बदलता साहित्यिक स्वरूप और कवि-लेखक

टिप्पणी

बदलता साहित्यिक स्वरूप और कवि-लेखक

कृष्ण कुमार निर्माण

 

आज के समय में साहित्य,लेखक और साहित्यिक/कवि गोष्ठियों की जो जमीनी हकीकत है,वह बेहद चिंतनीय होने के साथ-साथ मजाक की स्तिथि भी बना रही है। क्योंकि असल में वर्तमान दौर में काव्य/साहित्यिक गोष्ठियों में वह बात नहीं रही,जो हुआ करती थी, इनमें अब ‘ताम-झाम’ शामिल हो चुका है।

सोशल मीडिया और डिजिटल युग के इस दौर में जहाँ मंच बढ़े हैं,वहीं साहित्य की गहराई कहीं खोती जा रही है? आज का दौर डिजिटल और सोशल मीडिया का दौर है। इस दौर ने जहाँ आम इंसान को अपनी बात रखने का एक खुला मंच दिया है,वहीं साहित्य के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व और चिंताजनक संकट भी खड़ा कर दिया है। कभी साधना,तपस्या और गंभीर वैचारिक मंथन का विषय रहा साहित्य,आज ‘लाइक’, ‘शेयर’ और ‘इंस्टेंट फेम’ का शिकार हो चुका है।

फेसबुक,इंस्टाग्राम और वॉट्सऐप के दौर में रातों-रात कवियों और लेखकों की एक ऐसी बाढ़ आ गई है,जिसने साहित्य की मूल आत्मा को ही संकट में डाल दिया है। हैरत की बात यह है कि आजकल सोशल मीडिया पर हर दूसरा व्यक्ति साहित्यकार/कवि और लेखक बना बैठा है। दो-चार लाइनें तुकबंदी की नहीं कि खुद को ‘वरिष्ठ कवि’ या ‘महान लेखक’ घोषित कर दिया जाता है। एक महाकवि तो ऐसे हैं जिन्हें पिछले मात्र चार सालों में ही आठ हजार अवार्ड मिल चुके हैं। लेखन में जो गहराई,अध्ययन और भाषा की मर्यादा होनी चाहिए, वह अब गायब होती जा रही है।

अब मापदंड यह नहीं है कि आपने कितना उत्कृष्ट लिखा है,बल्कि यह है कि आपकी पोस्ट पर कितने ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ आए हैं।एक-दूसरे की रचनाओं पर झूठी वाह-वाही और “अति सुंदर”, “लाजवाब” जैसे कमेंट्स का एक ऐसा व्यापार चल रहा है,जिसने वास्तविक आलोचना और सुधार की गुंजाइश को ही खत्म कर दिया है।

लिखना भले कुछ न आता हो,लेकिन डिजिटल पीआर के दम पर लोग खुद को स्थापित कर रहे हैं।एक समय था जब साहित्यिक गोष्ठियाँ या कवि सम्मेलन वैचारिक चेतना के केंद्र होते थे।वहाँ रचनाओं पर गंभीर चर्चा होती थी,वरिष्ठों से सीखने को मिलता था।

पुस्तक चर्चा हुआ करती थी। लेकिन आज की गोष्ठियों का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है।आज ये गोष्ठियाँ साहित्य साधना के लिए नहीं,बल्कि ‘नेटवर्किंग’ और ‘फोटो सेशन’ के लिए आयोजित की जाती हैं। यहाँ तक अब तो बड़े होटलों में तफरीह लेने के लिए कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और वह भी पूरे ताम-झाम के साथ।मंच पर पैर रखते ही सबसे पहले कैमरे तलाशे जाते हैं,ताकि फेसबुक पर लाइव जाया जा सके या तुरंत तस्वीरें पोस्ट की जा सकें। एक-दूसरे से वीडियो रिकार्डिंग करवाई जाती है ताकि आनन-फानन में स्टेटस पर लगाई जा सके।

गोष्ठी में कोई दूसरा क्या पढ़ रहा है,किसकी रचना पढ़ रहा है,तोड़-मरोड़कर पढ़ रहा है या चुराकर पढ़ रहा है,इससे किसी को कोई सरोकार नहीं होता?यहाँ तक उस गोष्ठी में बैठे एकाध सम्मानित साहित्यकार को भी। बस अपनी रचना पढ़ी,अपनी तस्वीरें खिंचाईं और जलपान की तरह बढ़ो। गरिमा और गंभीरता की जगह अब सिर्फ शोर और दिखावे ने ले ली है।

आज के आभासी साहित्यिक दौर का सबसे दुखद पहलू है पुरस्कारों और सम्मानों का बाजारीकरण।आज गली-मोहल्लों और सोशल मीडिया के ग्रुप्स में ऐसी संस्थाएं कुकुरमुत्तों की तरह उग आई हैं,जो चंद रुपयों के बदले “साहित्य रत्न”, “कवि शिरोमणि” या “शब्द शिल्पी” ‘कोहिनूर अवार्ड’ जैसे बड़े-बड़े अलंकरण बांट रही हैं।

इसकी कड़वी हकीकत यह है कि यह सब रजिस्ट्रेशन फीस या सहयोग राशि के नाम पर पचास रुपये से लेकर दो-चार हजार रुपये दीजिए,मंच पर आइए,शॉल ओढ़िए,मोमेंटो लीजिए और फेसबुक पर चमकीली तस्वीर डालकर खुद को स्थापित लेखक घोषित कर दीजिए।यही हाल गोष्ठियों का हो रहा कि तू मुझे बुला,मैं तुझे बुलाऊँ और तू मुझे शॉल ओढ़ा,मैं तुझे ओढ़ाऊँ और तो और तू मेरी तारीफ कर और मैं तेरी तारीफ करूँ?ऐसे-ऐसे तथाकथित साहित्यकार/कवि,साहित्य सेवक गली-गली पाए जाते हैं जिन्होंने अपने साहित्य क्षेत्र में पदार्पण करने के मात्र एक-दो वर्षों में ही दर्जनों बड़े राष्ट्रीय कार्यक्रम कर दिए हैं।

गजब है ऐसे लोगों का,यहाँ तक उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाने लगा है।अरे वाह!कैसे कर लेते हैं ऐसे लोग इतना सब?इस प्रवृत्ति ने उन सच्चे साधकों का अपमान किया है जो जीवन भर साहित्य की निस्वार्थ सेवा करते रहे

जब पुरस्कार योग्यता के आधार पर नहीं,बल्कि जेब के आकार पर मिलने लगें,तो साहित्य का पतन निश्चित है।यही कारण है कि बिना कुछ ठोस लिखे भी कई लोग लगातार ‘चमकते’ जा रहे हैं।आज के दौर की सबसे बड़ी बिडम्बना यह है कि इस पूरे परिदृश्य का सबसे चिंताजनक परिणाम यह है कि आज लिखने वाले लाखों हैं,लेकिन पढ़ने वाले मुट्ठी भर,शायद मुठ्ठी भर भी नहीं। हर व्यक्ति अपनी किताब छपवाने और उसे प्रमोट करने में व्यस्त है, लेकिन किसी दूसरे की किताब या स्तरीय साहित्य को पढ़ने का समय किसी के पास नहीं है।

पुस्तकालय खाली पड़े हैं,पत्रिकाओं के ग्राहक कम हो रहे हैं और गंभीर विमर्श की किताबें धूल खा रही हैं।जब पाठक ही नहीं बचेंगे,तो केवल लेखकों की भीड़ से साहित्य समृद्ध नहीं हो सकता।सोशल मीडिया की ‘रील्स’ और ‘शॉर्ट्स’ ने लोगों की एकाग्रता को इतना कम कर दिया है कि वे दो पन्ने का गंभीर लेख पढ़ने का धैर्य खो चुके हैं।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है,लेकिन आज इस दर्पण पर दिखावे और बाजारवाद की धूल जम चुकी है। अगर हमें साहित्य की गरिमा को बचाना है,तो इस आभासी चमक से बाहर निकलना होगा। लेखकों को आत्ममुग्धता छोड़कर गंभीर अध्ययन की ओर लौटना होगा और संस्थाओं को पुरस्कारों की इस ‘सेल’ को बंद करना होगा।

हाँ,चमकना बुरा नहीं है,लेकिन वह चमक आपके शब्दों की गहराई और विचारों की प्रखरता से आनी चाहिए,न कि फेसबुक के लाइक या पैसों से खरीदे गए मोमेंटो से,तोड़-मरोड़कर बनाई गई कविता-गजल से या किसी नामचीन शायर का नाम लिए बिना उसकी रचना सुनाने से।जब तक हम वापस ‘पाठक’ बनने की आदत नहीं डालेंगे,तब तक एक सच्चे ‘लेखक’ का जन्म नहीं हो सकता।साहित्य के संदर्भ में यह बात भी याद रखिए कविता/शायरी या लेखन वही होता है जिसकी दिशा हमें प्रेमचंद, धूमिल, मंगलेश डबराल, हरभगवान चावला ने दिखाई है।

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