लड़के को आपका असिस्टेंट नहीं, आपका स्टार होना चाहिए

किस्सा फिल्मों का

लड़के को आपका असिस्टेंट नहीं, आपका स्टार होना चाहिए

जावेद अख्तर ने आमिर खान के बारे में नासिर हुसैन से कहा था

नासिर हुसैन उस वक्त ज़बरदस्त नाम की अपनी फ़िल्म का निर्माण कर रहे थे जब एक दिन जावेद अख्तर उनसे मिलने आए। इत्तेफ़ाक से उस वक्त नासिर हुसैन के पास आमिर खान भी बैठे थे। आमिर भी तब नासिर हुसैन के साथ ज़बरदस्त में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम कर रहे थे। आमिर को देख जावेद अख्तर ने नासिर हुसैन से पूछा कि ये लड़का कौन है? नासिर हुसैन ने बताया कि ये उनका भतीजा है। यानि ताहिर हुसैन का बेटा आमिर खान है। और फिलहाल ये मेरा असिस्टेंट है। तब जावेद अख्तर ने नासिर हुसैन से बोला कि इस लड़के को आपका असिस्टेंट नहीं, आपका स्टार होना चाहिए।

कुछ दिनों बाद नासिर हुसैन की मुलाक़ात अपने एक पुराने दोस्त से हुई। और आमिर खान भी तब नासिर साहब के साथ ही थे। नासिर हुसैन के दोस्त ने जब आमिर के बारे में पूछा तो नासिर साहब ने उससे कहा कि ये आमिर है। मेरा भतीजा। ये मेरी अगली फ़िल्म का स्टार भी है। नासिर हुसैन की ये बात सुनकर आमिर खान मन ही मन बहुत खुश हुए। उन्हें यकीन हो गया कि उनके अंकल उन्हें लेकर कोई फ़िल्म बनाने जा रहे हैं। कुछ ही दिन बाद नासिर हुसैन ने आमिर खान को बता भी दिया कि वो उनके साथ एक लव स्टोरी बेस्ड फ़िल्म शुरू करने जा रहे हैं।

ये वही वक्त भी था जब नासिर हुसैन के पुत्र मंसूर खान भी एक स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे। मंसूर खान ही उसे डायरेक्ट भी करने वाले थे। उस स्क्रिप्ट पर बनने वाली फ़िल्म का नाम मंसूर ने रखा था ‘जो जीता वोही सिकंदर।’ दूसरी तरफ़, आमिर खान के साथ मंसूर के पिता नासिर हुसैन जो फ़िल्म बनाने जा रहे थे उसका नाम था नफ़रत के वारिस। मगर तभी नासिर हुसैन की तबियत खराब हो गई। चूंकि उनकी बायपास सर्जरी हुई थी तो अब वो किसी फ़िल्म को डायरेक्ट करने की स्थिति में नहीं थे।

एक दिन नासिर हुसैन ने अपने बेटे मंसूर खान से कहा कि तुम्हारी स्क्रिप्ट अभी पूरी तरह तैयार नहीं है। मेरी स्क्रिप्ट रेडी है। तो तुम ही मेरी फ़िल्म को डायरेक्ट कर लो। मंसूर इसके लिए राज़ी तो हो गए। लेकिन उन्होंने पिता नासिर हुसैन से ये भी कहा कि वो अपने हिसाब से स्क्रिप्ट में बदलाव करेंगे। नासिर खान की उस स्क्रिप्ट पर उनके अलावा आमिर खान और उनकी बेटी नुज़हत खान भी काम कर रही थी। मगर अब चूंकि मंसूर खान उस फ़िल्म को डायरेक्ट करने जा रहे थे, तो स्क्रिप्ट मंसूर ने उस स्क्रिप्ट में बहुत से बदलाव कर दिए।

यूं तो नासिर हुसैन मंसूर के किए गए कई बदलावों से सहमत नहीं थे। पर चूंकि डायरेक्शन मंसूर ही करने वाले थे। इसलिए उन्होंने कोई खास विरोध नहीं किया। शूटिंग शुरू होने से पहले फ़िल्म का नाम भी बदला गया। जैसा कि ऊपर बताया है एक जगह, पहले फ़िल्म का नाम ‘नफ़रत के वारिस’ था। मगर अब नाम बदलकर ‘कयामत से कयामत तक’ कर दिया गया था। लेकिन ये नाम मंसूर खान ने नहीं बदला था। ये नाम खुद नासिर हुसैन ने बदला था। और मंसूर खान को भी ये नाम सही लगा था।

जिस वक्त नासिर हुसैन ने ‘कयामत से कयामत तक’ की कहानी पर काम करना शुरू किया था उस वक्त उनकी प्लानिंग थी कि वो संजीव कुमार और शम्मी कपूर को कहानी के हीरो-हीरोइन के रोल में लेंगे। मगर मंसूर खान के हाथ में जब फ़िल्म के निर्माण का ज़िम्मा आया तो उन्होंने अपने पिता से साफ़ कह दिया कि फ़िल्म के कलाकार वो ही चुनेंगे। वैसे भी वो इतने सीनियर कलाकारों के साथ काम नहीं कर सकेंगे। इस तरह शम्मी कपूर साहब का पत्ता इस फ़िल्म से कट गया। संजीव कुमार जी तो पहले ही दुनिया छोड़कर चले गए थे।

साल 1966 में नासिर हुसैन ने एक फ़िल्म बनाई थी जिसमें शम्मी कपूर ही हीरो थे। उस फ़िल्म का नाम था तीसरी मंज़िल। वो पहला मौका था जब नासिर साहब ने संगीत का ज़िम्मा पंचम दा को दिया था। तीसरी मंज़िल के बाद तो नासिर हुसैन ने जो भी फ़िल्म बनाई, उसका गीत-संगीत पंचम दा से ही कंपोज़ कराया। लेकिन ‘कयामत से कयामत तक’ फ़िल्म के लिए उनके बेटे मंसूर खान ने आनंद-मिलिंद को चुना था, जिनके साथ वो एक शॉर्ट फ़िल्म बना चुके थे। वैसे तो आनंद-मिलिंद के फ़िल्म करियर का आगाज़ पहले ही हो चुका था। मगर उन्हें कोई सफ़लता तब तक नहीं मिली थी।

जब आमिर खान की हीरोइन चुनने की बारी आई तो कई लड़कियों के ऑडिशन्स लिए गए। आमिर खान खुद भी सैलेक्टर्स में से एक थे। बताया जाता है कि आमिर खान ने ही जूही चावला का नाम सुझाया था कयामत से कयामत तक फ़िल्म में उनकी हीरोइन के रोल के लिए। जूही चावला सल्तनत नाम की फ़िल्म में काम कर चुकी थी। जबकी आमिर खान भी केतन मेहता की होली फ़िल्म में नज़र आ चुके थे। जूही चावला के बारे में ये भी जान लीजिए कि उन्हें बी.आर. चोपड़ा ने अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट महाभारत में द्रोपदी का किरदार निभाने के लिए जूही चावला को सिलेक्ट किया था। लेकिन ‘कयामत से कयामत तक’ फ़िल्म ऑफ़र मिलने पर जूही चावला ने महाभारत शो छोड़ दिया।

जब दिलीप ताहिल को आमिर खान के पिता का रोल निभाने के लिए चुना गया तो उन्होंने नासिर खान से बात की। दलीप ताहिल ने नासिर खान से पूछा कि उन्हें ही आमिर खान का रोल निभाने के लिए क्यों चुना गया? नासिर खान ने उन्हें बताया कि बुनियाद सीरियल में जो काम उन्होंने किया था वो सबको बहुत पसंद आया था। इसिलिए आमिर के पिता का रोल निभाने को उन्हें चुना गया है। आलोक नाथ को भी बुनियाद सीरियल में उनके शानदार काम के चलते ही ‘कयामत से कयामत तक’ फ़िल्म में चुना गया था।

जूही चावला के पिता के रोल के लिए चुना गया था गोगा कपूर को। फ़िल्म के अन्य कलाकारों को भी चुन लिया गया, जिनमें नामी खलनायक अजीत साहब के बेटे शहज़ाद भी थे। शहज़ाद आमिर खान के दोस्तों में से एक थे। आमिर खान के छोटे भाई फैज़ल खान को भी एक छोटा सा रोल इस फ़िल्म में निभाने के लिए लिया गया था। और ये भी जान लीजिए कि आमिर और मंसूर के भतीजे, यानि नुज़हत खान और अनिल पाल के बेटे इमरान खान भी इस फ़िल्म में नज़र आए थे। इमरान ने आमिर खान के बचपन का रोल इस फ़िल्म में निभाया था।

आमिर खान 1986 में ही रीना दत्ता से शादी कर चुके थे। मगर उनकी शादी की बात छिपाकर रखी गई थी। और ये तो आप भी जानते होंगे कि इस फ़िल्म के एक बेहद लोकप्रिय गीत ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा’ में रीना दत्ता भी दिखाई देती हैं। अगली बार जब यूट्यूब पर कभी ये गाना आप देखें तो रीना दत्ता के बराबर वाली लड़की पर गौर कीजिएगा। वो नासिर खान की बेटी नुज़हत खान हैं। नुज़हत आपको दिखेंगी इस गीत के दूसरे अंतरे में। इस गीत से जुड़ी एक और रोचक बात ये है कि आमिर खान जो गिटार इस गीत में थामे दिखते हैं, ये वही गिटार है जिसे फ़िल्म यादों की बारात में उनके कज़िन तारिक़ बजाते दिखते हैं। ये भी इत्तेफ़ाक ही है कि उस फ़िल्म में आमिर खान ने ही तारिक़ के बचपन का रोल जिया था।

नासिर हुसैन ने जब इस फ़िल्म की कहानी लिखनी शुरू की थी तब उन्होंने एंडिंग यही रखी थी कि आखिर में हीरो और हीरोइन की मौत हो जाती है। मगर बाद में नासिर हुसैन को लगने लगा कि फ़िल्म की हैप्पी एंडिंग होनी चाहिए। उनके कई डिस्ट्रीब्यूटर्स भी उनसे यही बात कह चुके थे। लेकिन मंसूर खान और आमिर खान को ये बात सही नहीं लग रही थी। इन दोनों का कहना था कि अगर फ़िल्म को यादगार बनाना है तो एंडिंग सैड ही होनी चाहिए। यानि हीरो-हीरोइन आखिरी में मरने चाहिए। आखिरकार तय हुआ कि दोनों तरह की एंडिंग शूट की जाएगी। फिर जो सही लगेगी उसे फ़िल्म में जोड़ा जाएगा।

हैप्पी एंडिंग में आमिर-जूही तो ज़िंदा रहते हैं। लेकिन गोगा कपूर की डेथ हो जाती है। कहते हैं कि मंसूर खान तो हैप्पी एंडिंग के इतना खिलाफ़ थे कि उन्होंने अपने पिता नासिर हुसैन से कह दिया था कि अगर फ़िल्म में हैप्पी एंडिंग रखी जाएगी तो बतौर डायरेक्टर उनका नाम नहीं दिया जाए। जब हैप्पी एंडिंग शूट हो रही थी तब मंसूर खान दूर जाकर बैठ गए थे। आमिर खान ने हैप्पी एंडिंग को शूट करने का ज़िम्मा संभाला था। बेटे की उन बातों ने नासिर हुसैन को परेशान कर दिया। आखिरकार नासिर साहब ने डॉक्टर राही मासूम रज़ा को ये फ़िल्म दिखाई।

डॉक्टर राही मासूम रज़ा को दोनों एंडिंग्स दिखाई गई। फिर नासिर हुसैन ने उनसे पूछा कि कौन सी एंडिंग रखी जानी चाहिए। रज़ा साहब ने उनसे कहा कि एंडिंग कोई भी हो, ये फ़िल्म तो हिट है। लेकिन हैप्पी एंडिंग में ये फ़िल्म एक आम हिट फ़िल्म होगी। और ट्रैजिक एंडिग में ये एक क्लासिक फ़िल्म कहलाएगी। लोग इसे सालों तक याद करेंगे। रज़ा साहब की बात मानकर नासिर हुसैन ने ‘कयामत से कयामत तक’ फ़िल्म में ट्रैजिक एंडिंग ही रखी। लेकिन एक चुनौती भी उन्हें फेस करनी पड़ी। बॉम्बे टैरीटरी में कोई भी डिस्ट्रीब्यूटर इस फ़िल्म को खरीदने को तैयार नहीं हो रहा था। नासिर हुसैन ने खुद ही बॉम्बे टैरीटरी में फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूट करने का फ़ैसला किया।

आमिर खान, राज ज़ुत्शी और जूही चावला ने अलग अंदाज़ में इस फ़िल्म की मार्केटिंग की। आमिर और राज ज़ुत्शी ऑटो रिक्शा पर फ़िल्म के पोस्टर लगा रहे थे। इस दौरान कई ऑटो वालों ने अपने ऑटो पर पोस्टर लगाने से मना भी कर दिया था। जूही चावला को भी ऐसा ही कुछ फेस करना पड़ा था। जूही टैक्सीज़ पर इस फ़िल्म के पोस्टर्स लगा रही थी। तब उन्हें भी कई टैक्सी ड्राइवर्स ने अपनी टैक्सी पर फ़िल्म के पोस्टर ना लगाने को कहा था। फ़िल्म के कई बड़े-बड़े बैनर्स भी लगाए थे मुंबई में, जिनमें से कुछ पर लिखा था ‘हू इज़ आमिर खान? आस्क द गर्ल नैक्स्ट डोर।’

‘कयामत से कयामत तक’ रिलीज़ हुई तो इसे बढ़िया रेस्पॉन्स मिला। नासिर हुसैन ने आमिर खान, मंसूर खान, जूही चावला और राज ज़ुत्शी को साथ लिया और देश के अलग-अलग शहरों के सिनेमाघरों में जाकर इंटरवल के दौरान लोगों से संवाद किया। जब ये लोग बैंगलोर के एक सिनेमाघर पहुंचे तो वहां के दर्शक इनसे ज़्यादा वक्त तक रुकने की बात कहने लगे। मगर ये लोग नहीं रुके। इस बात से दर्शक भड़क गए। और उस सिनेमाघर में खूब हंगामा हुआ। कहा जाता है कि कुछ लोगों ने तो इनकी गाड़ियों पर पत्थर भी फेंके थे।

आज कयामत से कयामत तक फ़िल्म के 38 साल पूरे हो गए हैं। 29 अप्रैल 1988 के दिन ये फ़िल्म रिलीज़ हुई थी। कहानी के साथ-साथ गाने भी इस फ़िल्म के बहुत पसंद किए गए थे। आनंद-मिलिंद के करियर के लिए ये फ़िल्म बहुत बड़ा टर्निंग पॉइन्ट साबित हुई। और सिर्फ़ आनंद-मिलिंद के लिए ही नहीं, उदित नारायण के लिए भी ये फ़िल्म बहुत भाग्यशाली साबित हुई। उदित नारायण सफ़ल प्लेबैक सिंगर इसी फ़िल्म के गीत गाने के बाद ही बनना शुरू हुए थे। ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा’ गीत के लिए उदित जी को उनके करियर का पहला फ़िल्मफ़ेयर मेल प्लेबैक सिंगर अवॉर्ड मिला था।

मजरूह सुल्तानपुरी जी को इसी गीत के लिए बेस्ट लिरिसिस्ट अवॉर्ड दिया गया था। जबकी इस फ़िल्म के लिए आनंद-मिलिंद को उनके करियर का पहला और इकलौता बेस्ट म्यूज़िक डायरेक्टर अवॉर्ड दिया गया था। इस फ़िल्म को ही उस साल का ‘बेस्ट फ़िल्म’ अवॉर्ड भी दिया गया था। इसके डायरेक्टर मंसूर खान को बेस्ट डायरेक्टर, आमिर खान को बेस्ट मेल डेब्यू अवॉर्ड दिया गया था। जूही चावला को बेस्ट फ़ीमेल डेब्यू। हालांकि आमिर-जूही को ये अवॉर्ड दिए जाने का लॉजिक मुझे समझ नहीं आया। क्योंकि ये दोनों तो पहले ही डेब्यू कर चुके थे।

आमिर खान होली में और जूही चावला सल्तनत में काम कर चुकी थी। खैर, ये दोनों बेस्ट एक्टर व बेस्ट एक्ट्रेस कैटेगरी में भी नॉमिनेट हुए थे। मगर अवॉर्ड इन्हें नहीं मिला था। उस साल बेस्ट एक्टर अवॉर्ड तेज़ाब फ़िल्म के लिए अनिल कपूर को व बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड ‘खून भरी मांग’ फ़िल्म के लिए रेखा को दिया गया था। ‘कयामत से कयामत तक’ के स्क्रीनप्ले के लिए नासिर हुसैन को बेस्ट स्क्रीनप्ले अवॉर्ड व किरण देवहंस को बेस्ट सिनेमैटोग्राफ़ी अवॉर्ड भी दिया गया था। ये किरण देवहंस की पहली फ़िल्म थी। उस साल के राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में ‘कयामत से कयाम तक’ फ़िल्म को ‘बेस्ट पॉप्युलर फ़िल्म प्रोवाइडिंग हॉलसम एंटरटेनमेंट’ अवॉर्ड दिया गया था। और आमिर खान को ‘स्पेशल मेंशन’ दिया गया था।

कयामत से कयामत तक फ़िल्म अल्का याज्ञनिक के करियर के लिए भी बहुत अहम रही थी। इस फ़िल्म के चार गीतों में फ़ीमेल वॉइस की ज़रूरत थी। इन चारों गीतों को अल्का जी ने ही आवाज़ दी थी। इस तरह ये पहली फ़िल्म बनी जिसमें फ़ीमेल वॉइस सिर्फ़ अल्का याज्ञ्निक की ही ली गई थी। कयामत से कयामत तक के बजट की सटीक जानकारी देना फिलहाल मुश्किल है। मगर ये 1988 की तीसरी सबसे सफ़ल फ़िल्म थी। उस साल नंबर वन पर रही थी तेज़ाब। नंबर दो पर रही थी शहंशाह। किस्सा टीवी फेसबुक वॉल से साभार

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