लाला जगत नारायण – जीवन यात्रा: स्वतंत्रता सेनानी से शहादत तक 

लाला जगत नारायण को उनके शहीदी दिवस (9 सितंबर) पर श्रद्धांजलि

लाला जगत नारायण – जीवन यात्रा: स्वतंत्रता सेनानी से शहादत तक

 

डॉ. रामजीलाल

लाला जगत नारायण (31 मई 1899–9 सितंबर 1981) भारत की आज़ादी की लड़ाई में एक अहम हस्ती थे, जिन्हें एक स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता और मशहूर पंजाब केसरी अखबार समूह के संस्थापक के तौर पर जाना जाता है। उनका जीवन देश सेवा, सच्चाई की वकालत और हिम्मत वाली पत्रकारिता के प्रति उनके प्रतिबद्धता का सबूत है। भारत की आज़ादी की लड़ाई के दौरान, वे एक क्रांतिकारी और सत्याग्रही दोनों के तौर पर उभरे। आज़ादी के बाद के समय में, उन्होंने अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक और भाषाई मुद्दों पर अपने असरदार लेखन के ज़रिए उत्तर-पश्चिम भारत में सोच को आकार देने में अहम भूमिका निभाई।

1. शुरुआती ज़िंदगी और पढ़ाई:

31 मई, 1899 को वज़ीराबाद, गुजरांवाला ज़िले (अब पाकिस्तान का हिस्सा) में जन्मे लाला जगत नारायण एक ऐसे परिवार से थे जो राष्ट्रवाद में बहुत गहराई से जुड़े थे। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई वहीं पूरी की और 1919 में लाहौर के दयानंद एंग्लो-वैदिक (DAV) कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद, उन्होंने वकालत में करियर बनाने के लिए लाहौर के लॉ कॉलेज में एडमिशन लिया, लेकिन तेजी से बढ़ते आज़ादी के आंदोलन से देशभक्ति के उनके जुनून ने उन्हें यह रास्ता छोड़ने पर मजबूर कर दिया। उस समय, लाहौर शिक्षा,क्रांतिकारी और राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया था।

2. आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय योगदान:

सन् 1920 में, जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया, तो लाला जगत नारायण ने अपनी कानूनी पढ़ाई से ज़्यादा देश सेवा को प्राथमिकता दी और आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गए। देश की आज़ादी की लड़ाई के लिए उनके की वजह से उन्हें पहली बार लाहौर में ब्रिटिश सरकार ने अरेस्ट किया, जहाँ उन्होंने लाला लाजपत राय के पर्सनल सेक्रेटरी के तौर पर काम किया। लाला लाजपत राय पंजाब की आज़ादी की लड़ाई के एक जाने-माने लीडर थे, जिन्हें आमतौर पर पंजाब केसरी या पंजाब का शेर कहा जाता है। लाजपत राय की पॉलिटिकल फिलॉसफी और कुर्बानियों ने जगत नारायण की अपनी पॉलिटिकल सोच पर बहुत असर डाला। अपनी पहली जेल के बाद, उन्होंने कई बड़े आंदोलनों में हिस्सा लिया, जैसे सन् 1928 में साइमन कमीशन का विरोध करना, नमक सत्याग्रह में हिस्सा लेना और सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लेना। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की वजह से उन्हें लगभग नौ साल की जेल हुई, और उनकी पत्नी और बेटे समेत उनके परिवार के सदस्यों को भी जेल हुई।

3. राजनीति में प्रवेश और प्रशासनिक सुधार:

सन् 1947 में बंटवारे के बाद, लाला जगत नारायण लाहौर से जालंधर चले गए, जहाँ उन्होंने जगह बदलने की कड़वी सच्चाई का अनुभव किया। भारत लौटने पर, उन्होंने पंजाब कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी का रोल संभाला और पंजाब लेजिस्लेटिव असेंबली का चुनाव सफलतापूर्वक जीता। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री भीम सेन सच्चर के मंत्रिमंड़ल में एजुकेशन, ट्रांसपोर्ट और हेल्थ मिनिस्टर के तौर पर काम किया। अपने समय में, उन्होंने ज़रूरी प्रशासनिक सुधार किए, खासकर हेल्थ सर्विस, ट्रांसपोर्ट और स्कूल की किताबों का नेशनलाइज़ेशन करने वाले किसी भी भारतीय राज्य के पहले मिनिस्टर बने, जिससे जरूरतमंद बच्चों के लिए पढ़ाई-लिखाई में काफी सुधार हुआ। इन कामयाबियों के बावजूद, उन्होंने सन् 1956 में क्षेत्रीय पॉलिसी को लेकर सोच में मतभेद होने की वजह से कांग्रेस पार्टी और अपने मिनिस्टर पद से इस्तीफ़ा दे दिया। बाद में, वे एक इंडिपेंडेंट कैंडिडेट के तौर पर राज्यसभा के लिए चुने गए।

4. पत्रकारिता और “पंजाब केसरी” की शुरुआत:

लाला जगत नारायण ने सन्1924 में भाई परमानंद के शुरू किए गए वीकली न्यूज पेपर “आकाशवाणी” को एडिट करके अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की। सन्1948 में, उन्होंने “हिंदू समाचार” शुरू किया, जो बंटवारे के बाद आए लोगों के सामने आने वाली मुश्किलों पर केंद्रित करने वाला एक उर्दू दैनिक था। आज़ाद भारत में ज़्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए एक हिंदी अखबार की ज़रूरत को समझते हुए, उन्होंने 13 जून, 1965 को अपने गुरु लाला लाजपत राय को श्रद्धांजलि के तौर पर “पंजाब केसरी” शुरू किया। अखबार ने अपनी निष्पक्ष और निडर रिपोर्टिंग, ज़बरदस्त संपादकीय और आम लोगों की चिंताओं को दूर करने के समर्पण के लिए तेज़ी से पहचान बनाई, और आखिरकार यह देश के सबसे ज़्यादा प्रसारित होने वाले हिंदी अखबारों में से एक बन गया।

लाला जगत नारायण एक जाने-माने भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और दूर की सोचने वाले नेता थे, जिन्हें मशहूर पंजाब केसरी अखबार ग्रुप शुरू करने का क्रेडिट दिया जाता है। उनका जीवन देश सेवा, सच्चाई की खोज और हिम्मत वाली पत्रकारिता के प्रति गहरे प्रतिबद्धता की मिसाल है। उन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई में एक अहम भूमिका निभाई, एक क्रांतिकारी और सत्याग्रही दोनों के तौर पर अलग दिखे। आज़ादी के बाद के समय में, उन्होंने अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक और भाषाई मुद्दों पर अपनी असरदार राइटिंग के ज़रिए उत्तर-पश्चिम भारत में समाज और राजनीति को अहम सोच वाली दिशा दी।

5. आपातकाल का विरोध और निडर पत्रकारिता:

लाला जगत नारायण के पत्रकारिता करियर की पहचान निडर रिपोर्टिंग के प्रति उनके पक्के इरादे और सरकारी गलत कामों के कड़े विरोध से है। सन् 1974 में, जब उनके अखबार ने सरकार की गलत नीतियों की सबके सामने आलोचना की, तो सरकार ने पंजाब केसरी ग्रुप के ऑफिस की बिजली काटकर जवाबी कार्रवाई की। अपने पक्के इरादे का एक शानदार उदाहरण देते हुए, लाला जगत नारायण ने अपनी प्रिंटिंग मशीनों को एक ट्रैक्टर इंजन से जोड़ा, जिससे वे अखबार की प्रिंटिंग जारी रख सके और उसे समय पर अपने दर्शकों तक पहुंचा सके। यह घटना ,जो मुझे आज भी याद है दुनिया भर में प्रेस की आज़ादी के लिए एक अहम संदर्भ बिंदु बन गई। सन् 1975 में घोषित इमरजेंसी के दौरान, लाला जगत नारायण को उनके सरकार विरोधी विचारों की वजह से मेंटेनेंस ऑफ़ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (MISA) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्होंने 19 महीने जेल में बिताए, जहाँ उनकी सेहत काफी बिगड़ गई, जिसके लिए दो सर्जरी करवानी पड़ीं। इन मुश्किलों के बावजूद, वे पक्के इरादे वाले रहे और सरकारी दबाव के आगे झुकने से मना कर दिया, जिससे पत्रकारिता की ईमानदारी के चैंपियन के तौर पर उनकी पहचान और मजबूत हुई।

6.पंजाब संकट और शहादत:

सन्1970 के दशक के आखिर और सन्1980 के दशक की शुरुआत में, पंजाब को अलगाववादी आंदोलनों और आतंकवादी गतिविधियों के कारण बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लाला जगत नारायण एक जाने-माने व्यक्ति के तौर पर उभरे जिन्होंने देश की एकता की पूरी तरह वकालत की। अपने अखबार के ज़रिए, उन्होंने इलाके में शांति के लिए खतरा पैदा करने वाले चरमपंथी एजेंडा का खुलकर विरोध किया। उनके संपादकीय में बार-बार मेल-जोल की बात कही गई और हिंदू-सिख एकता के महत्व पर ज़ोर दिया गया। अपने उसूलों के प्रति इस पक्के प्रतिबद्धता की वजह से वे आतंकवादियों के निशाने पर आ गए, जो उन्हें अपने मकसद के लिए एक बड़ा खतरा मानते थे। दुख की बात है कि 9 सितंबर, 1981 को लुधियाना के पास आतंकवादियों ने लाला जगत नारायण पर हमला करके उन्हें मार डाला, जो देश की एकता और पत्रकारिता की ईमानदारी की लड़ाई में उनकी शहादत का प्रतीक है।

7.विरासत और सम्मान:

लाला जगत नारायण की मौत के बाद भी, उनके परिवार ने उनकी विरासत को बनाए रखा। उनके सबसे बड़े बेटे, रमेश चंद्र ने अखबार का मैनेजमेंट संभाला, लेकिन उनका भी यही हश्र हुआ, सन्1984 में आतंकवादियों ने उन्हें शहीद कर दिया। इस परिवार की कुर्बानियां आजादी और पत्रकारिता के मूल्यों के प्रति उनके प्रतिबद्धता को दिखाती हैं। आज, उनके पोते और आने वाली पीढ़ी पत्रकारिता की इस शानदार परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित हैं। देश के लिए लाला जगत नारायण के योगदान को देखते हुए, सन्2013 में उनकी देशभक्ति, समाज सेवा और भारतीय पत्रकारिता पर उनके अहम असर के सम्मान में एक खास पोस्टेज स्टैम्प जारी किया गया था। उन्हें न सिर्फ़ एक न्यूज़ पेपर के संस्थापक के तौर पर, बल्कि निडर, निष्पक्ष और मूल्यों पर आधारित पत्रकारिता के चैंपियन के तौर पर भी जाना जाता है। उनका जीवन और काम आने वाले पत्रकारों और युवाओं को देश के हित की वकालत करने के लिए प्रेरित करता रहेगा। आज की पीढ़ी के नेताओं और पत्रकारों के लिए लाला जगत नारायण के बेहतरीन जीवन से सीखना बहुत ज़रूरी है।

डॉ. रामजीलाल , सामाजिक वैज्ञानिक और पूर्व प्रिंसिपल, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल (हरियाणा—भारत)

One thought on “लाला जगत नारायण – जीवन यात्रा: स्वतंत्रता सेनानी से शहादत तक ”

  1. A profoundly moving and well-researched tribute by you sir.This article beautifully captures the essence of Lala Jagat Narain Ji’s transition from a passionate student revolutionary to a fearless guardian of free speech. The article highlights not just his political milestones, but the sheer grit it took to stand against divisive forces through journalism. It serves as an inspiring reminder for the young generation of the heavy price paid by our democratic freedom fighters. Thank you for this enlightening contribution
    With Warm Regards
    Dr Amol
    Assistant Professor of English
    Dyal Singh College
    Karnal

Comments are closed.

1