राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं
1.
घर बुलाती है मातृभाषा
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मात्र भाषा से मातृभाषा तक
मैं मातृभाषा में लिखता हूं स्वतंत्रताऍं
मैं स्वतंत्रताऍं सोचता हूं तो मातृभाषा में
वह जो तिनका-तिनका जोड़ती है मुझे
भीतर-बाहर के अपर्याप्त अनंत से
और देती है ये सीख भी देती है मुझे
कि नहीं सिर्फ़ ख़ुद से,ख़ुद ही के लिए
बल्कि दूसरों के आत्म-सम्मान में भी
मातृभाषा की धूप है कि आईना वसंत का
घर की रोटी का स्वाद कि जैसे मीठे बेर
छानते जाते हैं स्मृतियों की छलनी में
कुछ और नहीं,कुछ और नहीं भूल सब
धूल-मिट्टी का अलाव है मातृभाषा
प्रेम का,ऑंसू का अनुवाद है मातृभाषा
मातृभाषा से ही बदलता है मौसम
मौसम के बदलने से बदलता है घर
घर से भाषा,भाषा से आदमी
और आदमी से बनती है मातृभाषा
फिर आदमी को आदमी बनाती है
और घर बुलाती है मातृभाषा.
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2.
भाषा मनुष्यों की
माता है,मातृभाषा है
मुझे शपथ है माता और मातृभाषा की
कि संसार की तमाम-तमाम माताऍं
और तमाम-तमाम मातृभाषाऍं अस्तु
माता हैं और मातृभाषा हैं मेरी तथास्तु
यथा-योग्य,हर कहीं,हर कहीं स-सम्मान
सभी के चरणों में नत रहेगा मस्तक मेरा
जैसे पक्षी जानते हैं भाषा पक्षियों की
मैं भी जानूंगा अवश्य ही भाषा मनुष्यों की
अगर मनुष्यों में बेहतर मनुष्य हूँ मैं
ये साबित होगा तभी.
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