दयाल सिंह मजीठिया के नाम परिवर्तन पर विरोध तेज, विरासत संरक्षण की मांग

दयाल सिंह मजीठिया के नाम परिवर्तन पर विरोध तेज, विरासत संरक्षण की मांग

वी.बी. अबरोल

 

संयुक्त पंजाब के महान पुत्र दयालसिंह मजीठिया की पुण्य स्मृति को ध्वस्त करने के निंदनीय प्रयत्न में लिप्त कुछ प्रभावशाली अवसरवादी तत्वों ने 9 साल पहले असफल होने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध दयाल सिंह कॉलेज (सायंकालीन) का नाम बदलने की नापाक कोशिश फिर शुरू कर दी है।

अत्यंत धनवान दयालसिंह इस मामले में बदकिस्मत थे कि उनको कोई संतान नहीं थी। वारिस न होने के कारण दौलत को अयाशी में उड़ाने की बजाय उन्होंने 3 ट्रस्ट बनाए। द ट्रिब्यून ट्रस्ट (अखबार), दयाल सिंह लाइब्रेरी ट्रस्ट व दयाल सिंह कॉलेज ट्रस्ट इन तीनों न्यासों के नाम से स्पष्ट है कि अपनी दूरदृष्टि से उन्होंने उसी समय समझ लिया था कि भविष्य में दुनिया पर ज्ञान और बुद्धि का राज होगा न कि शारीरिक शक्ति का।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि उस समय गुलामी का जुआ खींचती, उनकी प्यारी भारत माँ भविष्य में एक प्रमुख सम्मानित वैश्विक शक्ति बने दयाल सिंह ने ज्ञान की रचना और प्रसार करने वाले संस्थान बनाए जो समय के अनुरूप देश की नित नई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी क्षमताओं का नवीकरण भी करते रहे। यह अत्यंत पीड़ादायक है कि दयाल सिंह के वसीयत के इस निहितार्थ को समझकर हमारे

पड़ोसी देश पाकिस्तान में तो उनकी विरासत का सम्मान किया जाता है, उसको संजो कर रखा जाता है, वहीं उनके अपने देश में उनके नाम को ही मिटा देने के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। लाहौर में आज भी दयाल सिंह कॉलेज, दयाल सिंह लाइब्रेरी और दयाल सिंह मैंसन उसी तरह अपना काम कर रहे हैं जैसा विभाजन पूर्व करते थे। दयाल सिंह मेंशन पुराने लाहौर शहर के बीचों बीच व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है।

ट्रस्ट का अस्तित्व न रह जाने के कारण कॉलेज को अब सरकार चलाती है। इसका एकमात्र संकेत यह है कि कालिज के नाम में गवर्नमेंट शब्द जोड़कर उसे गवर्नमेंट दयाल सिंह कॉलेज कहा जाता है। विभाजन के बाद पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने लियाकत अली खान की करनाल वाली कोठी में 1949 से काम कर रहा दयाल सिंह कॉलेज अपनी वंशावली दयाल सिंह कॉलेज लाहौर से जोड़ता है जो उन्नीस सौ दस में स्थापित हुआ था।

जब कॉलेज ने करनाल में अपने हीरक जयंती समारोहों में शामिल होने के लिए लाहौर में कॉलेज के प्रिंसिपल को निमंत्रण पत्र भेजा तो वीजा संबंधी समस्याओं के कारण आने में असमर्थता जताते हुए उन्होंने भावुक होते हुए वहां की जानकारियां भेजीं। उन्होंने लिखा कि एक बार जनरल जिया राष्ट्रपति के पद पर होते हुए कॉलेज के किसी समारोह में आए तो केमिस्ट्री विभाग की प्रयोगशालाओं की खस्ता हालत देखकर तुरंत प्रयोगशालाओं के आधुनिकीकरण के लिए ₹2500000 के विशेष अनुदान की घोषणा की ।

2500000 आज कोई बड़ी चीज़ नहीं लगती पर उस समय बहुत बड़ी राशि थी। जिन दिनों मियाँ नवाज शरीफ पहली बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे। पंजाब के कुछ प्रमुख लोगों का एक दल कर्नल प्रताप सिंह के नेतृत्व में पाकिस्तान गया।

कर्नल प्रताप सिंह सरदार मोहिंदर सिंह गिल के पिता थे, जो केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे। कर्नल साहब के दल में द ट्रिब्यून अखबार के वरिष्ठ पत्रकार प्रभजोत सिंह भी शामिल थे। प्रभजोत सिंह ने यात्रा के अनुभवों के बारे में लिखते हुए बताया कि जब मियां साहब को उनकी यात्रा के बारे में पता चला तो उन्होंने सभी सदस्यों को लाहौर के नजदीक अपने फार्म हाउस पर ठहरने की दावत दी।मेहमानों के स्वागत के लिए वह स्वयं अपनी सारी व्यस्तताओं के बावजूद वहाँ उपस्थित रहे।

प्रभजोत ने लिखा कि उन्होंने हिम्मत कर अपने मेजबान से कुछ मांगने की इजाजत मांगी।जब मियां साहब ने पूछा कि वह क्या कर सकते हैं, तो पत्रकार महोदय ने जवाब दिया कि वह लाहौर में लगी दयाल सिंह की मूर्ति को चंडीगढ़ ले जाकर “दा ट्रिब्यून अखबार” के कार्यालय में प्रमुखता से लगाना चाहते हैं। इस पर नवाज शरीफ साहब ने भावुक होते हुए कहा कि आप और जो कुछ मांगना चाहते हैं, मांग सकते हैं पर उस महान शख्सियत की याद को वह किसी भी तरह लाहौर से नहीं जाने देंगे।

मजीठिया और लाहौर से जुड़े इन किस्सों को याद करते हुए और भी दुख होता है कि उनके अपने देश में उनकी याद को मिटाने की साजिश हो रही है, यह और भी कष्टदायक है कि दिल्ली वाले कॉलेज को नया नाम “बाबाबंदा सिंह बहादुर कॉलेज” देने का प्रस्ताव गुपचुप तरीके से पास कर दिया गया। यह साजिश रचने वालों ने शायद सोचा होगा कि दो महान ऐतिहासिक शख्सियतों को आमने सामने लाकर उन्होंने तुरुप का इक्का चल दिया है जिसकी किसी के पास कोई काट नहीं होगी,।

उनको यह समझ नहीं आ रहा कि यह न केवल दयालसिंह बल्कि बाबा बंदा सिंह बहादुर का भी घोर अपमान है। बाबा ने मुगलों द्वारा गुरु गोबिंद सिंह साहब के साहिब जादों को करूरता पूर्वक शहीद कर देने की जघन्यता के खिलाफ सारे पंजाब में माहौल बनाया था जिसकी सजा देने के लिए उनको भी शहीद कर दिया गया था।

बाबा बंदा सिंह बहादुर पंजाब के इतिहास की एक बड़ी शख्सियत हैं। उनको इस चालाकी और शैतानी से बाराय नाम श्रद्धांजलि नहीं दी जा सकती। यह श्रद्धांजलि नहीं बाबा का अपमान है, वे विनम्र और सम्मानजनक श्रद्धांजलि के हकदार हैं।

दिल्ली न केवल देश की राजधानी है बल्कि करोड़ों की आबादी वाला एक विशाल शहर बन गया है। ज्ञान विज्ञान की दुनिया में जो नित नई खोजें और आविष्कार हो रहे हैं। उनके साथ-साथ चलने के लिए ऐसी विशेष शिक्षा प्रदान करने वाले एक नए विश्वविद्यालय की जरूरत है जिसको बाबा बंदा सिंह बहादुर का नाम दिया जा सकता है। इसकी आवश्यकता को देखते हुए धन की कमी कोई तर्क नहीं होनी चाहिए।

फिर भी यदि है तो मुगलों द्वारा बनाई गई राजधानी में देश के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक दिल्ली विश्वविद्यालय को मुगलों के प्रमुख विरोधी बाबा बंदा सिंह बहादुर का नाम दिया जा सकता है। बाबा के कद को देखते हुए इससे कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं।

दयाल सिंह कॉलेज का नाम बदलने पर आमादा तत्वों के मन में न ऐतिहासिक शख्सियतों के लिए सम्मान है, न ही कानूनी व्यवस्थाओं के प्रति। दयाल सिंह नवजागरण काल का व्यक्तित्व रखते थे। नए ज्ञान को प्रतिबद्ध और समर्पित ऐसे व्यक्तित्व की आज देश को जरूरत है न कि उनको विस्मृति के गर्त में धकेल दिया जाए।

दयाल सिंह कॉलेज को दिल्ली प्रशासन को सौंपते समय दयाल सिंह कॉलेज ट्रस्ट सोसाइटी और दिल्ली प्रशासन के बीच हुए हस्ताक्षरित समझौते में स्पष्ट तौर पर यह शर्त है कि कॉलेज का नाम किसी भी हाल में नहीं बदला जाएगा।

जाहिर है कि इसके बावजूद नाम बदलने को कटिबद्ध लोगों का न शिक्षा न कानून प्रावधान और न ही ऐतिहासिक व्यक्तित्व से कोई सरोकार है। दयाल सिंह कॉलेज नई दिल्ली के बीचोंबीच लोधी रोड पर प्रतिष्ठित इंडिया इंटरनेशनल सेन्टर के सामने और इंडिया हैबिटेट सेन्टर की बगल में अरबों कीमत वाली 10 एकड़ शहरी संपत्ति है, जिस पर प्रभावशाली भू माफियाओं की नजर है। ऊंची कुर्सियों पर बैठे बिना रीढ़ की हड्डी वाले कुछ तत्व इस उम्मीद में उनके इशारों पर नाचने को तैयार हैं कि लड्डू फूटेगा तो कुछ न कुछ चूरा चींटियों के हाथ भी लगेगा ही।

लेखक वी.बी. अबरोल, पूर्व प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष, अंग्रेज़ी विभाग, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल हैं।

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