कहीं ऐसे भी कोई किसी को चाय और शराब पिलाता है…

कसौली डायरी -3

कहीं ऐसे भी कोई किसी को चाय और शराब पिलाता है…

संजय श्रीवास्तव

7 अप्रैल के दिन मेरा जन्मदिन होता है. उस दिन अक्सर हम लोग कहीं बाहर घूमने का प्रोग्राम बना लेते हैं. ऐसा ही इस बार हुआ. सुबह सुबह तय हुआ कि हम लोग कसौली चलते हैं. फटाफट सामान पैक हुआ. करीब 10.30 बजे तक कार लेकर निकल गए. वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के कारण बारिश का अनुमान था. लेकिन ये अंदाज नहीं था कसौली में इसके चलते टैंपरेचर गिरेगा तो 8 डिग्री के नीचे पहुंच जाएगा.

हमारा होम स्टे सनावर के पास एक खूबसूरत पहाड़ी गांव पटिया में था. सनावर के लॉरेंस स्कूल के करीब. रास्ता कच्चा – पक्का और सिंगल. शाम 5 बजे जब वहां पहुंचे तो बूंदाबादी होने लगी थी. तापमान गिरने लगा था. चारों ओर पहाड़ियों की रेंज और दूर तक फैली हरियाली मुस्कुरा रही थी. कुछ पक्के मकान नीचे वादियों में और कुछ नीचे…साथ में शिमला मिर्च, फ्रेंच बीन और टमाटर के खेत. सबकुछ होम स्टे के आसपास. वास्तव में इसे होमस्टे नहीं बल्कि खूबसूरत होटल ही कहना चाहिए. कुछ लोग और रुके हुए थे.

शाम को जब इस इलाके में घूमने निकले तो ये होटल के आगे कच्चा हो जाता है. कुछ पगडंडीनुमा, रास्ते में कई लोग मिलते गए. हर कोई मुस्कुराहट वाली नमस्ते के साथ. इस गांव में 30-40 मकान होंगे. लोग नौकरी भी करते हैं और खेती बाड़ी, मवेशी भी. वहीं पहाड़ों के बीच नेचुरल पानी के दो सोर्स भी थे, जहां से साफ पानी लगातार पहाड़ों के अंदर से होता हुआ आ रहा था.

रास्ते से गुजरते हुए एक पहाड़ी हम्माम गीजर का सा दिखा. जो हमारे लिए कौतुहल था. जिसमें ऊपर चोगीनुमा अंगीठी सरीखे आकार से धुंआ निकल रहा था. हमने एक बार उधर निहारा. घर की बालकनी में बैठा परिवार हमें देख रहा था. हम आगे बढ़ गए. मैं, पत्नी और बेटा. हम मौसम, नेचर, पहाड़ों और हरियाली का आनंद ले रहे थे. जगह जगह खिले फूलों और चीड़ के पेड़ों को निहार रहे थे. आगे चलते हुए कई और लोग मिले. अभिवादनों का आदान प्रदान. शहर में ऐसा कहां होता है. है ना कुछ सुखद. कुछ घरों के सामने गाड़ियां.

शाम की रंगत में कुछ अंधेरा घुसपैठ करने लगा था. दो – तीन किलोमीटर ऊपर -नीचे करने के बाद हम वापस लौटने लगे. फिर एक बारगी उसी हम्माम वाले घर के सामने रुककर इस कौतुहल इस अंगीठी को देखने लगे. तभी एक अधेड़ महिला वहां आईं. उन्होंने इस अंगीठी नुमा गीजर में एक ओर लगे कीपे में पानी डाला और दूसरी ओर से गर्म पानी बाल्टी में गिरने लगा. अब मैने पूछ ही लिया – ये क्या है.

इसके बाद उन्होंने इसके बारे में बताना शुरू किया कि कैसे इसके बीच के हिस्से में लकड़ी जलाई जाती है और चारों ओर लोहे की दोहरी परत के बीच पानी गर्म होता रहता है. जब गर्म पानी की जरूरत होती है तो इसमें कीप में ठंडा पानी डालेंगे और दूसरी ओर गर्म पानी निकलने लगेगा. तब तक उनके पतिदेव भी आ गए. दुआ सलाम. हम आगे बढ़ने ही वाले थे कि पति माधोराम जी ने चाय का ऑफर दिया – भाईसाहब चाय चल जाएगी. आ जाओ. जैसा कि होता है हमने इसे औपचारिकता समझा और धन्यवाद करके बढ़ने ही वाले थे, तब तक उनका आग्रह और तेज सा हो गया. अरे ऐसे थोड़े ही जाएंगे. आइए चाय पीते हैं साथ. आप तो उस सामने वाले होटल में रुके हैं ना.

अब हमें चाय का आग्रह मानना ही पड़ा. हम पहली मंजिल पर बनी उनकी लंबी चौड़ी बालकनी या दालान कह लीजिए, वहां कुर्सियों पर बैठ गए. बीच में अलाव जल रहा था. तब तक उनकी दोनों बहुएं आ गईं. उनके परिचय कराया गया. पोते – पोतियां भी मुस्कुराते हंसते आए. हमसे मिलकर चले गए. फिर उनके दो बेटों में एक आकर बैठ गया. वो सनावर के The Lawrence School के स्पोर्ट्स डिपार्टमेंट में है. जल्दी ही उसकी दोस्ती बेटे से हो गई. वो हमें अपने लंबे चौड़े मकान के बारे में बताते रहे.- एक कमरा बड़े बेटे -बहू. दूसरा छोटे के लिए. एक हमारा. दो कमरे मेहमानों के लिए. इसमें किरायेदार भी एक कमरे में रहता है. बातचीत का सिलसिला चल पड़ा – आप क्या करते हैं, नाम, कहां से आए. कैसी लग रही ये जगह. आज तो यहां ठंड हो गई है. माधोराम जी सनावर के देश प्रसिद्ध स्कूल में सेक्योरिटी हेड हैं. 40 सालों से नौकरी कर रहे हैं. चुस्त दुरूस्त और सहज.

फिर बीच में बोले आइए आपको ऊपर का वो हाल दिखाता हूं, जिसमें पार्टी या पूजा पाठ होता है. हम और सीढ़ियां चढ़ते हुए उस हाल में पहुंचे. वाकई बड़ा और बढ़िया. फिर हल्के से बोले – श्रीवास्तव आप लेते हैं ना. मैने हामी में सिर हिलाया. बोले – तो यहीं एक दो पैग ले लेते हैं. मैने हल्के से मना किया आज नहीं कल पक्का रहा आपके साथ बैठेंगे. …और आप यकीन मानिए कि अगले दिन ऐसा हुआ भी..उसका जिक्र आगे.

नीचे आए तो चाय, नमकीन बिस्किट हाजिर हो चुके थे. चाय पीते पीते बारिश कुछ तेज हो गई. ठंड भी ज्यादा. छाते हमारे पास थे नहीं. हम निकलने को हुए तो उनके बेटे ने कहा, ऐसे में आप वहां तक कैसे जाएंगे. मैं गाड़ी से छोड़कर आता हूं. उसने वैन में हमें बिठाया. होटल तक छोड़कर गया. हम काफी देर इस अकस्मात पहचान, चाय की खातिरदारी के बारे में सोचते रहे कि क्या हम जिस शहर में रहते हैं, वहां क्या कोई अनजान को इस तरह घर बुलाकर चाय पिलाता है?

अगले दिन मैने जब सुबह 11 बजे कसौली के मॉल रोड की ओर रुख किया तो रातभर की बारिश के बाद ठंड़ हमें कड़ाकड़ा दे रही थी. रास्ते में एक दो जगह पहाड़ की मिट्टी और छोटे बड़े पत्थर सरक कर आधे रास्ते पर आ चुके थे. खैर कार निकालने के लिए रास्ता था. वहां से होते हुए हम कसौली के माल रोड की ओर बढ़ गए. कसौली का शहरी इलाके की मुख्य सड़क पतली है और वो भी आधी टूटी हुई लेकिन दूसरी और पहाड़ों दर पहाड़ों और उसमें दुबके घरों का वितान नजर आता रहा. रास्ता ऊपर ही ऊपर जा रहा था.

कैंट इलाके में पहुंचते ही रोड लकदक और सपाट बेहतर हो चुकी थी. मालरोड में इंट्री की चुंगी 150 रुपए. माल रोड बहुत खूबसूरत है. यहां कोलोनियल पुराने सुंदर बंगले हैं. जिसमें एक से हस्तियां रहती थीं. अब भी रहती हैं. कुछ बंगले और घर होटल, होमस्टे और लॉज में तब्दील हो चुके हैं. हर घर के साथ कहानियां भी जुड़ी हैं. इसकी चर्चा अगली कड़ी में, जिसमें मैं आपको मॉल रोड की रंगीनियों और हसीन अंदाज के बारे में बताऊंगा.

शाम को जब हम लौटने लगे तो बेटा ट्रैकिंग के लिए उतर गया. हम होटल के अपने कमरे में आकर बालकनी कायनात की खूबसूरती का आनंद लेने लगे. हल्की सी धूप आकर और पहाड़ों को छूकर लौटने लगी थी. इतने भर से बादल पहाड़ों के बीच से चहलकदमी करते हुए दिखने लगे. तमाम पंक्षियों की आवाज आ रही थी.

तभी पता चला कि माधोराम जी बेटे के साथ घूमते टहलते होटल पर आ चुके हैं. उन्होंने नीचे ग्राउंड फ्लोर का कमरा खुलवा लिया, जो नया नया बना है. दरअसल ये पता लगा कि होटल की ये पूरी बिल्डिंग ही माधोराम जी की है. जिसे उन्होंने किसी पार्टी को होटल चलाने के लिए कुछ सालों के लिए लीज पर दिया है. मैने उनके लिए चाय और गर्म पकौड़े मंगाए. बातें होने लगीं. इस बीच उनका बेटा एक झोला लेकर आया. रखकर चला गया. देखिए श्रीवास्तव जी, आपके लिए इस डिब्बे में मीट है, इसको खाइएगा. और इसमें थोड़ा हम लोग प्लेट में निकालकर एक दो पैग लेते हैं. ये कहते हुए वो झोले से रायल स्टैग की नई बोतल निकाल लाए. गिलास में पैग बने. पके मसालेदार मीट प्लेट में सजा. चीयर्स हुआ.

माधोराम जी अपने जीवन के बारे में बताने लगे. सनावर के लॉरेंस स्कूल के बारे में बताने लगे. कितने बच्चे. कितने बड़े लोगों के बच्चे वहां पढ़ते हैं. संजय दत्त, सनी देवल, उमर अब्दुल्ला वहां पढ़ चुके हैं. स्कूल में गेस्ट बनकर आते रहते हैं. बड़े बड़े लोग आते हैं. स्कूल में एडमिशन के लिए किस तरह सिफारिशें लगती हैं. मैं भी इस स्कूल को लेकर अपनी पत्रकारीय जिज्ञासाओं को सवाल के तौर पर हल्के हल्के दागता रहा. खैर हमारा पहला पैग खत्म हुआ. फिर जेंटली दूसरा बना. हल्के हल्के उसे भी पूरा किया गया. इसके बाद दोनों ने ही कहा, बस इतना ही काफी है.

माधोराम जी वैन लेकर आए थे. नमस्कार करके गए. अगले दिन सुबह पत्नी के साथ घूमते हुए फिर वहां से निकले. दुआ सलाम हुआ. आप भी बताइए क्या कभी इस तरह चाय और शराब पिलाने वाले मिले हैं. मैं लौट आया हूं. अब माधोराम जी को फोन करना है. मेरी जिंदगी की कहानियों में माधोराम जी अब एक किरदार नहीं, एक एहसास बन चुके हैं – जो शायद लंबे समय तक मेरे साथ रहेगा. आप क्या कहेंगे इसके बारे में . (आगे भी जारी रहेगा) #

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