कविता
जुड़वाँ-बहनें
ओमसिंह अशफ़ाक
जीवित दफ़ना दी गयी थीं बरसों पहले-
जुड़वाँ बहनें..
ताज़्जुब है मरी नहीं फिर भी-
जुड़वाँ बहनें..!
बोल पड़ती हैं अब भी
सिर चढ़कर किसी सिन्हा या शेषन के..
या गले जा पड़ती हैं किसी
कुमारमंगलम या खैरनार के..!
भौंचक रह जाते हैं लोग,
सरेआम होती है चर्चा-
वाह! अब तक जीवित हैं
जुड़वाँ बहनें..!
यह जिद है या सनक समझ नहीं आती कि-
टनों मलबे के नीचे मिट क्यों नहीं गईं
जुड़वाँ बहनें..!
व्यवस्था उनके महाप्रस्थान की—
पूरी कर दी थी हमने बरसों पहले,
तो भी क्यों लौट आने को कसमसाती हैं..
न मिटने का अपने एहसास कराती हैं
जुड़वाँ बहनें..!
न जाने किस हाल में रहती हैं-
कहाँ से पाती हैं खुराक़ और ऑक्सीजन,
जुड़वा बहनें..!
कोई संगीन नहीं था अपराध उनका-
बस, सच कहती थीं बेशक कड़वा,
चिंतित रहती थीं देखकर आचरण हमारा,
अनिष्ट की आशंका से काँप-काँप जाती थीं-
जुड़वा बहनें..!
कोशिश करती थीं सन्मार्ग सुझाने की-
डर जाते थे जब हम अपने अंदर के भय से-
दोष देते थे उन्हें– ‘मरवाएंगी हमें ये बदजुबान जुड़वाँ बहनें’..!
फ़ुरसत ही नहीं मिली कभी बैठकर सोचने की-
प्यार से बतियाने की..
मर्म नहीं समझ सके उनका
आखिर दुश्मन तो नहीं थीं हमारी
वे जुड़वाँ बहनें..?
अब तो,
अँधेरी रात के तीसरे पहर में
जब कभी उचटती है नींद-
दिखाई दे जाती हैं,
नसीहत-सी देती हुई
वे जुड़वाँ बहनें..!
(दिसंबर 1993)
*जुड़वा-बहनें: सच्चाई, ईमानदारी और नैतिकता।
