दास्तान एक शहर की

डायरी

दास्तान एक शहर की

ओमसिंह अशफ़ाक

 

दास्तान-ए-शहर कैसे बयां करूं।

जीऊं तो कैसे, मरूं तो कैसे मरूं।

मैं सन् 1984 में इस शहर (कुरुक्षेत्र) में आया तो इसे आदतन शहर कहकर अपने कहे पर पुनर्विचार करना पड़ता था।

बेशक जिला मुख्यालय तो यह 1973 में ही बन गया था, पर किसी भी कोण से शहर की शक्ल तब तक नहीं बन सकी थी।

एक तो आबादी इतनी कम थी कि इसे मुश्किल से छोटा-सा कस्बा कहा जा सकता था।

दूसरे, बसासत बिखरी हुई होने के कारण सघन आकार नहीं ले सकी थी।

पुराने मौहल्लों में अभी भी गांव के से ही चाल-ढाल थे। वैसे ही गलियां वैसे ही घर, पानी और कीचड़ से गंधाती नालियां।

धमाचौकड़ी मचाते नंग-धड़ंग बच्चे बिल्कुल ग्रामीण मौलिकता लिए हुए अक्सर दिख जाते थे।

कहने को तो बहुत पुराना रेलवे स्टेशन भी यहां था, बल्कि रेलवे की तकनीकी शब्दावली में उसे जंक्शन कहा जाता था।

क्योंकि यहां से एक ब्रांच लाईन भी पश्चिमी दिशा में नरवाना की तरफ जाती थी।

जिस पर सुबह-शाम एक धुंधाता स्टीम इंजन तीन-चार डिब्बों को खींचता दिख जाता था। इसे पैसेंजर गाड़ी के नाम से पुकारते थे।

फिर भी पता नहीं क्यूं इस ‘शहर’ के लोग संतुष्ट और आश्वस्त से थे।

लेकिन पिछले दस-बारह बरस में तरक्की करके इस कस्बे ने शहर की शक्ल अख़्तियार कर ली है।

‘डिवाइडरों’ का निर्माण करके सड़कों को दोहरा बना दिया गया है।

डिवाइडरों पर खंभों की लाईन खड़ी करके स्ट्रीट लाइटें लगा दी गई हैं।

नई बसासत के लिए सेक्टरों को विकसित करके प्लाट बेचे गए हैं।

मध्य-वर्ग के नौकरीपेशा और दुकानदार लोगों ने उनमें मकान बनाकर रिहाइशें कर ली हैं।

इस तरह रेलवे स्टेशन से जी.टी. रोड के बीच चार-पांच किलोमीटर खेत उजाड़ कर ये नया शहर उसर आया है।

हालांकि कुछ लोगों का अभी भी यही मत है कि सरकार यदि थोड़ी सी भी दूरदर्शी हुई होती तो ये दोनों बातें एक साथ भी संभव हो सकती थी।

यानि खेत भी बचाए जा सकते थे और लोग भी बसाए जा सकते थे।

उनका प्रस्ताव है कि चौदह सैक्टर बसाने के बजाए एक सेक्टर में चौदह मंजिले फ्लैट बनाकर उतनी ही आबादी को घर दिए जा सकते थे।

खैर, फिलहाल इस अवान्तर से बचते हुए हम शहर की बदलती फिज़ा पर ही केंद्रित रहने की कोशिश करते हैं।

शहर के कायाकल्प में दूसरा खास मोड़ तो पांच-छह साल पहले ही आना शुरू हुआ।

हवा का रुख ऐसा बदला कि तरह-तरह की आकर्षक और छोटी-बड़ी चीजों से बाजार पट गया।

इनमें कई तरह के रंगीन टी.वी., रेफ्रीजिरेटर, कम्पयूटर, मोटर साइकिलें, वाशिंग मशीन और कारें इफ़रात में थीं।

अब समस्या ये आई कि उनको खरीदने के लिए लोगों की जेबों में पैसा होना चाहिए था जोकि नहीं था।

लिहाजा बैंकों ने ऋण सुलभ करवाने की अनेक स्कीमें चालू कीं।

लोग सरकारी कर्ज़ के झंझट से डरते थे, उनको फांसने के लिए प्राइवेट फाइनेंसरों के छोटे-बड़े गिरोह उग आए थे।

सबसे पहले बड़ी तादाद में “किस्तों पर या उधार” में टेलीविजन सेट बेच गए!

फिर उन पर सभी उपभोक्ता चीजों का बाजार सजाकर घर बैठे दर्शक “ग्राहक” बनाए गए।

बैंकों और फाइनेंसरों के यहां से होते हुए ये सब “ग्राहक” बाजार में पहुंचे तो इस कस्बे उर्फ़ शहर की सड़कें दुपहिया-चौपहिया वाहनों से पट गईं।

कई बार तो शहर के इकलौते फ्लाईओवर पर ट्रैफिक का जाम लग जाता था।

तब लोगों को गर्व सा होता कि कम से कम एक बात में तो अपना शहर भी दिल्ली-मुंबई जैसा हो ही गया है।

चार वर्णों और छत्तीसों जातियों में बंटे इस शहर के लोग अब एक नए उपभोक्ता समाज में संगठित थे।

ऐसा लगा कि अब उनके आंतरिक भेदभाव मिट गए हैं और सब के सब बस एक बात पर मुतमईन हैं।

वो बात ये है उसकी कमीज अथवा इसकी साड़ी मेरी वाली से ज्यादा सफेद नहीं दिखनी चाहिए!

लेकिन कुछ समय बाद ही इस नवनिर्मित समुदाय में ही एक अजीब किस्म का विभाजन शुरू हो गया।

ज्यादा सफेदी वाले लोग ‘फील गुड’ हो गए और कम सफेदी वाले ‘फीलिंग बैड’ ही रहे।

यूं तो ‘फील गुड’ संख्या में बहुत कम थे, लेकिन गलबा उनका ही ज्यादा था।

‘फीलिंग बैड’ वालों के लश्कर के लश्कर घूम रहे थे, मगर उनकी बात सुनीं नहीं जा रही थी।

शहर के शुरूआती विकास के दौर में नर्सिंग होम्स की भी बाढ़ सी आ गई थी।

कुछ देर उनके वार्ड ‘फील गुड’ मरीजों से भरे भी रहे, क्योंकि सरकारी अस्पताल में दवाइयां और इलाज संतोषजनक नहीं था।

 

फिर नर्सिंग होम्स भी ठप्प होने लगे। हालांकि शहर में मरीजों की तादाद बढ़ रही थी।

तब ये भी सुनने में आया कि हड्डियों के किसी डॉक्टर ने फ्लाईओवर के ऊपर डीजल बिखरवा दिया।

उस कारनामे के चलते कुछ देर हड्डियों के अस्पतालों में मरीजों की तादाद खूब बढ़ गई।

लेकिन शहर में अनेक लोग लंगड़े-लूले हो गए थे।

विडम्बना ये भी हुई कि इस प्रकरण के मामलों में लोगों को मुआवजे भी नहीं मिल सके।

उधर,सरकार ने सरकारी अस्पताल की सुध लेनी ही छोड़ दी थी।

कुछ अरसा बाद स्थिति ने ऐसा पलटा खाया कि सरकारी अस्पताल में ‘फीलिंग बैड’ मरीजों की भरमार थी।

लेकिन यहां से दवाइयां और जरूरी उपकरण नदारद थे।

हालांकि डॉक्टर वहां अभी भी थे। मगर ये पता नहीं चल सका कि अब वहां वे क्या कर रहे थे?

यद्यपि उस अस्पताल में एक नया वार्ड जरूर खुल गया था, जो पहले वहां नहीं था।

डॉक्टर लोग और अस्पताल के कर्मचारी बेशक उसे ‘साइकेटरी वार्ड’ कहते थे मगर आम जनता को राय में वह ‘छोटा पागलखाना’ ही था।

कहते हैं कि उस वार्ड का डाक्टर पागलों का इलाज करते-करते खुद भी पगला गया था।

तो मैं आपको बताना चाहता हूं कि तब ये शहर बेशक छोटा कस्बा या गांव-सा ही था।

लेकिन इसमें इतनी तादाद में पागल भी नहीं थे।

मुझे ठीक-ठाक याद है, यहां सिर्फ एक पागल था। लोग प्यार से उसे “भगता” कहते थे।

सच पूछिए तो भगता भी तब तक इस हद तक पागल नहीं हुआ था, जितना वह आज है।

तब भगता कई-कई दिनों तक एक ही पोशाक में नज़र आता रहता था।

स्पष्ट है कि वह न तो कपड़े फाड़ता था और न ही निकाल कर फेंकता था।

पागलपन के लिहाज से देखें तो काफी संयत था और कुछ-कुछ विनम्रता-सी उसके व्यवहार में बची हुई थी।

औरतों से छेड़खानी नहीं करता था। हिंसक भी नहीं हुआ करता था। लेकिन कुछ लोगों की सलाह पर उसके बाप ने उसका इलाज करवाना चाहा।

फिर सुनने में आया कि उसको पागलों के अस्पताल में ले जाया गया और बिजली के झटके लगवाए गए।

विडम्बना ये हुई कि भगता ठीक होने की बजाए और अधिक पागल हो गया।

उसका स्वभाव भी उग्र हो गया। चौक पर खड़ा होकर ‘ट्रैफिक कंट्रोल’ करने जैसी हरकतें करने लगा।

फिर कपड़े उसके तन से दूर होते गए और महिलाओं से छेड़खानी करने लगा। रात-बिरात वाहनों की लाइटें भी फोड़ने लगा।

इस दौरान कुछ लोगों ने उसे फ्लाई ओवर के ‘फुटपाथ’ पर सरेआम अश्लील हरकतें करते हुए भी देखा है।

अब तक सभी ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि अब भगते से भगत सिंह बनने की कोई संभावना नहीं बची है।

हालांकि उसके बाप ने शहीदों से प्रेरणा लेकर ही उसका नाम भगत सिंह रखा था।

इधर पिछले कुछ महीनों से एक और व्यक्ति अक्सर सड़क पर नज़र आता है।

वो हर रोज अपने हाथ में ‘ब्रीफकेस’ साईज की लोहे की एक संदूकड़ी लिए रहता है।

यह आदमी सुबह घर से धुले- धुलाए कपड़े पहन कर हजामत बनवाकर निकलता है।

और किसी चौराहे पर अथवा ‘डिवाइडर’ के किसी ‘कट’ पर तेज चहलकदमी करता हुआ मिलता है।

वह अपनी संदूकड़ी को बार-बार हवा में उछालता है। जैसे हर वाहन से किसी भी दिशा में जाने की ‘लिफ्ट’ मांगता है।

उसके लिबास और मध्यवर्गीय व्यक्तित्व के बावजूद उसकी हरकतों, उग्र प्रतिक्रियाओं और स्वगत भाषण से ही वाहन सवार स्थिति समझ जाते हैं।

वे जानते हैं कि इस आदमी की मंजिल कहीं खो गई है। अब इसे कहीं भी नहीं जाना है!

और वे वाहन सवार खुद की मंजिल का पुनः स्मरण करते हुए और अधिक तेजी से अपनी यात्रा पर निकल पड़ते हैं।

अभी कुछ दिन पहले एक और नौजवान पागल शहर में दिखाई दिया है।

मारे भूख के उसका बुरा हाल था। जिस्म में काफी कमजोरी थी। वह आहिस्ता-आहिस्ता चल पाता था।

यहां खाली पड़े काफी प्लाटों और ‘एक्वायर’ हुए भूखंडों में जोकि अब बंजर पड़े थे और उनमें बेतरतीब खर-पतवार तथा कांग्रेस घास उग आई थी।

उनमें वह पागल अक्सर घंटों खड़ा रहकर कुछ खोजता रहता था।

इस पागल के पास सर्दी से बचाव का पर्याप्त कपड़ा भी नहीं था। इधर, सर्दी भी अपने पूरे यौवन पर थी;

लेकिन दो-एक दिन बाद देखा गया कि किसी परलोक-संवारू परोपकारी व्यक्ति ने उसे एक सस्ता-सा कम्बल दान कर दिया था।

खुले आसमान के नीचे बसर करने वाले किसी तंदस्त आदमी के लिए तो ये बेशक नाकाफ़ी था;

लेकिन इस पागल को इसमें ठंड नहीं लगेगी, ये सोच कर संतोष कर लेने में किसी को कोई दिक्कत नहीं थी।

तभी एक दिन अजीब घटना घटी। शाम के करीब छह बजे का वक्त था। मैं दफ्तर से लौट रहा था।

सोचा,थोड़ा जल्दी घर पहुंच जाऊंगा, इसलिए खाली पड़े भूखंडों में से होकर शार्टकट मारने लगा।

रेडियो स्टेशन के पीछे सुनसान जगह थी। वहां पार्किंग स्थल जैसी किसी चीज का निर्माण कार्य चल रहा था।

जमीन से थोड़ी ऊंचाई तक फुटपाथ जैसा कुछ बन रहा था। उसी की 9 इंच बुनियाद पर लमलेट किसी मानव आकृति का आभास हुआ।

 

कुछ और गौर से देखने का प्रयास किया। चारखाना कम्बल पर निगाह पड़ी। मामला साफ था:

वही पागल नौजवान पड़ा था..पर इसकी एक टांग इस तरह अकड़ी हुई क्यूं खड़ी है?

लो जिसका डर था, वही हुआ। ये तो मर गया। पिछली रात की जबरदस्त ठंड इसे भी लील गई?

मुझे झटका सा लगा। पर दूसरे ही क्षण, एक और विचार दिमाग में कौंधा, ‘… दूर से ही खिसक लेने में तेरी भलाई है।

पागल वो नहीं था, तू है जो लाश के पास चला जा रहा है?’

यदि लाश पागल की न हुई तो..? कम्बल से लाश की शिनाख्त करता है। कारखाने में जैसे एक वही कम्बल बना होगा?

चलो मान लिया लाश पागल की ही है,परन्तु तू कैसे साबित करेगा कि वह कुदरती मौत मरा है?

हो सकता है उसका किसी ने कत्ल किया हो? जहर दे दिया हो?

उसका पता-ठिकाना तक तुझे मालूम नहीं है। हो सकता है जमीन-जायदाद का कोई लफड़ा हो।

कातिल उसके पीछे लगे हो, मौका पाकर काम तमाम कर दिया हो? तू पढ़-लिखकर पागल हो गया है?

सबसे पहले पुलिस तुझे ही बुलाएगी। बता- लाश कब देखी, किस हालत में देखी, मौत कैसे हुई, क्यूं हुई, किसने की?

अब बता तू कहां से कातिल को पकड़ कर पेश करेगा? नहीं करेगा तो पुलिस तुझे ही कातिल समझ लेगी..

लाश तो बरामद हुई है. कत्ल तो हुआ है और सबसे पहले तूने लाश को देखा है..!

अपने अंदर के प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों ने वाकई मुझे विचलित कर दिया।

मैंने सोचा कि मेरे लिए तो ये साबित करना भी मुमकिन नहीं होगा कि मरने वाला व्यक्ति पागल था।

कानून भी सबूत मांगता है। मेरे पास कोई सबूत नहीं था कि मरने वाला पागल ही था। इसलिए ठंड से अपना बचाव नहीं कर सका!

क्या दूसरे भले-चंगे गरीब लोग ठंड से अपना बचाव कर पाते हैं ? यदि नहीं, तो क्या वे सब पागल मान लिए जाएंगे?

दिमाग के कम्पयूटर में सैकेंड के तिहाई चौथाई हिस्से में हुई इस उथल-पुथल ने पता नहीं कब मेरा रास्ता बदल दिया:

पत्नी ने चाय के लिए पूछा तो होश आया कि मैं तो घर में बैठा हूं। अगले दिन मैंने उस रास्ते की तरफ मुंह भी नहीं किया। दफ्तर पहुंचते ही सारे अखबार गौर से पढ़े।

ठंड से मरने वालों की खबरों में उनके नाम-गाम ध्यान से देखे, लेकिन कुछ भी पता नहीं चला। उस रास्ते से दुबारा जाने की हिम्मत नहीं हुई।

यही ख्याल परेशान करता रहा कि पता नहीं कौन था? किस वजह से भरी जवानी में पागल हुआ या कर दिया गया। पता नहीं खुद मरा या मार दिया गया।

साथ ही एक और पश्चाताप कि बार-बार मन में चाहते हुए भी उस पागल से कभी बात क्यूं नहीं कर पाया।

हो सकता है, वह अपनी कुछ परेशानी बयान कर पाता।

उसकी बिपदा का कुछ तो पता चलता। क्या पता थोड़ा-बहुत ठौर-ठिकाना भी बता सकता होता?

कई दिन इन्हीं उलझनों में बीतते रहे, लेकिन अब क्या हो सकता था। उलझन सुलझने के सभी रास्ते बंद हो चुके थे।

आखिर एक दिन एक नर्सिंग होम के सामने गजब का नजारा दिखा:

चाय के खोखे पर वही पागल नौजवान चाय पी रहा था और मैं उसके जिंदा होने को खुशी में पागल हुआ जा रहा था।

मैं हैरान था। हफ़्ताभर पहले मर चुका पागल साक्षात् मेरे सामने था। चाय खत्म होने में एक मिनट भी न लगा और तभी वह वहां से खिसक लिया।

मैंने चाय वाले से उसके बारे में जानना चाहा। उसने पागल की दर्दनाक कहानी कुछ इस तरह बयान करी-उस नौजवान ने एक सपना देखा था।

घर में थोड़ी-बहुत जमीन-जायदाद भी थी, जिससे बड़े भाई की पढ़ाई का खर्चा किसी तरह चल रहा था।

यह छोटा नौजवान पढ़ाई में थोड़ा तेज निकला। इंजीनियरिंग में दाखिला हो गया।

लेकिन अब तक पेशेवर कोर्सों की फीसें चार से दस गुना तक बढ़ चुकी थीं। डिग्री बीच में छोड़ने का मतलब कैरियर चौपट करना था।

उसके पिता ने जमीन बेच डाली। जैसे-तैसे दोनों भाइयों की पढ़ाई का खर्चा जुटाया।

उम्मीद थी कि दोनों बेटे पढ़ाई पूरी करके अच्छी नौकरी पा जाएंगे। दुगनी जमीन कभी भी खरीद लेंगे। खैर, उन दोनों ने पढ़ाई पूरी कर ली;

लेकिन तब तक बहन ‘ओवरएज़’ होने लगी थी। या तो रोजगारशुदा लड़का (वर) नहीं मिलता, अगर मिलता तो पांच-सात लाख से कम शादी का एस्टीमेट नहीं बनता।

शादी तो करनी ही पड़ती।

कुंआरी लड़की घर में कब तक रखी जाती ? इस बार पिता को मकान भी बेच देना पड़ा।

दोनों भाईयों की डिग्री का ही तिनके की तरह सहारा था, लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं मिल सकी। मिलती भी कैसे?

नौकरी एक- उम्मीदवार अनेक। बल्कि एक लाख से भी ऊपर। अब तक पिता को भी स्थिति की गंभीरता का अहसास हो चुका था।

एक दिन पिता ने उसकी मां को तसल्ली दी ‘नौकरी नहीं मिल रही तो इसमें बच्चों का क्या दोष ? कुछ आगे की बिचार। बेटों की शादी की सोच ?

खानदान का वंश भी तो चलाना है, लेकिन शादी का जो भी प्रस्ताव आता वापस लौट जाता।

बिना मकान-जायदाद और बिना रोजगार के कोई न टिकता। माता-पिता को यही चिंता खाने लगी ?

पिता पहले ब्लड प्रैशर के शिकार बने, फिर हार्ट अटैक उनको लील गया।

छह माह बाद माता भी पिता के वियोग में चल बसी।

सालभर भी न बीता था कि बड़े भाई ने एक दिन सल्फास निगल ली।

पूरे परिवार की बर्बादी झेलने की हिम्मत इस नौजवान में नहीं बची थी।

सबसे छोटा था, तो सबका प्यारा भी था। सब प्यार करने वाले चले गए, तो वह किसके लिए जिए?

लेकिन वह मर भी नहीं सका और इस सदमे को झेल भी नहीं पाया।

उसने एक दिन अपने-आपको ऊल-जलूल हरकतें करते पाया।

लोगों ने शोर मचा दिया-पागल आया, पागल आया….।

गली के सब बच्चे ईंट-पत्थर लेकर उसके पीछे दौड़ रहे थे और उसे दर-बदर कर दिया गया था।

लेकिन अफसोस, इस त्रासदी का अभी अंत नहीं हुआ है।

तब से शहर में रोज़ नए-नए पागल देखे जा रहे हैं और अब तक तो ये शहर जैसे पागलो से ही भर ही गया है। बल्कि इसे पागलों का शहर कहना ही ज्यादा संगत प्रतीत होता है।

अंतर बस इतना है कि कोई पूरा पागल, कोई आधा पागल और नीम पागल हुआ फिरता है।

कुछ लोगों की राय में तो इस कहानी का लेखक भी उन्हीं में से एक है।

-अशफ़ाक

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नवंबर,2007

5 thoughts on “दास्तान एक शहर की

  1. लेखक के व्हाट्सएप पर प्राप्त एक महत्वपूर्ण टिप्पणी:
    “Sir. I got disappointed after reading the story of a city…Kurukshetra. I thought you would narrate it’s past, it’s link too Mahabharta War, something about its temples its historic gurudwaras, its link with Raja Harshwardhan, its two famous tanks etc.etc. But you have devoted more than 50% space to the two lunatics who could be summarized in passing reference.
    I know I have hurt your feelings. But I have expressed my observation.”
    -Dr NK Nagpal,
    Principal (retired),
    IGN College,Ladwa(kkr)
    Haryana, Bharat(India)

  2. Clarification to the points raised by Dr. NK Nagpal, principal (retired):

    Thank you very much sir for your comments,these are valuable for me always. No, you have not hurt my feelings at all rather encouraged me to be more critical in visualising all aspects of the subject. Even I have posted those in the comment box attached with this article, though it would have been more appropriate if you posted these in the comment box yourself.
    Anyway I wil explain my point of view to you & all concerned very soon in hindi. Because the article is written in hindi for hindi readers in general.
    ❤️
    -Omsingh Ashfaq,
    Kurukshetra.

  3. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    लेखक के व्हाट्सएप पर और भी कुछ टिप्पणियां प्राप्त हुई हैं:

    1.”बहुत ही रोमांचक शहरनामा”
    -जयपाल (वरिष्ठ कवि एवं प्रदेश अध्यक्ष), जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

    2.”बढ़िया है। प्रतिबिंब मीडिया में पढ़ ली है”।
    -रमेश जोशी, वरिष्ठ साहित्यकार एवं चीफ एडिटर, विश्वा, जयपुर, राजस्थान)

    लेखक का निवेदन है कि अन्य पाठक मित्र भी अपनी टिप्पणी/ प्रतिक्रियाएं “कमेंट-बॉक्स” में लिख भेजें। हमें खुशी होगी।

  4. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    डॉ नागपाल सर का ऐतराज है कि मैंने “दास्तान एक शहर की” लिखकर उनको निराश किया है। उनका विचार था कि मैं कुरुक्षेत्र शहर के बारे में “महाभारत के युद्ध” से इसके जुड़ाव की पड़ताल करूंगा? कुरुक्षेत्र के मंदिरों और ऐतिहासिक गुरुद्वारों के बारे में कुछ जानकारी दूंगा। और राजा हर्षवर्धन से कुरुक्षेत्र का संबंध बारे कुछ बताऊंगा। लेकिन मैंने तो इस कहानी का आधे से भी ज्यादा हिस्सा दो पागलों को अर्पित कर दिया है जिनके किस्से को चलताऊ ढंग से निपटाया जा सकता था?
    मैं डॉक्टर नागपाल की टिप्पणी का स्वागत करता हूं कि उससे मुझे यह एहसास हुआ कि किसी चीज को कितने पहलुओं से देखा-जाना जा सकता है!
    लेकिन मैं पूरी विनम्रता के साथ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि यहां मेरा मकसद कुरुक्षेत्र का “ऐतिहासिक अथवा टूरिस्ट सर्वेक्षण/अध्ययन करना नहीं था।
    कुरुक्षेत्र शहर की “बसासत और विकास” के साथ चलते हुए मुझे उस आर्थिक-सामाजिक- राजनीतिक प्रक्रिया को व्याख्यायित, विश्लेषित करने और समझने-समझने का प्रयास करना था जोकि हमारे सामाजिक-आर्थिक जीवन पर प्रतिकूल असर डाल रही है। गरीब लोगों का जीवन बर्बाद कर रही है। आम लोगों को पागल बना रही है और आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर कर रही है? ज़ाहिर है कि यह सब प्रक्रिया गैर-राजनीतिक भी नहीं है?
    इस कहानी का अंतिम लक्ष्य यही है कि समस्त समाज इस विडंबना का नोटिस ले, इस पर विचार करे और इस स्थिति के शीघ्र निराकरण के समुचित प्रयास करे।
    अगर यह कहानी पाठकों का ध्यान उस समस्या की तरफ नहीं खींच पाती है तो जाहिर है कि कहानीकार को भी इस पर फिर से विचार करना होगा।
    -ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र।

  5. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    लेखक के व्हाट्सएप पर एक और टिप्पणी प्राप्त हुई है:

    “दास्तान एक शहर की अच्छी रचना है।”

    -डॉ. बृजेश कृष्ण कठिल,
    प्रोफेसर (सेवानिवृत)
    प्राचीन इतिहास विभाग,
    कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र।

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