एक दिन जिएंगे : सबसे बड़ा भ्रम

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

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एक दिन जिएंगे : सबसे बड़ा भ्रम

 

डॉ रीटा अरोड़ा

 

“दादाजी, आप रोज़ यहाँ अकेले क्यों बैठते हैं?” छोटे बच्चे ने मासूमियत से पूछा।

रामलाल मुस्कुराए, “अकेला नहीं हूँ बेटा… अपने बीते हुए समय के साथ बैठा हूँ।”

“समय भी साथ बैठता है क्या?” बच्चे ने हैरानी से कहा।

“हाँ,” उन्होंने गहरी सांस ली, “जब इंसान जीना भूल जाता है, तब समय ही उसका साथी बन जाता है।”

“आप जीना क्यों भूल गए?”

रामलाल कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, “मैंने सोचा था पहले खूब पैसा कमा लूँ, फिर आराम से जिऊँगा…

बच्चा पास आकर बोला, “तो आप अब जी लो ना!”

रामलाल की आँखें नम हो गईं, “अब समय है, पर ताकत नहीं…”

आज के तेज़ रफ्तार के दौर में जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम जीने की तैयारी में जीना भूल जाते हैं। बचपन में सपनों की दुनिया होती है, युवावस्था में उन सपनों को पाने की अंधी दौड़ और जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, हमें एहसास होता है कि जिन चीज़ों को हम सफलता समझते रहे, वे अक्सर अधूरी संतुष्टि ही देती हैं। जीवन का असली अर्थ किसी दूर के “कल” में नहीं, बल्कि आज के छोटे-छोटे पलों में छिपा होता है।

समाज ने सफलता के कुछ तय मानक बना दिए हैं-अच्छी शिक्षा, प्रतिष्ठित नौकरी, ऊँची आय। अधिकतर लोग इन्हीं पैमानों पर खुद को तौलते रहते हैं। लेकिन धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगता है कि डिग्रियाँ और पद ही जीवन की सच्ची उपलब्धि नहीं हैं। कई बार एक साधारण काम करने वाला व्यक्ति, जिसके पास संतोष और संतुलन है, हमसे कहीं अधिक सुखी होता है। यह हमें सिखाता है कि जीवन की दौड़ केवल उपलब्धियों की नहीं, बल्कि संतुलित और संतोषपूर्ण जीवन की है।

पचास की उम्र के बाद प्राथमिकताएँ बदलने लगती हैं। बाहरी आकर्षण का महत्व कम हो जाता है और स्वास्थ्य सबसे बड़ी संपत्ति बन जाता है। तब समझ आता है कि शरीर और मन की देखभाल ही असली निवेश है। इसी तरह, साठ की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते सामाजिक पद और प्रतिष्ठा का प्रभाव भी घटने लगता है। जो पहचान कभी हमारी सबसे बड़ी ताकत थी, वह धीरे-धीरे पीछे छूट जाती है। ऐसे में केवल हमारे रिश्ते, व्यवहार और मानवीय जुड़ाव ही हमारे साथ रह जाते हैं।

सत्तर और अस्सी की उम्र में यह सच्चाई और भी स्पष्ट हो जाती है कि भौतिक सुख-सुविधाएँ सीमित महत्व रखती हैं। बड़ा घर, महंगी वस्तुएं या बैंक बैलेंस उस समय अर्थहीन लगने लगते हैं, जब स्वास्थ्य साथ नहीं देता। तब एक शांत, सुकून भरा जीवन और अपनों का साथ ही सबसे बड़ी संपत्ति बन जाते हैं।

दुखद यह है कि हममें से अधिकांश लोग “सही समय” का इंतजार करते रहते हैं-सोचते हैं कि जब सब कुछ हासिल हो जाएगा, तब जीवन का आनंद लेंगे। लेकिन वह “सही समय” अक्सर कभी नहीं आता। हम हर दिन उस क्षण के करीब नहीं, बल्कि अपने जीवन के अंत के करीब बढ़ रहे होते हैं और जब अंततः हमारे पास समय होता है, तब अक्सर ऊर्जा या स्वास्थ्य नहीं होता।

यह भी एक कटु सत्य है कि जिस धन को हम जीवनभर जोड़ते हैं, उसका आनंद कई बार हम खुद नहीं ले पाते। वह हमारे बाद दूसरों के काम आता है। इसमें गलत कुछ नहीं, लेकिन यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमने अपने जीवन के सबसे अच्छे पल यूँ ही गंवा दिए?

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जीवन को टालना बंद करें। खुशियों को भविष्य के लिए स्थगित करने के बजाय वर्तमान में जीना सीखें। अपनों के साथ समय बिताना, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना और साधारण पलों में आनंद खोजना-यही सच्ची सफलता है।

अंततः, जीवन कोई लंबी प्रतीक्षा नहीं, बल्कि हर दिन जीने का अवसर है।

आज का हर पल अनमोल है-उसे यूँ ही न जाने दें।

क्योंकि जो समय बीत गया, वह कभी लौटकर नहीं आता… और जो आज है, वही असली जिंदगी है।

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