कवि्ता
सपने सुहाने
मनजीत सिंह
नींद की चादर लिपट लो तुम,
मन के द्वार सदा सिमटो तुम,
चाँद निकल रहा राह दिखाने,
दुनिया सपनो की बोलो तुम।
झिलमिल बारात है तारों क
मीठी बात करो खुशियों की
धीरे-धीरे चलती है ठंडी हवा,
लोरी गाए नानी दादी हर रात में।
रात सुहानी, ठंड का साया,
नीले गगन ने जाल बिछाया,
दीप जलाकर जूगनू जैसे
चमक चारों कोना फिर मुस्काया।
उस राह चले आओ जिधर जहाँ,
डर हो ना किसी का बस इस जहाँ,
खुशियों के रंग बिखरा दो तुम,
हँसी का हो कारवाँ जब तक रहो तुम।
बनकर बादल उड़ते जाना,
संग परियों हँसते जाना,
चढ़कर सीढ़ी इंद्रधनुष की ,
सात रंगों में रंगते जाना।
संग-संग खूशबू फूलों की
मधुर सा गाये मन कोई राग,
बहती नदियों की शांत धारा,
मन बसती जाए दिन और रात।
इस मीठे नींद के सागर में,
तुम डुबो अपने मन के घर में,
जहाँ हर सपना यथार्थ बन जाए,
हंसी खिलती खिले हर पल में।
पास न आए तुम्हारे कोई चिंता
कोई आँसू आँख से ना टपके,
सिर्फ और सिर्फ सुकून की छाया में,
प्रत्येक सपना सच बन जाए।
चाँद तुम्हारा मित्र पक्का होगा,
तारों का आँगन भी प्यारा होगा,
बाहों में लेकर रात्रि तुम्हें
जितने भी डर हैं तुम्हें दूर करेगा।
सुबह सवेरे सूरज मुस्काएगा,
नयी रोशनी साथ लाएगा,
ये यादें मीठे सपनों की
दिल पूरा दिन महकाएगा।
अब थकान को दूर भगाओ,
आँखों में सपनों को सजाओ,
नींद की मीठी गोद में जाकर,
खुद को तुम आराम दिलाओ।
धीरे-धीरे हर पल ये बीते,
सपनों के रंग और भी मीठे
शांति उतरे हर धड़कन में
हर ख्वाहिश के दीप जलाते।
आँखें बंद करो चलै अब तुम
शांत करो मन करो मन को तुम
राहों में सपने सजाता चले जाना
मनजीत खुद को आज मुक्त करो…।
