जसवीर त्यागी की सात कविताएं

जसवीर त्यागी की सात कविताएं

इंसान

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इंसान रोना चाहता है
लेकिन अपार भीड़ में
कोई कन्धा उसे नसीब नहीं होता

जिस पर सिर रखकर
वह रो सके

मरता हुआ आदमी
जीना चाहता है

जिंदा आदमी
रोना चाहता है।

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अलग होना

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भरी परात से
एक दाना अलग जा गिरा

देखने वालों को
दूर से ही चमकता है
जमीन पर गिरा दाना

चमकने के लिए
कभी-कभी
भीड़ से अलग होना होता है।

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देखना

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एक दिन उसने कहा-
तुम कम हँसते हो

हँसा करो खुलकर
सुंदर लगते हो

उसकी बात सुनकर
मैं हँस दिया

उसने मुझे
हँसते हुए देखा

मैंने उसे
मेरी हँसी की चिंता करते देखा।

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गूंगी

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कभी-कभी
लंबे समय तक
कोई बात नहीं होती

न खुद से
और न किसी दूसरे से

बात न हो पाए
यह बड़ा संकट नहीं

बड़ा संकट है
बात करने की चाह
गूंगी हो जाये।

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अनेक अर्थ

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सुबह-शाम
ज्यों ही दूध का समय होता है
भैंस का लवारा खूँटे पर पैर पटकने लगता है

गले में बंधी रस्सी को
खींचता है अपनी माँ की ओर

दूधिया हाथों में लिए बाल्टी
इत्मीनान से आता है
लवारे को देता है ढील

बैचेनी और भूख से भरा लवारा
लपकता है माँ के थनों की ओर
भैंस चाटती-चूमती है लाडले को

कुछ ही देर में थनों में भर जाता है दूध
दूधिया तुरंत खींचता है लवारे को खूँटे पर

बच्चे को दूर जाता देख
भरे गले से रंभाती है भैंस
माँ और बच्चा देखते हैं
एक-दूसरे को तरस भरी निगाहों से

दूधिया खाली बाल्टी
और महीने की पहली तारीख देखता है

वैसे तो देखना शब्द है एक
लेकिन उसके अर्थ हैं अनेक।

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हिम्मत

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पड़ोस में रहने वाले एक आदमी के
पाँच बेटे और एक बेटी थी

तीन विवाहित बेटे
अलग-अलग दुर्घटनाओं में चल बसे
बिटिया भी ससुराल में सुखी नहीं

बुजुर्ग पति-पत्नी
साँसों की रस्सी पर
एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चलते हैं

मेरा उनके संग बैठने का मन होता है
उनसे बात करने की हिम्मत
मैं जुटा नहीं पाता।
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शेर-बेटा

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बारह वर्षीय बच्चे की
सप्ताह में तीन दिन डायलेसिस होती है

बच्चा हर बार
आना-कानी,ना-नुकुर करता है

रोग की रस्सी पर चलते बच्चे को
माता-पिता बाहों में भरकर कहते हैं-
तू हमारा शेर बेटा है

बच्चा हौसले से हाथ मिलाता हुआ
माता-पिता को एकटक देखता है

माता-पिता नन्हें शेर को
डॉक्टर और नर्स के साथ जाता हुआ देखते हैं।

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