मूल मसला चुनावी कार्यनीति का नहीं, राजनीति का होना चाहिए हर
Bhसीपीआई(एम) की पश्चिम बंगाल की विस्तारित राज्य कमेटी की कल्याणी बैठक के संदर्भ में एक प्रतिवेदन
अरुण माहेश्वरी
पश्चिम बंगाल में सीपीआई(एम) की विस्तारित राज्य कमेटी की बैठक आगामी दो दिन (29–30 अगस्त) तक नदिया जिले के कल्याणी शहर में होने जा रही है। विधानसभा चुनाव की पराजय और चुनावोत्तर परिस्थिति की समीक्षा के साथ ही इस बैठक में जाहिरा तौर पर स्थानीय निकायों के चुनावों की कार्यनीति को स्वाभाविक रूप से विचार का विषय बनाया जायेगा।
इसी बीच शुभेंदु अधिकारी की भाजपा सरकार ने अपने सौ दिन पूरे किए हैं। अभी से अखबारों में सरकार के कामकाज के दावों के झूठ पर प्रश्न उठने लगे हैं; भाजपा के भीतर भी इन “चूकों” पर असंतोष है । वसूली तथा भ्रष्टाचार के आरोपों में लगभग पचास नेताओं को निकालने और सौ से अधिक लोगों पर कार्रवाई की खबरें भी अखबारों में आ चुकी हैं।
अर्थात् परिस्थिति बिल्कुल खुली हुई है। चुनाव में विशाल बहुमत के बावजूद भाजपा सरकार की राजनीतिक जमीन स्थिर नहीं हुई है। उसके मंत्रियों का अहंकार, भाजपाइयों की मनमानी, प्रशासन के सांप्रदायीकरण की कोशिश और दिल्ली के निर्देशों पर राज्य को चलाने की प्रवृत्ति इतनी जल्दी प्रकट होने लगी है कि अभी से भाजपा की चुनावी जीत और बंगाल की जनता के वास्तविक राजनीतिक रुझान के बीच का अंतर साफ दिखाई देने लगा है।
ऐसे एक राजनीतिक संभावनाओं से भरे समय में सीपीआई(एम) के सामने मुख्य प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि आगामी नगरपालिका चुनावों में कांग्रेस से कितनी सीटों पर समझौता किया जाए, कितनी पर न किया जाए । हमारी नजर में असली प्रश्न यह है कि क्या पार्टी बंगाल में भाजपा की सत्ता को एक सामान्य ढंग से निर्वाचित सत्ता मानती है, अथवा इसे चुनाव आयोग और केंद्रीय सत्ता की पूरी मशीनरी की मदद से स्थापित फासीवादी आधिपत्य के रूप में देखती है?
इन दोनों आकलनों से पार्टी की राजनीति के लिए दो बिल्कुल भिन्न राजनीतिक रास्ते निकल सकते हैं।
यदि भाजपा की जीत को मुख्यतः तृणमूल के कुशासन की ही स्वाभाविक प्रतिक्रिया मान लिया जाता हैं, तो वाम मोर्चा अपने को तृणमूल और भाजपा—दोनों के विकल्प के रूप में पेश करेगा। वह कांग्रेस से चुनावी तालमेल करेगा, तृणमूल के भ्रष्टाचार और भाजपा के सांप्रदायिक शासन को समान और समानांतर रखेगा और अपने लिए प्रतिपक्ष का कुछ अधिक बड़ा स्थान बनाने की कोशिश करेगा। यह मूलतः आगामी चुनावों में सत्ता-संतुलन बदलने की एक कार्यनीति होगी।
लेकिन यदि हमारा आकलन यह है कि चुनाव को निर्वाचन आयोग की सक्रिय सहायता से लूटा गया, मतदाता-सूचियों और राजकीय संस्थाओं का दुरुपयोग हुआ और चुनावी प्रक्रिया को जनता की स्वतंत्र इच्छा व्यक्त करने का माध्यम नहीं रहने दिया गया, तो हम भाजपा सरकार को सामान्य चुनावी प्रतिद्वंद्वी नहीं मान सकते हैं । तब पहली राजनीतिक प्राथमिकता तीसरे विकल्प के लिए जगह बनाने की नहीं, लोकतांत्रिक राजनीति की जमीन को फिर से हासिल करने की होगी।
तृणमूल के कुशासन की आलोचना अपनी जगह पूरी तरह उचित है। उसके भ्रष्टाचार, दमन और प्रशासनिक स्वेच्छाचार ने भाजपा के प्रवेश के लिए रास्ता बनाया। लेकिन इसी बात को भाजपा की विजय का “मूल कारण” मान लेना चुनावों की लूट को एक मामूली तकनीकी गड़बड़ी भर मान लेने के समान होगा। यह प्रकारांतर से भाजपा सरकार के पक्ष में जनादेश को स्वीकारना होगा, जो जनता ने संभवतः उसे दिया ही नहीं है । तृणमूल की राजनीतिक विफलता और भाजपा के द्वारा चुनाव का अपहरण, ये दोनों सत्य हो सकते हैं; लेकिन फिर भी हम कहेंगे कि आज की राजनीति में इन दोनों को समान स्तर पर नहीं रखा जा सकता है। तृणमूल की विफलता का विषय पिछली सत्ता की आलोचना का विषय है; भाजपा के द्वारा चुनावों की लूट बंगाल में जनता की राजनीतिक सत्ता को बहाल करने का प्रश्न है ।
इसी बिंदु पर हम पार्टी की पूर्व-निर्धारित ढंग से एक निश्चित कार्यक्रम के मातहत राजनीति की कार्यपग्धकि की सीमा पर कुछ बुनियादी सवाल उठाना चाहेंगे । कल्याणी बैठक में यदि परिस्थिति का विश्लेषण करके कांग्रेस के साथ गठबंधन, सीटों का बँटवारा, चुनावी नारे और संगठनात्मक कर्तव्य की कोई तयशुदा नीति तैयार की जाती है तो हमारे अनुसार वह एक संभावनामय राजनीति को पहले से निर्धारित कार्यनीति रे चौखटे में बाँधने का उपक्रम होगा । यह जीवित अर्थात् लगातार बदलती परिस्थिति को पार्टी की लाइन के अनुसार पढ़ने के समान होगा जबकि ज़रूरत इस बात की है कि परिस्थिति में पैदा हो रही नई संभावनाओं के सामने पार्टी की लाइन को खोल कर रखा जाए ।
हमारी नजर में, बंगाल की आज की राजनीतिक परिस्थिति को “तृणमूल बनाम भाजपा बनाम वाम-कांग्रेस” के त्रिकोण में बंद करना एक सबसे बड़ी भूल होगी। इससे यही जाहिर होगा कि वामपंथ भाजपा-विरोधी जनता को राजनीतिक समुदाय के रूप में नहीं, अलग-अलग दलों के वोट-बैंक के रूप में देखता है । ऐसे में तृणमूल समर्थक जनता भाजपा-विरोधी संयुक्त संघर्ष की सहभागी होने के बजाय आगामी चुनाव में भी परास्त किए जाने वाला प्रतिद्वंद्वी बनी रहेगी। कहना न होगा, इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा, क्योंकि फासीवादी सत्ता हमेशा अपने विरोधियों के पारस्परिक विभाजन पर टिकी रहती है।
फासीवाद-विरोधी संयुक्त मोर्चे का अर्थ तृणमूल से चुनावी गठबंधन अथवा उसके कुशासन को क्षमा कर देना नहीं है। इसका अर्थ है कि भाजपा के विरुद्ध संघर्ष में जनता के किसी भी समुदाय को महज उसकी दलीय प्रतिबद्धता के कारण बाहर न रखना। तृणमूल के समर्थक, वामपंथी, कांग्रेसी, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, स्त्रियाँ, छात्र, मजदूर, किसान, बुद्धिजीवी और किसी दल से न जुड़े नागरिक—सभी लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के एक साझा मैदान में आ सकते हैं। यह दलों का जोड़ नहीं, जनता की शक्तियों का नया राजनीतिक संयोजन होगा।
चुनावी गठबंधन का लक्ष्य सीटें होता है; संयुक्त जन-मोर्चे का लक्ष्य राजनीतिक परिस्थिति को बदलना। चुनावी गठबंधन ऊपर से दलों के नेताओं के बीच बनते हैं, जन-मोर्चा नीचे से संघर्षों, नागरिक समितियों और साझा प्रतिरोध के बीच पैदा होता है। गठबंधन एक चुनाव से अगले चुनाव तक चलता है, फासीवाद-विरोधी मोर्चा समाज की लोकतांत्रिक सामर्थ्य को पुनर्गठित करता है। अगर हम दोनों को एक मान लेके हैं तो हम राजनीति को महज चुनाव-प्रबंधन बना कर छोड़ देते हैं।
आज जरूरत उन मतदाताओं की पहचान और आवाज को सामने लाने की है जिन्हें मतदाता-सूचियों से बाहर किया गया; चुनावी लूट के प्रमाणों को सार्वजनिक आंदोलन का विषय बनाने की है; प्रशासन और पुलिस के राजनीतिक उपयोग पर निगरानी रखने की है; अल्पसंख्यकों तथा असहमत नागरिकों की सुरक्षा के लिए स्थानीय प्रतिरोध-समितियाँ बनाने की है; और भाजपा सरकार के प्रत्येक जनविरोधी कदम के विरुद्ध दलगत सीमाओं से परे जनता को संगठित करने की है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष को भी भाजपा और तृणमूल के भ्रष्टाचार की तुलनात्मक तालिका बनाना नहीं, सत्ता और जनता के संबंध को बदलने वाला संघर्ष समझना चाहिए।
शुभेंदु अधिकारी की सरकार की लोकप्रियता में अभी से दिखाई देने वाली गिरावट को यदि सीपीआई(एम) अपने मतों में संभावित वृद्धि के रूप में देखेगी, तो वह फिर राजनीति के रास्ते पर चलने के बजाय पुराने संसदीय गणित में फँस जाएगी। भाजपा से जनता का मोहभंग अपने आप वामपंथ की शक्ति नहीं बनेगा। वह तृणमूल की वापसी, राजनीतिक उदासीनता या किसी और प्रतिक्रियावादी दिशा में भी जा सकता है। उसे लोकतांत्रिक परिवर्तन की शक्ति बनाने के लिए जनता के बीच ऐसी स्वतंत्र राजनीतिक प्रक्रिया की जरूरत है जिसमें लोग केवल किसी दल के मतदाता नहीं, परिस्थिति को बदलने वाले सक्रिय प्रमाता बनें।
यही आज के समय के दार्शनिक ऐलेन बाद्यू के इस कथन की महत्ता स्पष्ट होती है कि राजनीति का अर्थ है भविष्य की अनंतता को स्वीकारना । पार्टी कभी भी खुद यह पहले से तय नहीं कर सकती है कि बंगाल की जनता का प्रतिरोध किस रूप में विकसित होगा। वह केवल उन परिस्थितियों का निर्माण कर सकती है जिनमें जनता की अभी तक अप्रकट सामूहिक क्षमताएँ सामने आएँ। पार्टी का काम इस प्रक्रिया का कार्यक्रम लिखना नहीं, बल्कि खुले दिमाग़ से इसमें निष्ठापूर्वक भाग लेना है।
कल्याणी की विस्तारित बैठक की ऐतिहासिक सार्थकता इस बात में नहीं होगी कि वह अगली चुनावी लड़ाई के लिए कितनी चतुर कार्यनीति तय करती है। उसकी सार्थकता इस बात से तय होगी कि सीपीआई(एम) स्वयं को प्रतिपक्ष की एक दावेदार पार्टी से आगे बढ़ाकर बंगाल में लोकतांत्रिक राजनीति के पुनर्गठन का साधन बना पाती है या नहीं। सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस के साथ कितनी सीटों पर समझौता हो। सवाल यह है कि क्या वामपंथ सत्ता के लिए दलों का गठजोड़ बनाएगा, अथवा फासीवादी सत्ता के विरुद्ध जनता के सभी समुदायों का खुला संयुक्त मोर्चा तैयार करेगा।
