जसवीर त्यागी की कविता – दुःख

कविता

दुःख

जसवीर त्यागी

 

हर किसी के
अपने-अपने दुःख हैं

किसी के बड़े,किसी के छोटे
किसी के कम,किसी के ज्यादा

कोई किसी दूसरे के दुःख
न ले सकता है
और न दे सकता है

इंसान अपने दुःखों को अकेला छोड़कर
किसी एकांत की शरण भी नहीं जा सकता

दुःख कपड़े पर लगा कोई दाग नहीं
जिसे रगड़-मसलकर हटा दिया जाए

दुःख कोने में पड़ी
उपेक्षित फालतू चीज़ नहीं
कि कबाड़ी के तराजू पर धर दी जाए

दुःख साहूकार से लिया कर्ज़ नहीं
कि खेत-खलियान बेचकर चुकता कर दिया जाए

और दुःख घर का कोई चूहा भी नहीं
जिसे चूहेदानी में रोटी का टुकड़ा लगाकर
कैद किया जा सके

दुःख कर्मों की काया से चिपकी खाल है
दुःख नींद में भी
जागता हुआ कोई सवाल है।