिंह जाति में चमार था और सुक्खन सिंह झींवर। राम सिंह के पिता जी और माँ खेतों में मजदूरी करते थे। सुक्खन सिंह के पिता जी इंटर कॉलेज में चपरासी थे। हम तीनों साथ-साथ पढ़े, बड़े हुए, बचपन में खट्टे-मीठे अनुभव समेटे थे। तीनों पढ़ने में हमेशा आगे रहे,’

लेकिन जाति का छोटापन कदम-कदम पर छलता रहा।’

‘हेडमास्टर ने लपककर मेरी गर्दन दबोच ली थी। उनकी उँगलियों का दबाव मेरी गर्दन पर बढ़ रहा था। जैसे कोई भेड़िया बकरी के बच्चे को दबोच कर उठा लेता है।

कक्षा से बाहर खींच कर उसने मुझे बरामदे में ला पटका। चीखकर बोले, “जा लगा पूरे मैदान में झाड़ू…नहीं तो गांड में मिर्ची डाल के स्कूल से बाहर काढ़ (निकाल) दूँगा।”

अब हम संविधान की चाहे जितनी कसम खाएँ। हर साल डॉ. अंबेडकर की जयंती मनाएँ, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता दिख रहा है।

ओम प्रकाश वाल्मीकि की पीढ़ी भी वही कुछ झेल रही है, जो कुछ अंबेडकर साहब ने भुगता था। जैसा कि हमें वाल्मीकि की आत्मकथा पढ़कर पता चल जाता है।

लेकिन समाज में अन्य जातियों में भी एक ऐसा नौजवान शिक्षित वर्ग पैदा हुआ है, जिससे हमारी साक्षात भेंट वाल्मीकि जी के इलाज के दौरान होती है।

इन शिक्षित नौजवानों ने किस तरह अंतिम समय में उनके मन के सब क्लेश और कड़वाहट धो डाली थी। यह हमें खुद वाल्मीकि जी के अंतिम संस्मरण पढ़कर पता चला:

हम इस पीढ़ी के इन होनहार नौजवानों पर गर्व किए बिना नहीं रह सकते हैं, क्योंकि ये ही वो लोग हैं, जो समाज परिवर्तन के आंदोलन के वाहक बन सकते हैं।

‘मैंने चंदा से कहा, “देखो तुम परेशान रहती थी कि हमारा कोई अपना बच्चा नहीं है, ये बच्चे जो इस वक्त जाति-पाति भूल कर जिस तरह मेरी सेवा कर रहे हैं, क्या हमारे अपने बच्चे इतने ज्यादा कर सकते थे? शायद नहीं..

ये कौन हैं हमारे? क्या रिश्ता है इनसे? फिर भी रात-रातभर जाग कर मेरी देखभाल कर रहे हैं, बिना किसी स्वार्थ के, क्या ये मेरे अपने नहीं हैं? इन बच्चों ने यह साबित कर दिया है कि समाज बदल रहा है, जिसे पहचानना ज़रूरी है। मेरी तमाम शिकायतें ध्वस्त हो गई थीं।”

डॉ. पल्लव, डॉ. देवेंद्र चौबे मेरी इस त्रासदी में हर पल मेरे साथ थे। नमिता गोखले, अशोक तंवर, रेखा अवस्थी, मुरली बाबू, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, रविंद्र कालिया, आलोक जैन (भारतीय ज्ञानपीठ), अशोक माहेश्वरी (राजकमल प्रकाशन) मेरे साथ खड़े थे और इस बीमारी से लड़ने के लिए मेरा हौसला बढ़ा रहे थे। इन सबका मेरे साथ खड़ा होना मेरे सोच और मान्यताओं को बदल रहा था….।’

‘मुकेश और कौशल पवार ने रात-दिन हर तरह से मेरा साथ दिया। मेरी ताकत बने। डॉ. गुलाब, हेमलता महीधर का अपनापन और सहयोग मेरे जीवन की उपलब्धि है।

कैलाश चंद चौहान के बारे में जो भी कहूँगा, वह कम ही होगा। इस त्रासद घड़ी ने एक पारिवारिक, बेहद आत्मीय मित्र दिया, जिसे मैं जीवनभर अपना बनाकर रखने की कोशिश करता रहूँगा।

असंग घोष ने मेरे लिए जो कुछ भी किया, उसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता है। मुझे जीने का एक मकसद दे दिया है। मेरे पुराने मित्र शिवबाबू मित्र लगातार मेरा हौसला बढ़ाते रहे हैं। कैलाश वानखेड़े आदि मित्रों का सहयोग मिलता रहा है।’

‘ब्लॉग, फेसबुक आदि के जरिए अनिता भारती, रजनी तिलक, अशोक पांडेय ने जिस तरह मुझे पाठकों से जोड़े रखा, वह मेरे लिए गहरे विश्वास का कारण बना रहा।

आज सोचता हूँ इस त्रासद घड़ी ने जहाँ मुझसे बहुत कुछ छीना है, वहीं मुझे बहुत कुछ ऐसा भी दे दिया है, जिसने मेरे भीतर जीने की एक गहरी ललक पैदा कर दी है। एक बहुत बड़े परिवार से मुझे जोड़ दिया है। जहाँ न जाति की दीवारें हैं, न धर्म की।’

और अंत में वाल्मीकि जी की एक छोटी कविता के साथ अपने संस्मरण पर फिलहाल विराम लगाता हूँ:

लोहे-लंगड़/गारा-सीमेंट/ ईंट-पत्थर/

सभी पर है/स्पर्श हमारा/लगे हैं जो घरों में आपके/

फिर भी बना दिया आपने/हमें अछूत और अन्त्यज/

भंगी-डोम-चमार/मांग-पासी और महार/

छूना भी जिन्हें पाप/हिस्से में जिनके सिर्फ/

उपेक्षा और उत्पीड़न/

‘जाति’ कही जाए जिनकी नीच/ आप बता सकते हैं/

यह किस सभ्यता और संस्कृति की देन है?

अशफ़ाक

(नवंबर, 2013)

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1. ‘जूठन’ ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा, पृष्ठ 11, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली।

2. वही

3. यदि किसी पाठक की नजर में वह पत्र/पत्रिका कहीं आए तो कृपया सूचित करें या फोटो-कॉपी मुझे भेजने का कष्ट जरूर करें।

4. ‘अब और नहीं’ वाल्मीकि जी की कविता।

2 thoughts on “छिप गया वह सुंदर मुख : ओम प्रकाश वाल्मीकि

  1. ऐसे संस्मरणों के द्वारा ही हम अपने बिछड़े साथियों को एक बार फिर याद कर लेते हैं । यह जरूरी है आग को चेताये रखने लिए ।

  2. बढ़िया लिखा है अशफ़ाक साहब ने।
    आत्मसंघर्ष ही संस्कारों से बाहर निकालता है वर्ना हम होश संभालने से पहले जकड़ दिए जाते हैं।

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