मोहन मुक्त की कविता – कहो

कविता

कहो…

मोहन मुक्त

 

कहो…..

कहो कि

कहना ज़रूरी है

कहना बाध्यता है

और यह बाध्यता एक चुनाव है

कहो कि

हमने कहना चुना है

हमने झींगुर कोयल या मेढक की

तुलना में कोई चमत्कार नहीं किया है

कहो कि कहना हमारी मजबूर प्रकृति है

क्योकि हमने सरलता को निम्न कह दिया है

कहो

कि केवल कहने से ही

हम फिर सरल हो पाएंगे

कहो कि जो हमारी भाषा में नहीं कहते अपनी बात

उन्हें निम्न कहना हमारी ग़लती है

कहो

कि बुद्ध ठीक कहता है

कि हम मौन और शोर के स्थिर तटों से नहीं चिल्लायेंगे

कहो कि हम बातों की नदी में तैरेंगे

बीच के रास्ते की नदी में

कहो कि बीच के रास्ते का मतलब

सिर्फ़ वो नहीं है जो पाश कहता है

कहो कि

‘कॉमरेड से बातचीत’ में

पाश बीच के रास्ते में है

कहो

कि न कहने से

न कह पाने से

न कहने देने से हुए इंसानी नुकसान की भरपाई

कभी नहीं हो सकती…

दुनिया नहीं रह पाई है रहने लायक

क्योंकि मार दी गई हैं बातें सारी कहने लायक

लिपियों से पहले की सारी बातें

जो कही जानी थी

अगर कह दी गयी होतीं

तो गुलाम होती नहीं भाषाएँ

कहो कि ये कहने का अवसर फिर आया है

हम्मूराबी से

‘तुझे हमारे कानून बनाने का अधिकार नहीं’

कहो कि ये घोषणा चट्टान पर नहीं आकाश मे दर्ज होगी

कहो कि चुप्पी

हाइड्रोजन बम का फॉर्मूला है

चुप्पी ग्लेशियर पिघला रही है

चुप्पी देशों और साम्राज्यों का कारखाना है

कहो कि

चुप्पी नाज़ी चिमनियों से धुआं बन कर उड़ती है

और पूरी दुनिया मे बेआवाज़ पसर जाती है

कहो कि चुप्पी भाषाओं में बदल गई है

कहो कि चुप्पी हमारे कानों में पिघल गई है

कहो कि चुप्पी

हमारे शरीरों पर हर समय जकड़ी हुई जंजीरों में ढल गई है

कहो कि हमारी चुप्पी आई एम एफ़ का करार बन गई है

कहो कि हमारी चुप्पी इतिहास में हुए पहले क़त्ल का चश्मदीद है

कहो कि चुप्पी ने अपनी जान बचाकर

हत्याओं को ही बना दिया है विधि संहिता

कहो कि

अच्छी बात है कि इतिहास में कहने के अवसर

कभी नहीं मरते

कहो कि लाशों की बातें भी कही जा सकती हैं

कहो कि लाशों के कहने का अधिकार ही

ज़िंदा लोगों का असली कर्तव्य होता है

कहो कि

अभिव्यक्ति……

स्वतंत्रता की तरह औपचारिक नहीं

सांस की तरह आदिम है

कहो

कहो

वो बात

जो पिता ने कान में कही थी

बुदबुदा कर

तुम उसे कहो इतनी ताक़त से

कि वो सितारों के पार

सुनाई दे पिता को…

कहो

कहो कि कहना

एक चुनी हुई बाध्यता है…

कहो कि कहने से

केवल कहने से

फ़र्क़ पड़ता है

चुप्पी की ताक़त भी

केवल चुप्पी से नहीं

चुप्पी के बारे में कुछ कहने से पता चलती है

कहो

कि संस्कृतियों की मौत पर…

मौन नहीं होगा

गीत होंगे…

कहो

कि कहने से हवा के कण काँपते हैं

धड़कन की तरह… सांस के साथ

कहने से ज़ाहिर होता है

ज़िंदगी का नृत्य

चेतना का दायित्व…

कहो

कि लाचार हैं

बंदी भाषाएँ जो बन चुकी हैं जेल

कहो कि

कुछ भी कहना

नाकाफ़ी है…

कहो

कि…फूल… दिल…अंगूठे.. हाथ… ताली… इमोजी… नहीं ले पायेंगे

आवाज़ की जगह..

कहो

कहो कि सब कुछ…

जो कहा जा चुका है

उसे कहते जाना है

जब तक वो भाषाओं की क़ैद से

मुक्त ना हो जाए

जब तक शब्द…

आवाज़ पर सवार होकर

बहता हुआ रक्त ना हो जांय

जब तक चेतना की ध्वनियाँ

धड़कनो में ना बदल जांय

तब तक कहते रहो….

कहो…

कहो कि नीत्शे ने मालिक की मार से टूट चुके घोड़े से कहा था

‘मैं तुम्हें समझता हूँ ‘

फिर टूट गया था नीत्शे भी

कहो ऐसे कि सारे शब्द तुम्हारे अंतिम हों… और उसके बाद आवाज़ ही ना हो

कहो

ऐसे कि तुम्हारे अंतिम शब्द

टूट रहे लोगों के लिये हों..

कहो कि हम बातों और पीड़ाओ के कविता बन जाने का इंतजार नहीं करेंगे

हम कहेंगे जीवित दंश की प्राकृतिक और मारक भाषा

तुरंत तीव्र त्वरित और असरदार

ज़हर की तरह

कहो कि हमे महान साहित्य नहीं

अचूक हथियार रचने हैं

कहो

कहने से कह पाने से कहने देने से

टूट सकती है दोस्ती

कहो कि

कहने से

मज़बूत हो जाते हैं दोस्त

कहो कि

कहने से अस्तित्व की बूंदे

खास आवृतियों में नाचती हैं

जिनकी भंगिमाओं के स्थायी चित्र केवल दिमागों में नहीं

अंतरिक्ष में अंकित हो जाते हैं

कहो कि

पुनर्जन्म मुमकिन है

वो आत्मा या ईश्वर के रास्ते नहीं

कही गई बातों के गर्भ से पैदा होता है

कहो कि

कहना ही निषेचन है

कहने में ही वीर्य और रज की पवित्रता है

बातों से अधिक उर्वर कुछ नहीं है

हर कही गई बात में घनीभूत होती हैं

सारी मरी हुई पीढ़ियाँ

हर कही गई बात से निकलती हैं

भविष्य की सारी नस्लें

कहो कि

कहना

जो इंसानों के लिए बाध्यता है

वो एक चुनी हुई बाध्यता है

कहो कि

अभिव्यक्ति……

स्वतंत्रता की तरह औपचारिक नहीं

सांस की तरह आदिम है

कहो कि कहना ही जीवन है

कहो

मौन का चुनाव

कोई चुनाव नहीं होता

वो मौत का चुनाव है…

 

Comments

Your email address will not be published.

0