कविता
देश का भविष्य: गांव का स्कूल
नरसिंह कुमार ‘मयूर’
सीलन भरी दीवारें हैं,
और, टूटा पड़ा मकान,
इसी इमारत में पलता है,
भारत का स्वाभिमान।
टूटे डेस्क पर बैठी हैं,
उम्मीदों की आँखें,
बिना पंखों के नापती हैं,
ये सपनों की शाखें।
पानी की टंकी सूखी है,
टॉयलेट की तंगहाली,
फिर भी बच्चों के चेहरों पर, दिखती है एक कव्वाली।
कोई कबाड़ की मोटर से,
ही पंखा बना रहा है,
वह बिना साधनों के भी,
अपनी प्रतिभा दिखा रहा है।
पत्रकार के कैमरे पूछें,
जब तीखे सवाल,
आखिर कब बदलेगा,
गांव के इस स्कूल का हाल?
बुजुर्ग देखकर बोले—
हम भी यहीं से पढ़े थे,
सपने तब भी ऊंचे थे,
हम तूफानों में अड़े थे।
इमारत भले ही पुरानी हो,
पर सपने नहीं टूटेंगे,
व्यवस्था से सवाल करेंगे,
हक अपने नहीं छूटेंगे।
अगर गाँव की माटी में भी,
अवसर का बीज बोओगे,
तो शहर से बेहतर कल तुम,
इसी ज़मीं पर पाओगे।
सरकार से मांगेंगे हक,
खुद भी कदम बढ़ाएंगे,
अधिकारों की अलख जगाकर, स्कूल को हम संवारेंगे।
यह सिर्फ चार दीवारें नहीं,
यह भारत का आधार है,
गाँव का छोटा सा स्कूल ही,
राष्ट्र का असली निर्माण है।
