सम्पादक के नाम पत्र
बेअदबी के रेगिस्तान में गुम गया ललित कार्तिकेय का अदब
ओमसिंह अशफ़ाक
प्रिय अजय कुमार जी,
उद्भावना का अंक 103 (नवम्बर 2012 में प्रकाशित) मैं विलम्ब से देख पाया और इसने मेरे लिए आंखें खोलने का काम किया:
ललित कार्तिकेय से मेरा अंतरंग परिचय पहली बार इसी अंक के जरिए हुआ है। यूं तो मैंने एकाध बार उनका नाम और उनकी कहानी ‘हीलियम’ और ‘तलछट का कोरस’ की सरसरी चर्चा समूह-यात्रा के दौरान डॉ. ओ.पी. ग्रेवाल के मुख से सुनी थी, लेकिन न कभी मुलाकात हुई और न ही कभी उनकी कहानियां पढ़ने का मौका मिल पाया था।
अब इस अंक में अजय कुमार की सम्पादकीय टिप्पणी और ज्ञान प्रकाश विवेक के संस्मरण पढ़कर आदमकद विशिष्ट प्रतिभावान लेखक-चिंतक ललित कार्तिकेय से पहला अंतरंग परिचय हुआ!
लेकिन अब पछताए क्या होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत! चाहे जितना पछतावा करें, अब ललित वापस नहीं आ सकता है। कोई भी नहीं आया है।
अब हम उनकी लिखतों को पढ़ेंगे और अपनी गफलत, अपनी नादानी और अपनी मूर्खता पर रोया करेंगे। ललित को हमने भरी जवानी में खो दिया है। जैसे मेधावी गणितज्ञ व नासा के पूर्व वैज्ञानिक वशिष्ठ नारायण सिंह को भी हमने लगभग खो ही दिया था?
ये तो किसी रेलवे स्टेशन पर ‘पागलपन की अवस्था’ में किसी सज्जन ने उन्हें पहचान लिया था, नतीजतन खबर मीडिया में फैल गई और राजस्थान के किसी मनोचिकित्सक ने टी.वी. चैनल पर ही उनकी हालत देखकर दावा कर दिया था कि जिस अवस्था में “मैंने उन्हें टी.वी. पर देखा है उससे मुझे यकीन है कि उनका इलाज संभव है और वे मानसिक रोग से मुक्त होकर सामान्य जीवन में लौट सकते हैं।”..
डॉक्टर का उक्त बयान सारे देश की जनता ने सुना-देखा, तो सरकार को भी आगे आकर कहना पड़ा था कि उनका समुचित इलाज कराया जाएगा और उस दिशा में सार्थक प्रयास किए भी गए होंगे?
अभी कल-परसों अखबार में खबर पढ़कर मुझे बेहद सुकून मिला और मेरी आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े। जब मैंने उनके स्वस्थ हो जाने की खबर के साथ उनकी फोटो भी देखी—(दैनिक भास्कर, 20-4-2013) खबर थी कि बिहार की किसी यूनिवर्सिटी ने उन्हें विजिटिंग प्रोफेसर का ऑफर दिया है और उन्होंने व्यवहारिक गणित पढ़ाने की इच्छा जाहिर की है।
फिर भी किसी वैज्ञानिक के जीवन के 36 साल (1976 से 2012 तक) कई शताब्दियों से कीमती हुआ करते हैं। यदि स्वस्थ हालत में वशिष्ठ नारायण सिंह को भारत सरकार समुचित संसाधन और प्रयोगशाला उपलब्ध करा पाती तो शायद मंगल-ग्रह पर अमेरिका की बजाय भारत बहुत पहले पहुंच गया होता?
लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि हमने एक जीनियस गणितज्ञ के जीवन के ‘प्राइम टाइम’ के 36 साल बर्बाद होने दिए और एक जीनियस साहित्यकार, चिंतक को हमने 55 साल की उम्र में ही मौत की नींद सुला दिया?
मैंने अभी-अभी ज्ञान प्रकाश विवेक से मांगकर ललित कार्तिकेय की चार कहानियां और एक साक्षात्कार (मंगलेश डबराल से बातचीत: दृश्य के भीतर कविता) पढ़ी है, जिससे मुझे यकीन हो गया है कि ललित जैसा प्रखर मेधावी लेखक हिंदी साहित्य में एकाध ही हो सकता है।
उनकी कुछ कहानियां में वर्जिनिया वूल्फ के उपन्यास (मिसेज डेलोवे) की तरह ‘स्ट्रीम ऑफ कॉन्शियसनेस’ की तकनीक इस्तेमाल होती है और कुछ कहानियों में पात्रों के चरित्र-चित्रण में अवसाद के चिन्ह भी दिखाई पड़ सकते हैं, जो पात्रों की मनःस्थिति का विश्वसनीय चित्रण तो करते ही हैं, हमारे सामाजिक ढांचे पर सोचने-विचारने की जरूरत का अहसास भी कराते हैं।
हम जानते हैं कि जीनियस व्यक्ति की मानसिक स्थिति “भुरभुरे कांच” जैसी नाजुक हुआ करती है। इसलिए उसकी सुरक्षा एवं संभाल की अतिरिक्त आवश्यकता होती है, परंतु न तो परिवार, समाज और न ही सरकार इस तरह की प्रतिभाओं की सहेज-संभाल के प्रति संवेदनशील है।
वैज्ञानिक-परिषदों और साहित्य अकादमियों, लेखक-संगठनों ने भी इस ओर उपेक्षा का भाव बरता है- ऐसे साक्ष्य दोनों टिप्पणियों में मौजूद हैं।
राजेन्द्र यादव जैसा लेखक भी जब यह कहे कि ललित अंगूठी को बंदूक समझने लगे तो कोई क्या कर सकता है? -पढ़कर बेहद अफसोस हुआ कि वे भी उसकी बीमारी को लाइलाज मानकर चले गए, जबकि उनका इलाज हो सकता था!
अब या तो हमें देश से “मेधा पलायन” का रोना बंद कर देना चाहिए या फिर अपनी महान प्रतिभाओं की संभाल-सहेज करने के सार्थक प्रयास के साथ मैदान में आना चाहिए। बहुत हो चुका है!
आपका,
अशफ़ाक
24. 4. 2013
कुरुक्षेत्र।

ओमसिंह अशफ़ाक की इस चिट्ठी ने पुराने दोस्त की याद ताज़ा कर दी।
ललित बाद के दिनों में हम लोगों से, अपने मित्रों से कटते गए थे। वे ज़्यादातर समय अपने पैतृक गाँव में ठहरने लगे थे। उनकी पत्नी उनके पीने की आदतों से परेशान रहती थीं। मैंने कई बार कोशिश की कि पीना कम हो, विफल रहा। पति -पत्नी में तनाव बढ़ता गया।
गुड़गाँव से मज़दूरों का अखबार निकलता था। ललित का उसमें कॉलम था। उस स्तंभ के लेखों को जुटाकर किताब निकली थी – सामने का समय। मैंने उसकी समीक्षा हंस को भेजी। तब तक राजेन्द्र यादव और ललित कार्तिकेय में अनबन हो चुकी थी। ललित को उम्मीद नहीं थी कि राजेन्द्र जी समीक्षा छापेंगे। तब मैं हंस का नियमित लेखक था। राजेन्द्र जी की अनुमति मिल गई। समीक्षा छपी। राजेन्द्र जी चाहते थे कि मैं ललित की भाषा की कृत्रिमता पर लिखूँ।वह मैंने नहीं किया। समीक्षा में उन्होंने संपादक की हैसियत से इस आशय की कुछ लाइनें जोड़ दीं। अंतिम प्रूफ के समय मैं हंस कार्यालय में था। मैंने जिद करके वह अंश हटवाया। उनके लेखों की अगली किताब आती इसके पहले वे दुनिया से कूच कर गए। किसी ने अंतिम संस्कार की सूचना भी न दी। बाद में हम लोगों ने प्रेस क्लब पर शोक/स्मृति सभा की।