ब्रजेश कृष्ण के कविता संग्रह ‘जो राख होने से बचे हैं अभी’ पर टिप्पणी
साहित्य आलोचना के सरोकार
वहाँ कविता संजीवनी बन जाती है: काव्य समीक्षा
ओमसिंह अशफ़ाक
ब्रजेश कृष्ण गहन अनभूति और विश्लेषण के कवि हैं। उनका मन मानवीयता-आत्मीयता से लबालब है।
समाज में व्याप्त विकृतियों के कारण जानने-समझने के लिए ब्रजेश का कवि पोस्टमार्टम नहीं करता बल्कि वह तो अपनी आत्मा की चीरफाड़ करता है जैसे:
“सवालों से आँख बचाकर/मैं खिसक तो आया नेपथ्य में/लेकिन खुद से सवाल करती मेरी आँख/अब मुझे जीने नहीं देती..।”
स्पष्ट है कि कवि-कर्म या सार्थक चिंतन भी निरापद पेशा नहीं है। यहाँ भी जान जोखिम में डालनी पड़ती है। यह जीव-जगत से अगाध प्रेम का मामला है:
“रहीमन यह घर प्रेम का, खाला का घर नाँहि।
शीश उतारे भूहिं धरै, सो पैठे घर माँहि।”
ब्रजेश का कवि भी इस घर में पैठने की बार-बार कोशिश करता है और यही कारण है कि हत्या, चाकू और हत्यारा उसे अपने सामने दिखायी पड़ते हैं। और लोग इतनी हड़बड़ाहट में हैं कि वे कहीं भी आते नहीं है,सिर्फ जाते हुए दिखते हैं:
शायद वे किसी ‘खास संस्कृति’ को बचाने में मुब्तिला हैं इसलिए “भाँजी जा रही हैं लाठियाँ, पैने किए जा रहे हैं भाले, गँड़ासे और बरछे- कौन है उधर सिर उठाते हुए, बता दो उसे-सवाल करना मना है।”
लेकिन फिर भी उनकी कविता में कुछ “मुंहफट” लोग बचे हुए हैं जो “साफगोई से, और बिना डरे अपनी बात” कह आते हैं जबकि शहर में “राजा की सभा का ऐलान हो चुकता है।
गुप्तचर शहर को सूंघ रहे हैं। सेना शहर को हड़का रही है। कारिन्दे प्रजा को इकट्ठा करके बैठा रहे हैं…”और मुंहफट आदमी “कूड़े के ढेर से अपनी आँखें बीनती छः बरस की लड़की” के बारे में सोच रहा है।
और पूछ रहा है कि “अब अत्याचारी बदसूरत क्यों नहीं होते। उनकी आँखें खूंखार क्यों नहीं होती । और चेहरे पर कटे-फटे का निशान भी नहीं होता?
और वे सिंहासन की बगल में कानून की किताब के ऊपर/पैर धरकर क्यों बैठते हैं।और उनके हाथ इतने लम्बे क्यूँ हैं कि पूरे शहर को ही दबोच लें?..
“वही हाथ मुंहफट आदमी की हत्या करने पर आमादा हैं लेकिन वह भी अपनी जगह बजिद है। कहता है मैं यह भी जानता हूँ । मगर मैं लिखूंगा और लडूंगा..
जाहिर है जान की बाजी लगाकर लिखने और लड़ने का वह संकल्प कोई मामूली बात नहीं है। आज के जमाने में कबीर के कुनबे का ही कोई फक्कड़ और ‘सिरफिरा’ शख्स ऐसी ‘हिमाकत’ कर सकता है।
तभी तो उनके ‘सपने’ में: इमरजेंसी की एक रात/इंदिरा गांधी मुझे मिली/मेरे ही घर में आलू छीलते हुए/उस कठिन समय में/जब हंसना सख्ती से मना था/मैं खुलकर हंसा कई दिनों बाद..।”
ब्रजेश की कविता में ठंड, कोहरा और मौसम किसी रूमानियत को लेकर नहीं आता बल्कि मौसम का ऐसा कठिन कहर बनकर आता है:
जहाँ खबरों से पहले तो/कोई नरेंद्र मोदी हंसता है/और फिर एक छः बरस की लड़की/ फूट-फूटकर रोती है/क्योंकि ऐन इसी मौसम में/पुलिस ने उसका घर उजाड़ दिया है.. और अब कवि की “हड्डियों में/ लड़की का विलाप जाड़े की तरह/रह-रहकर बजता है/”
लेकिन कवि इस भयानक दौर की विकृतियों पर सवाल दागने से नहीं चूकता है:
“ये कैसा समय है दोस्तों! कि चौराहे पर खड़े/युवा-लफंगे मांग रहे हैं/सच्चे और बूढ़े आदमी से/देश के प्रति/उसकी वफादारी का सबूत../मगर हमारे कानों को/ सुनायी नहीं देता/बगल से आता हुआ आर्त्तनाद/”
यहाँ अन्ना हजारे का चित्र उभरता है, बेशक यह कविता अन्ना हजारे के राष्ट्रीय पटल पर आगमन से बहुत पहले लिखी जा चुकी होगी।
क्योंकि अन्ना जैसी शख्सियत तो किसी न किसी नाम से सब युगों में मौजूद रहती रही हैं।
यह असल बात यह है कि अन्ना हजारे ने भी देश की जनता को निराश ही किया है। देश में सत्ता परिवर्तन के साथ अन्ना ने नई सरकार को 9 महीने का वक्त देने की घोषणा की थी।
अन्ना हजारे का कहना था कि लोकपाल की नियुक्ति सहित तमाम काम यदि 9 महीने में नहीं हुए तो वह फिर से इस सरकार के विरुद्ध भी आंदोलन छेड़ देंगे?
लेकिन 12 साल बीत गए और अन्ना हजारे ने एक धरना प्रदर्शन तक नहीं किया है। क्या अन्ना हजारे का एजेंडा पूरा हो गया है?
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जब रुकी हुई बस में कोई चुटकुलों की किताब बेचने आता है तो कवि उसे प्यार से देखता है और कवि को हिटलर की याद आ जाती है कि हिटलर को चुटकुले नापसंद थे, क्योंकि सभी तानाशाह ‘हंसी से डरते’ रहे हैं।
शुरू में हमने कवि के जिस आत्मविश्लेषण और आत्मा लोचन का जिक्र किया था, यूँ तो वह कवि की हर कविता में मौजूद है। मगर उनकी ‘डायरी में एक पन्ना’ है जिसमें एक विशेष प्रसंग दर्ज है:
“आज बैंक से लौटते हुए/ रास्ते में मिली एक पहचान की स्त्री/वह अपने घुटनों के दर्द से/इतनी परेशान थी/कि रो पड़ी मेरे सामने/मगर मैं दुःखी नहीं हुआ/ उसकी तकलीफ़ से/क्योंकि मेरी जेब भरी थी/और मुझे जल्दी थी घर लौटने की/..
“फिर (घर आकर) देखी मैंने अपनी तस्वीर और खुद से डरा / आज मैं अपने सामने/थोड़ा-सा मरा..।” यही एहसास और द्वन्द्व कवि सब इंसानों में जगाना चाहता है जोकि अत्यंत मानवोचित और पवित्र संकल्प है।
बाजारवाद के विश्वव्यापी हाँके में कवि की निगाह एक सद्य: विधवा स्त्री की “चारपाई पर खुली दुकान” की ओर जाने से नहीं चूकती है:
जो ‘पति के मर जाने के बाद/ बैठेंगी यहाँ आज से सारा दिन/ चुटकी भर नमक/और मुट्ठी भर चून के इंतजार में…
“सवाल यह भी है/कि पत्नी को जन्म दिन पर / ढाई सौ करोड़ का जहाज देने वाले शाहजहाँ की/दुकान का नमक और चून/कब और कैसे पहुंचेगा/इस स्त्री के पास/जिसे इसकी सख्त जरूरत है/आज और अभी।”
अंतिम दो शब्द बताते हैं कि कवि को विधवा स्त्री की आवश्यकता की ही नहीं, ‘अरजैंसी’ की कितनी गहन और पावन चिंता है।
वह जानता है कि बड़े-बड़े मॉल्स, मेगामार्ट और मल्टीपलैक्स के हमले में ‘चारपाई वाली दुकान’ का थोड़े से दिन टिक पाना भी असंभव है।
ब्रजेश का कवि जानता है कि इस दौर में ‘हत्या’ भी एक कला बन चुकी है और वह हमें क्रमश: इस प्रक्रिया की शिनाख्त भी करवाता है। कैसे?
“बाजार के इस दौर में/पहले होती है विचार की हत्या/फिर संवाद मारा जाता है/फिर मारे जाते हैं रिश्ते और हम/हमें पता ही नहीं चलता/कि कब चौराहों की आदमकद मूर्तियों के सिर काट डाले गये/और कब हम पूजने लगे/हत्यारों के बुतों को…
ये पंक्तियाँ सहज ही हमें बाबा साहेब डॉ.भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी की मूर्तियों के साथ अक़्सर होती बदसलूकी की याद दिलाती हैं।
यह सवाल भी खड़ा कर देती हैं कि क्या विश्व जनमत अभी भी इस साज़िश को पूरी तरह समझ सका है? यदि हाँ, तो फिर बाजारवादी साम्राजय के नाक में नकेल क्यों नहीं डाली जा रही है।”
यह कविता देशी-विदेशी संस्कृति और समाज के तथाकथित ‘महानायकों’ की कलई भी खोल देती है:
“सरेआम कितनी सफाई से छिपा रहा है वह/मसीहा के विशाल मुखौटे में अपना लालची चेहरा/ मगर यहाँ सुनी और सुनाई जा रही हैं/उसकी महानता और उदारता की किवंदन्तियाँ/वह महानायक है/इस पाखंडी समय का..
देश और दुनिया में दिन प्रतिदिन हो रहे अन्याय और नरसंहार के ख़िलाफ़ सब जगह व्याप्त चालाक-चुप्पी कवि को हर वक्त परेशान करती है। कवि समाज को झकझोर कर कहता है:
“अभी-अभी मारे गये/आदमी की चीख टंगी है हवा में/और चारों ओर छाई है चुप्पी/किसी के खिलाफ नहीं आती/कहीं से कोई आवाज/मैं इस बदहवास चुप्पी से परेशान हूँ।”
वह नवधनाढ्य वर्ग के ‘रईसजादों’ का परिचय हमें इस तरह कराते हैं कि चंद पंक्तियों में ही उनका चरित्र हास्यास्पद दिखने लगता है:
पिछले कुछ वर्षों में/जब से कि अररा कर गिरा है/उनके घरों में पैसा/वे पूरी तरह जवान हो चुके हैं/इतने कि उनके चलने से धरा हिलती है/कि घबराता है उनके उड़ने से आसमान/उनके पैर कभी नहीं होते जमीन पर..
लेकिन संतोष और गर्व की बात ये भी है कि कवि जब मुड़कर देखता है तो अवसरवाद और आपाधापी की अंधी दौड़ से अलग रहकर अपना मूल्याँकन करने पर अपने संकल्प पर खुशी प्रकट करता है।
वह इस जद्दोजहद में अकेला नहीं है और “वह और उसके हमसफ़र लहुलुहान हैं मगर अब भी वे उन रास्तों को ख़ारिज करते हैं, जहाँ से होकर ‘महाजन जाया करते हैं।”
‘उत्सवपूर्ण समय’ इस दौर के लिए एकदम सटीक कविता है जिसमें कवि कहता है कि
“सब कुछ एक दृश्य भर है उनके लिए/और हमें मार देने के लिए हर समय/जायज कारण हैं उनके पास/मंदी की वजह से निकाला गया मजूर/महंगाई से जूझ रहा है..
“ये ऐसी उलटबांसी है/कि जिसका जवाब/उनकी किताबों में पहले ही दर्ज है/हमें पता ही नहीं लगता/और प्रहसन में तब्दील हो जाते हैं/हमारे दारूण दुःख..
विडम्बना ये भी है कि कला विरुद्ध समय में एक कला तेजी से विकसित हो तो रही है लेकिन अफ़सोस कि वह भी ‘झूठ बोलने की कला’ है। जिसके नित ‘नये प्रयोग’ आप मोबाइल पर रोज़ देख सकते हैं..
संग्रह में ‘पिता और लड़की’ जंगल, स्त्री, मां की बची हुई हंसी ‘मां और उसकी साथिनों के गीत’ अत्यंत मर्मस्पर्शी प्रसंगों की कविताएँ हैं।
कुछ ‘लुप्त होती हुई चीजें’ तो ऐसी है कि जिनके पुरातात्विक अवशेष भी नहीं बचते हैं और ये स्थिति कवि को ही नहीं, पाठकों को भी भीतर तक सालती है।
जैसे पिता खाने के पहले खिलाते थे किसी भूखे को और तृप्त होते थे खुद/गाय, कुत्तों और कौओं को पता था/उनके खाने का समय/पिता अक्सर होते थे/ लोगों के सुख-दुःख में शामिल/ चुपचाप..। जबकि आजकल रस्म पगड़ी और भंडारे भी दिखावट के सामान बन गये हैं।
मां बनती बेटी की मनोदशा का जितना यथार्थपरक और कल्पनाशील चित्रण कवि ने अपनी दो कविताओं में किया है, (‘इन दिनो वह’ 1, 2) वैसा विश्वसनीय और मर्मस्पर्शी चित्र शायद कोई गर्भवती स्त्री ही पेश कर सकती है।
नगरों-महानगरों की कोठियों में उदास और बेचैन जीवन जीते लोगों को घर की आत्मीयता का अनुभव करना हो तो उन्हें कवि की ‘घर’ शीर्षक कविता को अविलम्ब पढ़ना चाहिए।
‘मां के लिए’ कविता की कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं जिनमें मां की मृत्यु की कामना करता कवि दरअसल अपनी आत्मा की पीड़ा व्यक्त करता है।
ऐसी स्थिति हममें से किसी के भी साथ कभी-न-कभी-आ सकती है जबकि हमें मन मसोस कर अपने सृष्टा के विसर्जन की दुआ करनी पड़ती है जोकि बहुत त्रासद भी है और उपाय रहित भी:
ग्यारह वर्ष की उम्र में विवाहित और पंद्रह में विधवा, 72 वर्षीय ‘दादी’ का दुःख हिमालय से भी भारी है। कवि हमें इसका बख़ूबी एहसास कराता है।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि ब्रजेश कृष्ण की कविताएँ हमें ‘राख होने से बचाती हैं।’ यानी समाज के लिए संजीवनी बूटी का काम करती हैं:
पुस्तक परिचय
कविता संग्रह : जो राख होने से बचे हैं अभी।
प्रकाशक : आधार प्रकाशन, पंचकूला।
मूल्य: ₹150
कवि : ब्रजेश कृष्ण।
(मूल लेख 2014,अपडेटेड- संपादित,2026)
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