शिवाजी सावंतः जिनकी ‘मृत्युंजय’ के गुजराती और मलयालम अनुवादों को मिला साहित्य अकादमी पुरस्कार

व्यक्तित्व

शिवाजी सावंतः जिनकी ‘मृत्युंजय’ के गुजराती और मलयालम अनुवादों को मिला साहित्य अकादमी पुरस्कार

भारतीय ज्ञानपीठ का मूर्तिदेवी पुरस्कार पाने वाले पहले मराठी लेखक थे शिवाजी सावंत

राहुल मिश्रा

कोल्हापुर की एक पुलिस चाल। एक कमरा। बड़े भाई के साथ रहता एक नौजवान मास्टर।
रात को स्कूल की कॉपियां जांचने के बाद वो एक और कागज निकालता था।
घर में किसी को नहीं बताया कि उस कागज पर क्या लिख रहा है।
यह सिलसिला सात साल चला।
फिर एक दिन उसने कलम रख दी।
उसने तय किया कि जिस युद्धभूमि के बारे में वो लिख रहा है, उसे अपनी आंखों से देखे बिना अब एक पंक्ति और नहीं लिखेगा।
जेब में उस वक्त पचास रुपये थे।
वो उन्हीं पचास रुपयों में कुरुक्षेत्र चला गया।


यह ब्योरा उनके जीवन पर आई एक समाचार एजेंसी की रिपोर्ट में दर्ज है, और मुझे यह अभी तक एक ही जगह मिला है। इसलिए इसे उसी तरह रखिए, जिस तरह इसे दर्ज किया गया है।
अब उसी आदमी की एक और बात।
पिछले साल एक हिंदी फिल्म ने दुनिया भर में करीब आठ सौ करोड़ रुपये कमाए। वो 2025 की सबसे बड़ी हिंदी फिल्मों में से एक थी।
उसके शुरुआती क्रेडिट में एक लाइन आती है। उसमें एक किताब का नाम है, और उसे लिखने वाले का।
करोड़ों लोगों ने वो फिल्म देखी।
उस आदमी का नाम कितनों को याद रहा?
अब शुरू से शुरू करते हैं।


कोल्हापुर जिला। आजरा गांव। 31 अगस्त 1940।
साधारण किसान परिवार। घर में पैसा नहीं। बचपन में जो मिला, वो मां से मिला कथा और कीर्तन। पुराणों की कहानियां उसने किताब में नहीं, मां की आवाज में सुनीं।
लड़का पढ़ने में ठीक था, पर मैदान में बेहतर। कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी। आजरा के वेंकटराव हाईस्कूल में उसका नाम इसी वजह से चलता था।
फिर कोल्हापुर आया। एफ.वाई.बी.ए. में दाखिला लिया।
और उसी साल, हिंदी के पाठ्यक्रम में, उसके हाथ एक खंडकाव्य लगा।
नाम था कर्ण। लिखा था केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ ने।
एक मराठी लड़का, एक हिंदी खंडकाव्य, और महाभारत का वो आदमी जिससे हर दरवाजे पर पहला सवाल यही पूछा गया कि तुम पैदा कहां हुए।
उस दिन जो चिंगारी गिरी, वो सात साल जलती रही।
किताब का नाम मृत्युंजय।
लिखने वाले का नाम शिवाजी गोविंदराव सावंत।
अब वो बात, जो हिंदी में लगभग कोई नहीं बताता।
जब मृत्युंजय छपी, तो उसकी प्रस्तावना में सावंत ने दो कृतियों का कर्ज कृतज्ञता के साथ माना।
एक थी केदारनाथ मिश्र की कर्ण।
और दूसरी थी रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की रश्मिरथी।
यानी मराठी की सबसे बड़ी पौराणिक कादंबरी के पहले पन्ने पर हिंदी के दो कवियों का नाम दर्ज है। जिस भाषा में आप यह पोस्ट पढ़ रहे हैं, उसी भाषा ने उस किताब को पहली आग दी थी।
पर पहले पेट का सवाल था।


पैसे खत्म हो गए। पढ़ाई आगे नहीं बढ़ी। उसने टाइपिंग सीखी, शॉर्टहैंड सीखी, और कोर्ट में क्लर्क की नौकरी पकड़ ली। सुबह से शाम दूसरों के मुकदमों की नकल उतारना।
फिर 1962 में उसने वो नौकरी छोड़कर कोल्हापुर की राजाराम प्रशाला में मास्टरी शुरू की।
और उसी रिपोर्ट में एक वजह दर्ज है, जिस पर मैं देर तक अटका रहा।
तनख्वाह ज्यादा नहीं थी। उसने वो नौकरी इसलिए चुनी कि वहां से पुस्तकालय पास पड़ते थे।
एक आदमी ने अपने पूरे करियर का फैसला इस आधार पर किया कि किताबें कितनी दूर हैं।
बारह साल वो उसी स्कूल में पढ़ाता रहा। और उन्हीं बारह सालों के भीतर, चुपचाप, वो किताब बनती रही।
अब क्यों कर्ण?
इसका कोई दर्ज जवाब मुझे नहीं मिला। जो आगे लिख रहा हूं वो मेरी अपनी पढ़त है, तथ्य नहीं।
कर्ण महाभारत का वो पात्र है जिसे कभी उसके काम से नहीं तोला गया। मराठी पाठक आज भी उसके बारे में एक ही वाक्य दोहराते हैं दुनिया ने उसे सूतपुत्र कहकर हीन ठहराया। धनुर्विद्या की परीक्षा में नहीं, वंश की परीक्षा में वो बार-बार फेल कराया गया।
और आजरा के एक किसान का बेटा, जिसने एफ.वाई.बी.ए. से आगे पढ़ाई नहीं की, जो टाइपिंग सीखकर क्लर्क बना, जो स्कूल में कॉपियां जांचता था मुझे लगता है उससे भी लोग यही पूछते होंगे। तुम कौन होते हो महाभारत पर उपन्यास लिखने वाले।
शायद इसीलिए उसने छुपकर लिखा।
1967 में किताब छपी।
अब नाम पर ठहरिए। मृत्युंजय। मृत्यु और जय। मृत्यु को जीत लेने वाला।
कर्ण जीता नहीं था। वो कुरुक्षेत्र में मारा गया, अपने रथ का पहिया मिट्टी से निकालते हुए, निहत्थे। पर सावंत ने अपनी किताब का नाम हार पर नहीं रखा।
उन्होंने उस आदमी को वो नाम दिया जो उसे जिंदगी ने कभी नहीं दिया।
अब समझिए कि किताब बनी कैसे।
मृत्युंजय में कोई सर्वज्ञ लेखक बैठकर कहानी नहीं सुनाता। किताब छह लोगों के अपने-अपने स्वगत कथनों से बनी है कर्ण, कुंती, दुर्योधन, वृषाली, शोण और श्रीकृष्ण।
यानी कर्ण की मां, कर्ण की पत्नी, कर्ण का पालक भाई, कर्ण का दोस्त, और वो आदमी जो सब जानता था और चुप रहा।
एक आदमी को समझने के लिए सावंत ने उसके आसपास खड़े लोगों को बोलने दिया।
यह तरकीब नहीं है। यह सलीका है। और यही वजह है कि किताब आज तक जिंदा है।
महाराष्ट्र में उन्हें उसी दिन से नया नाम मिल गया मृत्युंजयकार।
फिर किताब भाषाएं पार करने लगी। हिंदी, अंग्रेजी, कन्नड़, गुजराती, मलयालम।
और यहां एक बात है जो बहुत कम लोग जानते हैं।
मृत्युंजय के गुजराती अनुवाद को साहित्य अकादमी का अनुवाद पुरस्कार मिला। फिर मलयालम अनुवाद कर्णन को भी वही पुरस्कार मिला।
यानी वो किताब दूसरी भाषाओं में जाकर भी सम्मान कमाकर लौटी।
1996 में उस पर धारावाहिक बना, जिसे चाणक्य वाले चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने निर्देशित किया।
और सावंत ने नौकरी नहीं छोड़ी।
1974 में वो पुणे आए और महाराष्ट्र सरकार के शिक्षा विभाग की पत्रिका लोकशिक्षण से जुड़ गए। दूसरों का लिखा दुरुस्त करते रहे।
सिर्फ लेखन पर जीने का फैसला उन्होंने 1983 में लिया, जब स्वेच्छा से नौकरी छोड़ दी।
सत्तर के दशक के आखिर में उन्होंने वो किताब लिखी जो आगे चलकर उनके नाम को पूरे मुल्क तक ले जाने वाली थी छावा। संभाजी महाराज के जीवन पर।
और साल 2000 में युगंधर, जिसमें उन्होंने श्रीकृष्ण को भगवान की तरह नहीं, एक रणनीतिकार की तरह पढ़ा। यह मेरी पढ़त है, उनका दावा नहीं।
अब एक बात जो लगभग हर जगह गलत छपती है।
आपने कई जगह पढ़ा होगा कि शिवाजी सावंत को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था।
नहीं मिला।
उन्हें 1994 में भारतीय ज्ञानपीठ का मूर्तिदेवी पुरस्कार मिला था। ज्ञानपीठ संस्था देती है, ज्ञानपीठ पुरस्कार नहीं। दोनों अलग सम्मान हैं।
और यह फर्क छोटा नहीं है, क्योंकि मूर्तिदेवी पाने वाले वो पहले मराठी लेखक थे। यह अपने आप में इतनी बड़ी बात है कि उसे किसी और पुरस्कार का नाम उधार लेने की जरूरत नहीं।
18 सितंबर 2002। गोवा।
वो अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद के लिए प्रचार कर रहे थे। सम्मेलन कराड में होना था।
वहीं दिल की धड़कन रुक गई। बासठ बरस के थे।
एक आदमी जिसने अपनी सबसे बड़ी किताब चुपचाप, अकेले, छुपकर लिखी थी आखिरी दिनों में साहित्य की सबसे शोरगुल वाली कुर्सी के लिए लोगों से वोट मांग रहा था।
और अब वो हिस्सा, जो उन्होंने नहीं देखा।
14 फरवरी 2025। उनकी एक किताब पर बनी हिंदी फिल्म सिनेमाघरों में लगी। दुनिया भर में करीब आठ सौ करोड़।
जिस आदमी ने वो किताब लिखी थी, उसे गुजरे तेईस साल हो चुके थे।
उसने वो पैसा नहीं देखा। वो भीड़ नहीं देखी। सिनेमाहॉल में लोगों को रोते हुए नहीं देखा।
पर परदे पर उसका नाम जरूर आया। आजरा के उस किसान के बेटे का नाम।
घर में विरासत भी चलती रही। युगंधर का अंग्रेजी अनुवाद उनकी अपनी बेटी ने किया कादंबिनी धरप ने, जो अमेरिका में रहती हैं।
जिस कृष्ण को पिता ने कोल्हापुर में मराठी में रचा, उसे बेटी ने सात समंदर पार अंग्रेजी में उतार दिया।
और आखिरी बात, जो मुझे इस पूरी रिसर्च में सबसे आखिर में मिली।
आजरा में उसी गांव में जहां वो पैदा हुए वहां के वाचन मंदिर की ओर से हर साल उनके नाम पर एक कादंबरी पुरस्कार दिया जाता है।
एक आदमी ने अपनी नौकरी इसलिए चुनी थी कि लाइब्रेरी पास थी।
आज उसके गांव की लाइब्रेरी उसके नाम पर पुरस्कार देती है।
हिसाब बराबर होने में साठ साल लगे, पर बराबर हुआ।
अब मेरी बात, छोटी सी।
मैं अठारह साल से खबरों के दफ्तर में हूं। दूसरों के लिखे को दुरुस्त करता हूं। अपने नाम की पंक्ति अकसर खबर में नहीं होती।
शायद इसीलिए सावंत की कहानी पढ़ते हुए मैं बार-बार अपने ही काम पर लौटता रहा।
सात साल किसी ने नहीं पूछा कि वो क्या लिख रहे हैं। साठ साल बाद भी कोई नहीं भूला कि उन्होंने क्या लिखा।
तीन बातें, जो मैं इस पूरी रिसर्च से निकालकर अपनी डायरी में रख रहा हूं।
एक। जो चीज आपको पैसा देती है और जो चीज आपको जिंदा रखती है, वो एक ही होना जरूरी नहीं। सावंत ने बारह साल स्कूल में हाजिरी लगाई और उन्हीं बारह सालों में मृत्युंजय लिखी।
दो। अधूरा काम छुपाकर रखने में कोई शर्म नहीं। तैयार होने से पहले दिखा देने पर वो अकसर मर जाता है।
तीन। जिस काम पर आपका नाम बाद में आएगा, उसकी मिट्टी आज अपने नाखूनों में लगानी पड़ती है।
यह कहानी उन तक पहुंचनी चाहिए जो अभी किसी दफ्तर में बैठकर, किसी और के काम के बीच, चुपचाप अपनी असली किताब लिख रहे हैं चाहे वो कोल्हापुर में हों, कोलकाता में, या किसी दूसरे मुल्क में, जहां घर से लाई हुई एक पुरानी किताब अब भी अलमारी में रखी है।

राहुल मिश्र के फेसबुक वॉल से साभार

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