कुरुक्षेत्र में दो दिवसीय डिकोडिंग कविता कार्यशाला आयोजित
समकालीन कविता की भाषा व वैचारिक पक्ष को लेकर गंभीर विमर्श
कवियों में समकालीन कविता की भाषा और उसके वैचारिक पक्ष का विकास करने के उद्देश्य से सत्यभूमि कुरुक्षेत्र में 25 व 26 दिसंबर को दो दिवसीय ‘डिकोडिंग कविता’ कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए कवि अदनान कफील दरवेश, अनुपम सिंह, विहाग वैभव व अमित मनोज तथा आलोचक मृत्युंजय व अंकित नरवाल ने शिरकत की।

कार्यशाला के दो दिनों के दौरान कवियों ने अपनी कविताएं सुनाते हुए अपनी रचना प्रक्रिया, कविता के उद्देश्य, भाषा और कविता के भविष्य पर विस्तार से चर्चा की। वहीं आलोचकों ने काव्य आलोचना के सरोकार, विश्वसनीयता सहित विविध पक्षों पर प्रकाश डाला। देस हरियाणा के संपादक डॉ. सुभाष चन्द्र की देखरेख में आयोजित कार्यशाला का संयोजन शोधार्थी योगेश शर्मा ने किया। नरेश दहिया, अभिषेक व विशाल ने कार्यशाला के संचालन में सहयोग किया।

डॉ. सुभाष व योगेश ने कार्यशाला में आए कवियों व आलोचकों का स्वागत किया। पहले सत्र में कवियों ने पांच बिंदुओं-
1. मैं कविता क्यों लिखता हूँ?
2. मेरी रचना प्रक्रिया क्या है और मेरा भाषा बोध कैसे निर्मित हुआ?
3. कोई चीज या कोई घटना आपके काव्य बोध का हिस्सा कैसे बनती है?
4. कविता में कोई बात कहना आम भाषा में अपनी बात कहने से कैसे भिन्न है?
5. मैं कविता का कैसा भविष्य देखता हूँ? पर अपनी बात रखी।
कवि विहाग वैभव ने इन बिंदुओं पर चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि कविता ऐसे बनती है जैसे समोसा, भात व हंसिया बनता है। इससे अभिप्राय यह है कि जरूरत कविता की रचना प्रक्रिया का मुख्य तत्व है। कविता एक्टिविज्म का माध्यम है। यह जीवन-दृष्टि से तय होता है। उन्होंने कहा कि कला की भी भूख होती है। कला भूख बनाती भी है और इसे संस्कारित भी करती है। उन्होंने कहा कि कविता की भाषा कामगार बनाता है।

अनुपम सिंह ने विहाग वैभव की बात को पलटते हुए कहा कि भाषा कामगार नहीं बनाता, बल्कि भाषा ताकतवर बनाता और चलाता है। भाषा एक माध्यम ही नहीं है, बल्कि भाषा एक मुकम्मल विचार है। यह अपने अस्तित्व को खोजने और जानने का जरिया है।
कविता वैसे ही है जैसे संगीत, नृत्य व अन्य कलाएं। कविता स्वप्न की तरह आती है। हमें स्वयं भी नहीं पता होता कि स्वप्न कैसे आता है। ऐसे ही कविता का हमें पता नहीं होता है कि वह कैसे आ जाती है। उन्होंने कहा कि चेतन अवचेतन को बनाता है।
चेतन और अवचेतन के मिश्रण से कविता बनती है। उन्होंने कहा कि आसानी से समझ आने वाली कविता से सब जुड़ जाते हैं, लेकिन समय को व्यक्त करने वाली कविताएं ही पाठकों द्वारा स्वीकार की जाती हैं।
अदनान कफील दरवेश ने कहा कि वे स्वयं को जानने के लिए कविता लिखते हैं। जब भाषा नहीं थी, तब भी संवेदनाओं का उद्वेग होता था। कविता लिखते हुए आजादी व मुक्ति का अहसास होता है। कविता दृष्टि से बनती है। कविता की शुरुआत स्वत:स्फूर्त होती है। कविता कम में ज्यादा कहने की कला है। उन्होंने कहा कि मनुष्यता का भविष्य ही कविता का भविष्य है। मनुष्यता नहीं रहेगी तो कविता भी नहीं रहेगी।
अमित मनोज ने कहा कि जब भी उनके मन में उदासी छाती है तो वे कविता की ओर लौटते हैं। कविता मन व हृदय को ताकत देती है। कविता हथियार की तरह लगती है और अकेलेपन में साथी का काम करती है। कविता से प्रतिरोध व्यक्त होता है।
अपनी कविता की रचना-प्रक्रिया पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि कविता बुद्धि और हृदय से लिखी जाती है। दो-तीन पंक्तियां पहले स्वत: आती हैं, उन्हें तत्काल लिख लेना होता है। उसके बाद बैठ कर कविता का पहला ड्राफ्ट तैयार किया जाता है। उन्होंने कहा कि कविता की भाषा बनावटी नहीं होनी चाहिए। केवल कल्पना के आधार पर कविता नहीं लिख सकते, अनुभूति से कविता लिखी जाती है। कविता के भविष्य पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि कविता का भविष्य उज्ज्वल है। वह जीवन ही कैसा होगा, जिसमें कविता नहीं होगी।
काव्य आलोचना के मायने, आवश्यकता, आलोचना में विश्वसनीयता तथा आलोचना के सरोकारों पर पहले आलोचक अंकित नरवाल ने कहा कि आलोचना सत्य को व्यक्त करती है। अपने समय के सत्य को कविता कितना और कैसे व्यक्त कर पाई है, यह आलोचना का विषय है। कविता में किसका सत्य कहा गया है, यह भी आलोचना जानने की कोशिश करती है। समय की विषमताओं, विडंबनाओं और नैतिक मूल्यों के संकट को कवि ने कैसे और कितना उजागर किया है, इसे भी आलोचना परखने की कोशिश करती है।
उन्होंने कुंवर नारायण की कविता ‘बात सीधी थी पर’ सुनाते हुए कहा कि भाषा को बरतना सीखे बिना काव्य कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा कि आज हमें ईमानदार आलोचना की जरूरत है।
मृत्युंजय ने कहा कि आलोचना नई दुनिया की उपज है। आलोचक का काम प्रक्रिया विश्लेषण करना है, मूल्य का निर्धारण नहीं। आलोचना रचना के मर्म को दिखाने का काम करती है। आलोचना की रचना से शत्रुता नहीं होती है। आलोचना स्थिरता को तोड़ती है। उन्होंने कहा कि आज आलोचना खतरे में है।
दूसरे सत्र में विहाग वैभव व अनुपम सिंह ने अपनी कविताएं सुनाईं और अंकित नरवाल ने उनकी कविताओं पर रचनात्मक व आलोचकीय टिप्पणी की।
तीसरे सत्र में अदनान कफील दरवेश व अमित मनोज ने अपनी कविताएं सुनाईं और मृत्युंजय ने उन पर रचनात्मक टिप्पणी कर उनकी रचना प्रक्रिया पर अन्तर्दृष्टि डाली। चौथे सत्र में चाय के साथ अतिथि कवियों व आलोचकों के साथ प्रतिभागियों ने विचार-विमर्श किया।
इस दौरान विभिन्न कवियों की कविताओं को संदर्भित करते हुए कविता में किसी का नाम आने की स्थिति के रचना पर प्रभाव को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। रचना की समसामयिक भूमिका और अपने काल से आगे बढ़कर कालजयी बनने को लेकर विभिन्न कवियों व आलोचकों ने अपनी राय दी। यह बात मुखर होकर आई कि कविता कमजोर के पक्ष में खड़ी होती है।
कार्यशाला के दूसरे दिन वर्तमान कविता की चुनौतियां, विमर्श और अस्मितामूलक कविता के भविष्य पर गहन चर्चाएं हुईं। चर्चा का संचालन अमित मनोज ने किया।
अदनान ने कहा कि सत्ता भाषा को निरर्थक बना रही है। कवि की जिम्मेदारी है कि वह सच्ची व ईमानदार भाषा का प्रयोग करते हुए कविता को सारगर्भित बनाए। उन्होंने कहा कि हर कविता पहचान से जुड़ी हुई होती है, लेकिन कविता को विभाजन से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि समकालीन कविता पूंजीवाद व फासीवाद से लड़ रही है। उन्होंने कहा कि कवि का कोई एक देश नहीं होता, कवि की पूरी दुनिया होती है। कविता नए बदलावों का संज्ञान लेती है। उन्होंने कहा कि यह समय छोटी कविता का नहीं है, बल्कि लंबी कविता का समय है।
दूसरे सत्र में डॉ. प्रदीप, जयपाल, ओम सिंह, अशफाक, अरुण कैहरबा, कपिल भारद्वाज, सुनील थुआ, नरेश दहिया, सुरेश बरनवाल, अनीश कुमार, दीपक वोहरा, अभिषेक, विशाल, शुभम सहित सभी प्रतिभागियों ने अपनी टिप्पणी की। कवियों और आलोचकों ने उस पर अपनी प्रतिक्रिया दी।
कार्यशाला के समापन पर डॉ. सुभाष चन्द्र ने कहा कि कवि और लेखक की सबसे बड़ी बेचैनी अपने पाठक वर्ग को पहचानने की होती है। अपने पाठक व उसकी समझ को लेकर स्पष्टता उसके पास जितनी होगी, उसका साहित्य उतना ही अधिक सार्थक और प्रभावशाली हो पाएगा। उन्होंने कहा कि देस हरियाणा द्वारा आयोजित पहले सृजन उत्सव में असगर वजाहत साहब आए थे।
उन्होंने कहा था कि लेखक के पास बात का एक सिरा होता है और दूसरा सिरा पाठक के पास होता है। यह सवाल है कि क्या कवि या लेखक के पास बातचीत का एक सिरा है और क्या फिर उसने दूसरा सिरा पाठक को पकड़ाया है? यदि हाँ, तो उसका लिखा हुआ अवश्य सार्थक होगा। उन्होंने याद करते हुए कहा कि सृजन उत्सव में आए पंजाबी साहित्यकार सुरजीत पातर ने कहा था कि मनुष्य अन्न-पाणी से ही नहीं बल्कि बोली-बाणी से भी आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि साहित्यकार आम जन को उनकी भाषा प्रदान करता है। कार्यशाला में इन सभी सवालों को लेकर चर्चा हुई है। उन्होंने कार्यशाला परिकल्पक योगेश शर्मा, टीम सदस्य नरेश दहिया, अभिषेक व विशाल सहित आयोजक टीम को साधुवाद दिया।
–अरुण कुमार कैहरबा की रिपोर्ट
