कविता
इन दिनों
शंभुनाथ
इन दिनों
शब्द हैं
जैसे बाढ़ में बहते हुए उखड़े पौधे
जिनकी जड़ों में नहीं है थोड़ी भी मिट्टी
शब्द बह रहे हैं सेवार की तरह
ऊपर से हरे पर अपने भीतर बिखरे हुए
कहीं घर के दरवाजे
और कहीं बिस्तर से टकराते
सपनों में घुस गया है बाढ़ का पानी
नीचे है सड़ांध की एक चुप परत
डूबते-उतराते
अब बाढ़ में
उत्सव की तरह बहते हैं शब्द
आखिर
एक न लौटने वाली बाढ़ कैसी होती है
बस पानी है हर तरफ
बाढ़ का पानी
जिसमें खो गई हैं सड़कें गलियां
और पगडंडियां जिनसे चलकर आए थे
खो गई है एक पवित्र नदी
और सारी नावें
खो गई हैं बहुत सी स्मृतियां
बाढ़ में बह रहे हैं शब्द
शव की तरह
टूटी डालियों की तरह
धूप झिलमिलाती है उनपर
ठगी–ठगी सी
लोग भी ठगे–ठगे से हैं
एक असहाय प्रतीक्षा में!

आज की मनःस्थिति परिस्थिति का बढ़िया बिम्बात्मक चित्रण ।