विश्व कविता दिवस पर विशेष
आज विश्व कविता दिवस है। इस अवसर पर प्रस्तुत है हमारे समय के महत्वपूर्ण और प्रतिरोध के प्रमुख तेज़ो-तर्रार कवि राजकुमार कुम्भज की कविताएँ। इन कविताओं पर टिप्पणी की है सुपरिचित कवि प्रदीप मिश्र ने ( प्रदीप कान्त —जलेस, इन्दौर इकाई. )
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प्रदीप मिश्र
राजकुमार कुम्भज के रचना संसार से गुज़रना ही हिंदी कविता के लगभग छह दशक की कविता यात्रा से रूबरू होना है । उनकी कविताओं के पाठ के साथ ही हम समय की करवटों का भी पाठ करते हैं । वे अपनी भाषा और व्यंजना में जो प्राप्त करते हैं, वह एक मुक़म्मल कवि का आयत है । इसलिए आज के समय में राजकुमार कुम्भज की कविताओं को पढ़कर पाठक जीवन दृष्टि और उसके सरोकारों से समृद्ध होता है । वे अपनी कविता ” अक़्लमंद तो था नहीं ” में लिखते हैं — सिर्फ़ इतनी-सी थी ज़िद मेरी/कि नहीं हो शर्त कोई जीवन में जीने की / असहमति के लिए बची रहे जगह — यहाँ कवि जिस असहमति की जगह की बात कर रहा है, वह इस धरती, प्रकृति और मनुष्य को बचाने वाला शॉक ऐब्ज़ोर्बर है । इसी असहमति में नए मूल्य और नए मनुष्य जन्म लेते हैं, जो धरती को हमेशा नवीन बनाये रखते हैं । आज के समय में असहमति पर ही बहुत बड़ा संकट है और तानाशाही की भयावहता पसरती जा रही है । इसके ठीक बाद की कविता “जागेगा सच और सब में ” कवि के सरोकार और सर्वजन हिताय को रेखांकित करती है । अपनी इसी संकल्पना को कवि तब शीर्ष पर पहुँचाता है, जब वह लिखता है–ये पृथ्वी है घर सभी का– यहाँ वसुधैव कुटुम्बकम का रेखांकन है । ” युद्ध का अभिप्राय ” समकाल पर क्रूर टिप्पणी की तरह है । इसी क्रम में ” हारते हैं वे भी” ” फिर किया अट्टहास मृत्यु ने “और ” वक्त को रखते हुए याद ” शीर्षक कविताओं को रख कर देखें तो समकाल का व्यापक आख्यान दिखाई देता है । जो कविता के भाव और भाषा फ़्लाॅंगता हुआ सीधा मनुष्यों के चौपाल में बतकही करने पहुँच जाता है । इन कविताओं का कवि, बाज़ार भाव के लिजलीजेपन और भाषा की दुकानदारी को बहुत अच्छे से समझता है । वह बाज़ार की तमीज़ में संस्कृति को नहीं देखता है, उसे मनुष्य की तमीज़ में बाज़ार, संस्कृति और सभ्यता चाहिए । यही दुनियाभर के कवियों का एक साझा स्वप्न है । जिसके साझेदार चौथा सप्तक के कवि राजकुमार कुम्भज हैं । आज विश्व कविता दिवस पर हम उनकी कविता” कविता अब भी संभावना है ” में जज़्ब सम्भावनाओं को हृदय से लगाते हुए मानवीय मूल्यों में विश्वास व्यक्त कर रहे हैं । हमारा विश्वास है और भी मज़बूत हो रहा है कि अपने समय के सरोकारों से लबालब ये कवि जब तक है, मनुष्यता बची रहेगी । इन बेहतर कविताओं के पाठ का अवसर प्रदान करने के लिए जलेस, इंदौर इकाई का आभार ।
राजकुमार कुम्भज की आठ कविताऍं
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1.अक़्लमंद तो था नहीं.
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अक़्लमंद तो था नहीं
जेब से भी था ख़ाली-ख़ाली ही
मगर गर्दन में ऐंठन थी थोड़ी
कि जो जाती न थी
रोना था,इसी बात का रोना था
कि ज़रा भी झुकता न था
जो झुक जाता,
थोड़ा-सा भी झुक जाता,तो पाता
फिर इतना-इतना कुछ पाता
उठाता स्वर्ण-मुद्राऍं,गिनना भूल जाता
कि ठीक से संभाल भी नहीं पाता
सिर्फ़ इतनी-सी थी ज़िद मेरी
कि नहीं हो शर्त कोई जीवन में जीने की
असहमति के लिए बची रहे जगह
जगह-जगह,हर जगह
अगर हो जाता शामिल मैं भी सहमतों में
तब न ऐंठन होती,न कविता होती,न मैं
चाहता हूँ, यही चाहता हूँ
कि बची रहे
ये ऐंठन बची रहे
कविता में कविता की ऐंठन बची रहे
कविता बची रहे,जीवन बचा रहे
मैं रहूँ न रहूँ, ज़रुरी तो नहीं
कवि बचा रहे.
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2.जागेगा सच और सब में.
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दु:ख,प्रेम,सपने और कविताऍं
कहने लगे कि एक दिन,किसी एक दिन
रहेंगे,सब रहेंगे साथ-साथ और यहीं
नदियों में प्रवाह और घुमाव बने रहेंगे सब
झरनों का गिरना और उछलना बना रहेगा
ऑंधियों से वृक्षों का टकराना बना रहेगा
मैं नहीं रहूँगा, तुम नहीं रहोगे,नहीं रहेंगे वे
बाॅंसवन रहेगा, बाॅंसुरी रहेगी,गूँज रहेगी
जो जगाती रहेगी आग,पकाती रहेगी अन्न
जागेगा सच और सब में.
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3.ये पृथ्वी है घर सभी का.
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चलती हुई ट्रेन में बेटिकट
मैं देखता हूँ अपने समय के दृश्य में
गॅंगा-तीरे शहनाई फूंक रहे हैं बिस्मिल्लाह
अमज़द अली खोज रहे हैं भैरवी के रॅंग
और पूछ रही हैं उमराव जान पूछ रही हैं
दरवाज़े खोलते हुए,खोजते हुए बचपन
ये क्या जगह है दोस्तों,कौन-सा मुक़ाम है
कि जगह-जगह,ग़र्दो-ग़ुबार ही गुबार है
बताते हैं,समझाते हैं भीमसेन जोशी
किशोरी अमोणकर को स्मृतियों में
ज़रा भी अपराध नहीं है सपने देखना
देखना सपने सबूत है आदमी होने का
सपने नहीं तो आदमी भी कहीं नहीं
सपनों का होना,आदमी होने का सपना है
किसी को भी घटाने से घटता है ख़ुद ही
सच्चा-झूठा नहीं होता है देश कोई भी
करते हैं होड़ काल से और मरते हैं बेमौत
हथियारों की होड़ ही बनाती है पागल
और पागल आदमी देश नहीं,दुश्मन है
किसी भी देश में,किसी भी देश का
भूल जाता है आदमी कि आदमी है वह
नहीं किसी दूसरी दुनिया का दूसरा प्राणी
हाथ हैं दो ही उसके भी,जैसेकि अन्य
पाँव हैं दो ही उसके भी,जैसेकि अन्य
कान हैं दो ही उसके भी,जैसेकि अन्य
और है एक खोपड़ी भी सभी के जैसी ही
फिर क्यों घृणा,क्यों ईर्ष्या,युद्ध क्यों
फिर क्यों ध्वस्त बारहखड़ी फिर-फिर
फिर क्यों मटियामेट पानी के संकल्प
क्यों क़त्ल किये जाते हैं फिर उड़ते पक्षी
अपनी-अपनी हद के बेहद में हैं सभी
और अपनी-अपनी ध्वनियों के ताप में भी
अपनी-अपनी स्वतंत्रताओं सहित निर्मल
है नहीं जगह कम किसी की भी,कहीं भी
ज़रा-सा वक़्त,ज़रा-सी जगह है सभी की
ज़रा-ज़रा मिट्टी,ज़रा-ज़रा आग,है सभी में
ये पृथ्वी है घर सभी का.
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4.युद्ध का अभिप्राय.
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युद्ध का अभिप्राय
अज्ञान और अविश्वास तो है ही
सोची-समझी मूर्खता भी कुछ कम नहीं
जिसमें शामिल हो जाती है गाहे-बग़ाहे
मूर्खों की मूर्खतापूर्ण वह आज्ञाकारिता भी
जब कुछ अंधे,कुछ दूसरे अंधों को
बरबस ही दिखाने लगते हैं अंधी ऑंखें
जहाँ छुपी होती है क्रूरताऍं और बर्बरताऍं
वे दोनों ही जो उजाड़ती हैं उजागरता से
वह सब,वह सच जो बसाती है कविता
बरसों बरस की यातनाओं से गुज़रते हुए
और होते हुए मनुष्य,सभी मनुष्यों के लिए
मुक्ति के अभिप्राय में.
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5.हारते हैं वे भी.
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ज़िद है जीतने की सभी को
मगर युद्ध में हारते हैं सभी के सभी
बुलंद नहीं हो पाती हैं बंदूकें और तोपें
बुलंद नहीं हो पाती हैं बारूदी लिखावटें भी
और बुलंद नहीं हो पाती हैं पत्थर-हरक़तें
पानी मिटा देता है ज़िदें सभी और सबकी
शांति से ही सुलगाई जाती है आग कहीं भी
शांति से ही लिखी जाती हैं ऐतिहासिकताऍं
शांति से ही होती है हासिल ख़ुशबुऍं सब
भीतर ही भीतर शांति से चलते रहते हैं युद्ध
दुनिया भर में,दुनिया भर की शांति के लिए
हारते हैं वे भी,वे भी हर किसी युद्ध में
जो कहलाते हैं विजेता.
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6.कविता अब भी संभावना है.
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सिर ऊपर चल रहा है जो
पाताल की गहराइयों तक जा गिरेगा
मरेगा एक दिन कुत्तों की मौत मरेगा
न तो पहला है और न अंतिम युद्ध है ये
युद्ध-दर-युद्ध होते रहे हैं,होते रहेंगे
मिटते रहे हैं,मिटाते रहेंगे घर पक्षियों के
जलते रहे हैं,जलते रहेंगे तक्षशिला
फिर भी,फिर-फिर उड़ेंगी,उड़ती रहेंगी पतॅंगें
और लिखने वाले लिखते रहेंगे कविताऍं
कविता अब भी संभावना है.
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7.फिर किया अट्टहास मृत्यु ने.
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फिर किया अट्टहास मृत्यु ने
रौंदा गया लोहा फिर-फिर यहाॅं-वहाॅं
शेष जगह कभी भी कहीं भी छोड़ी ही नहीं
जबकि हर कोई चाहता है कि मिले जगह
धक्के खाते रहे,गुज़रते रहे रॅंग फूलों के
धीरे-धीरे फ़ुरसत से,फ़ुरसत की ओर
बढ़ते रहे,बढ़ाते रहे काॅंटे ही काॅंटे राहों में
वादे थे,झूठे थे,घृणाओं से भरे थे लबालब
घुॅंघरू बजते तो थे,मगर सुनाई नहीं देते थे
किसी के भी भीतर उठता नहीं था ज्वार
हरे-भरे के झाॅंसों में झूमते थे चुप-चुप सभी
उजियारा उतना ही था,सिर्फ़ उतना ही
जितना कि दीवारों की दरारों से आता था
मुश्किल यही थी फिर भी कि जीवन था
और कहा जाता था कि जीवन सरल था
किंतु बार-बार कहता रहता था कवि
जो भी था,जितना भी था,जैसा भी था
कि सब का सब झूठ था.
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8.वक़्त को रखते हुए याद.
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वक़्त को रखते हुए याद
कविता को बचाने की कोशिश में
किसी ने भी नहीं पूछा कि कहाॅं है दु:ख
कहाॅं-कहाॅं भटकता फिरता हूॅं प्रेम के लिए
और अकारण ही युद्ध,हर-कहीं,हर-कहीं
रॅंग बोलते हैं उतना ही जितना कि हुक़्म
भूल जाती हैं हवाऍं हक़ अपना नैसर्गिक
धुऑं उठता तो है,मगर आग का पता नहीं
कोई भी जानता नहीं है ज़रा भी नहीं
कि आना है,जाना है तो इधर से किधर
जबकि सभी को बचाना है सभी कुछ
कविता को बचाने की कोशिश में
वक़्त को रखते हुए याद.
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