गोवा डायरी 2026(6) पांचवां दिन –
किसी खूबसूरत कविता सा कोल्वा, संगीत सी हवा
संजय श्रीवास्तव
गोवा के कोल्वा की सुबह बहुत खूबसूरत और सुहानी होती है। मेरे गेस्ट हाउस के ठीक सामने बड़े चरागाह की हरी लंबी घास सूरज की किरणों से चमचमाने लगती थी। नारियल के पेड़ झूमते हुए हवा के साथ संगीत सुनाते थे। थोड़ी दूर पर सागर की लहरें हिलोरें ले रही होती थीं। यहां की सफेद महीन बालू पर सूरज की चमक उन्हें चांदी जैसी चमकाती हुई लगती है। मछुआरे स्टीमर और नावों को समुद्र की ओर ले जाने के लिए चल पड़ते हैं।
तो ऐसी होती है इस गोवन इलाके की सुबह। हालांकि यहां नाइट लाइफ नहीं है लेकिन कोल्वा बहुत सुबह जागने वाला इलाका भी नहीं है। अलबत्ता यहां के 400 साल से ज्यादा पुराने चर्च की घंटियां बज उठती हैं। चर्च के साथ लगे स्कूल में चहल-पहल शुरू हो चुकी होती है। कुछ सिटी बसें भी सड़कों पर दौड़ने लगती हैं।
कोल्वा गोवा का खूबसूरत इलाका है। साउथ गोवा में है। शांति, सुंदरता, खूबसूरत सफेद महीन बालू का बीच, साफ हवा। एक जमाने में लोग यहां स्वास्थ्य सुधारने और ‘change of air’ के लिए आया करते थे। यहां मैंने बहुत बड़ा चरागाह देखा। सुंदर गांव देखे। पुराने पुर्तगाली स्टाइल के मकान देखे। झूमते-सरसराते नारियल के पेड़ों का संगीत सुना। रात के सन्नाटे में झिंगुरों की आर्केस्ट्रा पार्टी की मधुर तान न जाने कितने ही सालों बाद सुनी।
अगर बस्ती की बात की जाए तो यहां बस्ती ठीक-ठाक है। हां, उसे बहुत बड़ा नहीं कह सकते। बाजार के लिए लोग करीब 6 किलोमीटर दूर मडगांव जाते हैं। पूरे इलाके में एक-दो अच्छे डॉक्टर हैं। यह इलाका ऐसा भी है, जहां अपार्टमेंट होटल हैं। जहां आपको वन बेडरूम या टू बेडरूम का रोज की दर से बहुत सुविधासंपन्न और सस्ता फ्लैट मिल जाएगा।
यहां का कारोबार भी आमतौर पर बाहरी लोग ही संभाल रहे हैं। गोवन लोग कार रेंट पर देते हैं। उनके होटल और गेस्ट हाउस हैं। हां, मैंने साउथ गोवा के इस इलाके में मटका-सट्टे की अवैध गतिविधि भी देखी। मछलियों के कारोबार का यह बड़ा इलाका है। कोल्वा बीच पर शाम होते ही एसी सुविधा वाले कई ट्रक आकर खड़े हो जाते हैं, जिनमें तरह-तरह की मछलियों के क्रेट बर्फ के साथ लादे जाते हैं। फिर ये ट्रक दूसरे शहरों की ओर रवाना होते हैं। मछुआरों से बातचीत में पता चला कि इस कारोबार में बड़ी मात्रा में मछलियों की आवाजाही होती है और मुंबई भी इसका एक बड़ा बाजार है।

मछली पकड़ने के लिए यहां झारखंड, ओडिशा और दूसरे प्रदेशों से आए मछुआरे भी मिल जाते हैं। कोल्वा में मछली पकड़ने और सुखाने की गतिविधि कोई नई बात नहीं है। गोवा पर्यटन के आधिकारिक विवरण में भी यहां मछुआरों के मोटर ट्रॉलर और मछली सुखाने का उल्लेख मिलता है।
चलिए, मैं अपनी सुनाता हूं कि मेरा यह दिन कैसे बीता। हम सुबह सात बजे तक उठ चुके थे। वाइफ को ड्रेसिंग के लिए अस्पताल जाना था। सुबह-सुबह लूकस अपनी कार के साथ हाजिर हो चुके थे। वो हमें लेकर अस्पताल गए। वहां ड्रेसिंग हुई। एक-दो घंटे में जब तक हम वापस लौटे, 11 बज चुका था। पूरा दिन तो अब भी हमारे पास था।
करीब 20 साल से कोल्वा के समुद्र तट पर जनरल स्टोर चला रहे गुजराती से मेरी दुआ-सलाम कई बार हो चुकी थी। यहां लोगों के बीच नए सैलानी तुरंत पहचान में आ जाते हैं। मैंने वहां से कुछ सामान खरीदा। हालचाल पूछते ही उसने बताया कि मैं यहां 20 साल से रह रहा हूं। लेकिन शराब को हाथ भी नहीं लगाया और न ही यह चाहता हूं कि मेरे बच्चों के संस्कारों पर कोई असर पड़े। हम हमेशा गुजरात जाते रहते हैं। आखिरकार हमें वहीं जाना है। यहां तो बस कारोबार है।
मैंने उससे पूछा कि क्या कोई सेल्फ ड्राइविंग रेंटल कार मिल जाएगी। उसने तुरंत मोबाइल पर दनादन कुछ नंबर दबाए। एक-दो मिनट के अंदर एक युवक स्कूटी पर सवार वहां पहुंच गया।
रॉकी नाम के इस युवक का अंदाज निराला ही था। वह अपनी शर्तों को लेकर हड़का सा भी रहा था और मोलभाव भी कर रहा था। आखिरकार बात जब तय हो गई तो उसने मुझको स्कूटी पर बिठाया। आधा किलोमीटर दूर अपने घर ले गया। घर पर दो कारें खड़ी थीं। अच्छी हालत की बलेनो कार को दिखाया और फिर लगभग सर्तक किया कि कार में एक भी खरोंच आई तो उसका पैसा लगेगा। जरा भी लेट लौटाया तो उसका अलग पैसा लगेगा। लोग आते हैं, गाड़ी में कोई दिक्कत कर देते हैं, फिर आनाकानी करने लगते हैं—ये सब नहीं चलेगा।

मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि यह मुझको हड़का रहा है या कार रेंट पर दे रहा है। यह बिल्कुल वैसे ही था जैसे किसी ऑफिस में नियुक्ति पत्र के साथ शर्तों की एक सूची भी आपको टिका दी जाती है कि आपको किस-किस तरह से हटाया जा सकता है।
उसने एक कॉन्ट्रैक्ट पर साइन कराए। दो दिनों का कार का भाड़ा लिया 2500 रुपए और सिक्योरिटी 5000 रुपए, जो बाद में वापस हो जाती।
नीले रंग की बलेनो अच्छी हालत में थी। मैंने कभी यह कार चलाई तो नहीं थी लेकिन हल्के-हल्के जब इसको उसके गेट से निकालकर सड़क पर बिठाया तो अंदाज हो गया कि कार अच्छी है और ड्राइविंग में कोई दिक्कत नहीं होने वाली।
तो गोवा की सड़कों पर स्कूटी से सवारी गांठने के बाद अगले दो दिनों तक मैं कार का आनंद लेने वाला था। कहना चाहिए कि ड्राइविंग मुझको आनंद देती है। सबसे बड़ी बात यह भी थी कि कार हो जाने से मैं अब आसानी से वाइफ की ड्रेसिंग भी करा सकता था और जहां चाहूं वहां घूम भी सकता था। वाइफ के लिए भी कार में बैठकर घूमना आरामदायक था।
कोल्वा से हमारी कार बेटे और पत्नी के साथ सड़कों पर दौड़ पड़ी। हमारी मंजिल थी वहां से करीब 35-40 किलोमीटर दूर पालोलेम बीच। सड़कें अच्छी थीं। दोनों ओर हरियाली। कभी-कभी बीच में बारिश भी हो जा रही थी। रास्ते में हमें असली गोवा के दर्शन हो रहे थे। पुराने-नए मकान, होटल, रेस्टोरेंट, धान की बुआई वाले खेत। बीच-बीच में कहीं चर्च और कहीं सड़क किनारे क्रॉस, जिनके सामने जलता हुआ दीपक।
पालोलेम की पार्किंग बहुत महंगी है। मुझे तो यह गोवा की सबसे महंगी पार्किंग में से एक लगी। वैसे पालोलेम का बीच आधा गोलाकार और बेहद खूबसूरत है। यह दरअसल दो सिरों के बीच बनी एक खूबसूरत खाड़ी जैसा दिखाई देता है। इसकी अर्धगोलाकार आकृति की वजह से यहां आने वाली लहरों का फैलाव मुझे गोवा के दूसरे खुले समुद्र तटों से अलग दिखाई दिया। जिस तरह की उन्मादित, उठती-पटकती, ताव देती तेज लहरें गोवा के दूसरे बीचों पर आती हैं, वैसा यहां कम महसूस होता है।

पालोलेम को गोवा पर्यटन भी दो headlands के बीच स्थित एक खूबसूरत bay और fishing beach के रूप में बताता है। यहां मछुआरे छोटी नावों से लोगों को आसपास के द्वीपों तक ले जाते हैं और डॉल्फिन देखने के लिए भी नाव की सवारी कराते हैं।
बीच की बालू सुनहरी और कुछ जगहों पर गहरी रंगत लिए हुए नजर आती है। समुद्र तट पर उम्दा शेक और रेस्टोरेंट हैं।
पालोलेम बीच दक्षिण गोवा के कनाकोना तालुका में स्थित है। इसे गोवा के सबसे खूबसूरत और लोकप्रिय समुद्र तटों में गिना जाता है। यह पहले एक शांत मछुआरा इलाका रहा होगा, आज भी यहां मछली पकड़ने की गतिविधि मौजूद है। बाद के वर्षों में पर्यटकों और बैकपैकर्स ने इसे लोकप्रिय बनाया और आज यहां कई शेक और पर्यटक सुविधाएं हैं।
पालोलेम की खूबसूरती का एक और आकर्षण यहां के आसपास की चट्टानी संरचनाएं हैं। समुद्र, चट्टानें, नारियल के पेड़ और बीच की घुमावदार आकृति मिलकर इसे ऐसा दृश्य देते हैं कि कोई भी यहां फोटो खिंचवाए बिना रह नहीं पाता।
यहां से हमारी दक्षिण गोवा की सड़क यात्रा अभी खत्म नहीं हुई थी। असल में कार मिलने के बाद अब गोवा को देखने का हमारा तरीका ही बदल गया था। अब जहां मन करता, कार मोड़ देते। कोई गांव अच्छा लगा तो रुक गए। कोई पुराना मकान दिखाई दिया तो उसे देखने लगे। कोई चर्च दिखा तो सड़क बदल दी।
अगले दो दिनों में दक्षिण गोवा ने हमें अपने कई ऐसे चेहरे दिखाए, जिनके बारे में आम पर्यटक शायद ही जानता हो। संजय श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से साभार
(सिलसिला जारी रहेगा)
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