डीजल- पेट्रोल के मूल्य में वृद्धि और सरकार का अर्थशास्त्र

डीजल- पेट्रोल के मूल्य में वृद्धि और सरकार का अर्थशास्त्र

  • डीजल के दाम बढ़ने का मतलब अर्थव्यवस्था में मंदी

ओमप्रकाश तिवारी

पिछले दस दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम में करीब पांच रुपये की बढ़ोतरी हो चुकी है। सरकार का कहना है कि चूंकि क्रूड आयल महंगा मिल रहा है इसलिए तेल कंपनियों को घाटा हो रहा है। उस घाटे की भरपाई के लिए पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने पड़ रहे हैं। यह बात तो सही है लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि जब क्रूड ऑयल सस्ता था तब तो कंपनियों ने मुनाफा कमाया। वित्त वर्ष 2019-20 से 2024-25 के बीच केंद्र और राज्य सरकारों ने टैक्स के जरिए लगभग 36.58 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की है।
अपने इस मुनाफे में से जनता को राहत दे सकती थीं। इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि सरकार विकास कार्य और जन कल्याणकारी कार्य कैसे करेगी? अव्वल तो यह पता नहीं चलता है कि पेट्रोल-डीजल की कमाई से विकास कार्य हो रहे हैं या सरकारें अपना अनाप खर्च चला रही हैं? पेट्रोल-डीजल के महंगा हो जाने से इसके खर्च में कमी नहीं आती है। चूंकि पेट्रोल-डीजल जरूरी वस्तु में आता है। इसके बिना आदमी का परिवहन रुक जाता है।
कृषि कार्य रुक जाते हैं इसलिए इसमें कमी का सवाल ही नहीं उठता है। इसका असर यह होता है कि कई चीजें महंगी हो जाती हैं। पेट्रोल डीजल के दाम केवल गाड़ी चलाने वालों को ही नहीं, बल्कि देश के सबसे गरीब नागरिक और किसान को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं।परिहन महंगा होने से भाड़ा किराया महंगा हो जाता है। देश में अधिकांश सामान सब्जियां, अनाज, दवाइयां ट्रकों से एक राज्य से दूसरे राज्य में जाता है। डीजल महंगा होते ही
ट्रक मालिक माल भाड़ा बढ़ा देते हैं। परिवहन खर्च बढ़ने से मंडियों से लेकर दुकानों तक में हर छोटी-बड़ी चीजों के दाम बढ़ जाते हैं। इसकी कीमत आम आदमी को ही चुकानी पड़ती है। पेट्रोल-डीजल का उपयोग कम होने के बजाय महंगाई का एक चक्र शुरू हो जाता है। इसे अर्थशास्त्र में “कॉस्ट-पुश इन्फ्लेशन” यानी लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति कहते हैं।
भारत में छोटे और सीमांत किसानों के पास खुद के ट्रैक्टर नहीं होते। वे जुताई, बुवाई और कटाई के लिए ट्रैक्टर किराए पर लेते हैं। डीजल की कीमत बढ़ते ही ट्रैक्टर मालिक प्रति घंटा या प्रति बीघा का किराया बढ़ा देते हैं। इससे किसानों की खेती की लागत बढ़ जाती है। जिससे उनका मुनाफा कम हो जाता है। परोक्ष रूप से भोजन, राशन और अन्य सेवाओं के लिए भी अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। इसका असर देश की अर्थव्यस्था पर भी गहरा पड़ता है।
वस्तुओं की कीमतें महंगी होने से जिनती क्रय क्षमता कम होती है वह उपभोग कम या बंद कर देते हैं। इसका असर बाजार पर पड़ता है।
मांग कम हो जाने से उत्पादन कम होने लगता है। उत्पादन कम होने से कारखानों में कम कम हो जाता है। इससे नौकरियां जाती हैं या नई नौकरियां नहीं मिलती हैं। इससे अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ जाती है। इसका मतलब है कि डीजल के दाम बढ़ने से आम आदमी पर महंगाई और बेरोजगारी की दोहरी मार पड़ती है।

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