सेवा नगर’ : मानवीय त्रासदी के ज़ख्म और पीड़ा (भाग-2) : कथा समीक्षा (दूसरी किस्त)

साहित्य आलोचना के सरोकार

‘सेवा नगर’ : मानवीय त्रासदी के ज़ख्म और पीड़ा (भाग-2) : कथा समीक्षा (दूसरी किस्त)

ओमसिंह अशफ़ाक

‘स्कूल की मैडम’ नन्दिनी बहुत पॉजीटिव सोचवाली टीचर है और बच्चो की पढ़ाई के अलावा भी उनका अभिभावक की तरह ख्याल रखती है।

कई अभावग्रस्त बच्चों को सर्दी में स्वेटर और कईयों की फीस भी अपने पर्स से जमा करा देती है। यदि बच्चों की एक कतार धूप में बैठी हो तो खुद भी धूप में ही बैठी रहेगी।

उसी नन्दिनी को एक दिन स्कूल इंसपेक्टर कक्षा में आकर अपमानित करता है।

कहानीकार लिखता है कि : “माली से खुरपी लेकर खुद कयारी बनाने बैठ जाना, यह हमारी नन्दिनी मैडम ही कर सकती थी। हमने कहा भी “मैडमजी, हाथ गंदे हो जाएँगे।”

“बच्चों, मिट्टी से हाथ गंदे नहीं होते। बुरी चीजों से हाथ गंदे होते हैं।”

“मैडम चाहती थीं हम खूब पढ़ें। हमारा भविष्य उज्जवल हो। हम कुछ बनें। कुछ कर दिखाएँ। शायद इसलिए वह हमारे नाखूनों से लेकर हमारे बस्ते तक का ध्यान रखतीं।

गर्मियों में हमें बार-बार कहतीं- “ज्यादा पानी पीया करो। सर्दियों में वह ज्यादा चौकन्नी हो जातीं। एक-एक बच्चे को बुलाती। जूते, जुराबें, स्वेटर, पूरी बाजू की कमीज, सिर पर स्कार्फ या मफलर। सब देखती।”

“एक दिन वह ग्लोब को मेज पर रखकर हमें संसार के महाद्वीपों के विषय में बता रही थीं कि स्कूल इंस्पेक्टर मुआयना करने आ पहुँचे। उन्होंने इस बात पर मुंह सा बनाया कि मैडम इतने छोटे बच्चों को ग्लोब से पढ़ा रही हैं।

उनके अंदर अधिकारी वाला अहंकार जाग उठा। वह बोले, “मैडम, आप बच्चों को भ्रमित कर देंगी।”

“सर, मैं भ्रमित करनेवाली शिक्षा नहीं देती।”

“इतने छोटे बच्चे ग्लोब को देखकर क्या समझेंगे?”

“सर, ग्लोब तो एक तरह से प्रैक्टिकल है।…बच्चे विजुअल को जल्दी समझते हैं।”

“मुझे समझा रही हो?”

“नहीं सर, समझा नहीं रही। अपना अनुभव बता रही हूँ।”

“सरकारी स्कूलों की मास्टरनियाँ क्या पढ़ाती हैं..मेरा बहुत ज्यादा अनुभव है।”

“होगा सर। लेकिन मैं ग्लोब दिखाकर बच्चों को भूगोल पढ़ा रही हूँ तो गुनाह नहीं कर रही।”

“गुनाह तो मेरा है जो तुम्हारी क्लास में चला आया। ग्लोब सामने रखा और खुद आराम किया। ये सब हरामखोरी के तरीके हैं।”

“सर, आप गाली दे रहे हैं।”

“बहस मत कर।”

“मैं बहस नहीं कर रही।”

“तू बहस कर रही है। और जो मेरे साथ बहस करता है उसकी बोलती बंद कर देता हूँ मैं।”

“नन्दिनी मैडम ने इसके बाद एक शब्द नहीं बोला था। लेकिन स्कूल इंस्पेक्टर क्लासरूम से बाहर निकलते निकलते रुका। फिर बोला, “तुम्हें न पढ़ाना आता है, न बात करना।”

उपरोक्त बदमगज़ी से टीचर की मानसिकता पर कितना बुरा प्रभाव पड़ा. कथाकार ने निम्न शब्दों में बयान किया है :

“स्कूल इंस्पेक्टर के चले जाने के बाद नन्दिनी मैडम जड़ होकर खड़ी रही थीं कुछ देर। स्कूल इंस्पेक्टर की आखिरी टिप्पणी कि तुम्हें न पढ़ाना आता है.न बात करना- मैडम को चुभ-सी गयी थी।

पूरी घटना ने मैडम को आहत कर दिया था। वह कुर्सी पर ऐसे बैठी थीं जैसे किसी ने प्राण निकाल दिये हों उनके। उनकी कोशिश रही थी कि बच्चों को वैज्ञानिक दृष्टि से पढ़ाये।

उनमें आधुनिकता-बोध जागृत करे। लेकिन स्कूल इंस्पेक्टर मैडम की संवेदना को चिन्दी-चिन्दी करके चला गया था। भरी क्लास में…बच्चों के सामने उसने मैडम को अपमानित ही नहीं, जलील भी किया था।”

तीसरे दिन हेड-मिस्ट्रेस कक्षा में आयी और बच्चों से बोली- “बच्चों, तुम्हारी मैडम कैसी है?”

“बोत अच्छी।” समवेत स्वर में जोश के साथ सब बच्चे बोल पड़े।

“तुम्हारी मैडम मुझे भी बोत अच्छी लगती हैं।” हेड-मिस्ट्रेस ने कहा और खुद ताली बजाने लगी। इस पर सब बच्चों ने ताली बजायी। एच.एम. संजीदा होकर बोली- “नन्दिनी, तुमसे मैं यही उम्मीद करती थी कि स्कूल इंस्पेक्टर की बात पर राख डालते हुए बच्चों को अपने ढंग से पढ़ाती रहोगी।”

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‘दर्द आमेज़’ कहानी में राजन (13-14 साल) और संजय (18 साल) नाम के दो भाई हैं जिनकी मां हार्ट अटैक से और पिता ट्रेन एक्सीडेंट में मारे गये हैं।

बड़ा भाई संजय 18 साल का था जब पिता गुजर गए लेकिन एक साल बाद पेद-दर्द से संजय की भी मौत हो गई। अब राजन निपट अकेला हो जाता है।

कहानीकार उसे अपने घर ले आता है, सदमे से निकालने की पूरी कोशिश करता है, स्कूल में दाखिला कराता है लेकिन राजन अवसाद से निकल नहीं पाता।

राजन को भी कभी-कभी सिरदर्द और बुखार होता है; ठीक हो जाता है। एक दिन उसे पेटदर्द हुआ, अस्पताल पहुंचते-पहुंचते उसने हिचकी ली और प्राण त्याग दिए बड़े भाई की मौत के एक साल और दो दिन बाद। इस तरह यह बहुत भावना प्रधान कहानी है।

राजन के वो रिश्तेदार जिन्होंने उसे अपने पास रखने में असमर्थता जतायी थी. एक माह बाद राजन के फ्लैट की चाबियाँ लेने लेखक के घर दल-बल सहित आ धमकते हैं।

परोक्ष रूप से जायज, नाजायज हथियारों का प्रदर्शन भी करते है। और लेखक को फ्लैट में हिस्सेदारी का प्रलोभन भी देते हैं जिसे कहानीकार तुरंत तुकरा देता है और चाबियाँ मेज़ पर लाकर रख देता है।

वहाँ से निकलकर रिश्तेदार राजन की मौत का गम नहीं बल्कि फ्लैट हाथ लग जाने का जश्न मनाते हैं।

यह संवेदनहीन रिश्तों, धन की लिप्सा और मरती इंसानियत का चित्रण करती-भावुकता भरी कहानी है जो पाठक को भी विचलित कर सकती है क्योंकि यह पूरे परिवार के विनाश की त्रासदी है :

“महीनेभर बाद दिवंगत राजन के रिश्तेदार…मामे, चाचे, फूफे… कजि़न…मौसे-मासियाँ-सब इकट्ठे होकर मेरे घर आये। वे फैसला करने आये थे।

वे रोहिणी वाले फ्लैट का फैसला करने आये थे, जिसकी चाबियाँ मेरे पास थीं और जिसकी कीमत बारह पंद्रह लाख थी। उन्हें शक था कि मैं अकेला फ्लैट को हड़प जाऊंगा।

वे सब आक्रामक मुद्रा में थे। वे राजन के रिश्तेदार थे। मैं राजन का कुछ भी नहीं लगता था। फ्लैट के असली हकदार वे थे। इसलिए मिलकर आये थे।

वे जानते थे बहुमत की ताकत होती है। वे भीतर से कमजोर लेकिन बाहर से लड़ाकू नज़र आते थे। ऐसा बिलकुल भी नहीं लगता था कि उन्हें राजन की मौत का दुख है।

पूरा परिवार धीरे-धीरे मरता चला गया, वे इस पीड़ा से भी तटस्थ थे। वे मर चुके लोगों की बात नहीं करना चाहते थे। वे उस फ्लैट की बात करना चाहते थे, जो था।

जो रोहिणी में था। जहाँ मैट्रो पहुँच चुकी थी जिसकी कीमत बारह-पंद्रह लाख थी।”

“वे मेरे ड्राइंगरूम में बैठे थे। वे चाय पीते हुए या बिस्कुट खाते हुए आपस में ‘प्रापर्टी हाइप’ की बात करते। फिर फ्लैट की बात करते। मैं राजन की बातें करता। वे समझते, मैं विषय को गलत दिशा में ले जा रहा हूँ।

“उनमें से एक देसी कट्टा भी साथ लाया था। जिसे उसने एक-दो बार मेज पर रखा। मुझे डराने के लिए या फिर फैसला न होने पर उसके इस्तेमाल के लिए।”

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“उनमें से एक मिठाई के दो डिब्बे भी लाया था कि अगर फैसला हो गया तो सब मिलकर ‘मुंह मीठा’ कर सकें।

“मैं हतप्रभ था। बल्कि भौंचक। वे अपने असली चेहरे में थे। इसलिए वे सब डरावने लगते थे। वे मनुष्य नहीं, मनुष्य के विलोम लगते थे।

“वे कभी आपस में बहस करने लगते। गुस्सैल हो जाते। कभी ऐसा भी होता कि वे सब मिलकर ठहाके लगाते।”

“मुझे राजन याद आ रहा था। जो हमेशा गुमसुम रहता। जिसने आखिरी वक्त रिक्शा में छटपटाते हुए मेरी गोदी में सिर रखा था और प्राण त्याग दिये थे।

मैं चाहता था कि वे सब लोग जल्द से जल्द मेरे घर से चले जाएँ मैंने रोहिणीवाले फ्लैट की चाबियाँ उनके सामने मेज पर रखते हुए कहा, “फ्लैट की चाबियाँ ले जाइए, और फैसला कर लीजिए।”

वे हैरान रह गये। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मैं इतनी जल्दी चाबियाँ उन्हें सौंप दूंगा।

उन्होंने पूछा, “फ्लैट में से मुझे कितना हिस्सा चाहिए?”

“मुझे सिर्फ राजन की यादें चाहिए।” मैंने कहा। वे फिर हैरान हुए। अंदर-ही-अंदर वे बहुत खुश हुए वे मिठाई का डिब्बा खोलने लगे। मैने कहा- “मिठाई वे बाहर जाकर बांटे।”

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‘पहले यहाँ घर था’ शीर्षक कहानी की नायिका विभा एक डॉक्टर देव की पत्नी है जोकि सर्जन है। दोनों पति-पत्नी का मिज़ाज़ और जरूरतें अलग-अलग है।

पति पूर्णतया उपभोक्तावाद का शिकार है और पत्नी – सार्थक संबंधों में विश्वास करने वाली महिला है। फलतः दोनों में अलगाव हो जाता है।

इसी त्रासदी का वर्णन करते हुए कथाकार ने डॉक्टर देव के व्यक्तित्व में झांकने का अच्छा प्रयास किया है: “कभी-कभी रात के वक्त नर्सिंगहोम से रिसैप्शनिस्ट का फोन आता। किसी पेशेंट का इमरजेंसी केस होता।

तब तक डॉ. देव पर सुरूर हावी हो चुका हाता, “नो…नो रिलेक्सेशन…डॉन्ट एडमिट हिम… एक्सीडेंटल केस।”

देन व्हअट?..सीरियस?…तो मैं क्या करू?…आई हैव नो बिजनेस एट ऑल।…नो!…बिलकुल नहीं।…

पैसा एडवांस में जमा कराएँ… एटलीस्ट वन लैक!…अगर एक लाख जमा कराते हैं, ओ.टी. की तैयारियाँ शुरू करो।…एनेस्थीसिया…एण्ड ऑल प्री आपेरेटिवज्… येस…

क्या कहा? पैसा बाद में देंगे ? डोण्ट ब्लीव। प्रॉब्लम खड़ी हो सकती है। पैसा रुक जाता है और पेशेंट मर जाये तो रिलेटिव डेडबॉडी तक लेने नहीं आते।…

सो, बी केयरपुल जेण्टलमैन!”

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“विभा हर वक्त डॉ. देव के भीतर संवेदनशील इंसान को तलाश करती। डॉ. देव विभा में सुख देती देह ढूंढते।..

“विभा डॉक्टर देव में पति को ढूंढती। डॉक्टर देव विभा में तृप्त करती औरत की कामना करते…अपनी-अपनी तलाश में दोनों विफल होते।”

डॉ. देव को विभा ‘ठण्डी स्त्री’ महसूस होती। वे चिढ़कर कहते, “मैंने शादी की थी एक खूबसूरत औरत से। मुझे पता ही नहीं था वह खूबसूरत औरत, ताबूत में रखी किसी ‘ममी’ जैसी होगी।”

“विभा चुप रहती। डॉ. देव को देखती रहती। गहरी सांसे लेती। सांस के साथ जैसे पत्थर बंधे हो। मन-ही-मन कल़पती। मन-ही-मन क्षुब्ध होती। मन-ही-मन सोचती, इतना बड़ा डॉक्टर और इतना तुच्छ जमीर।”

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‘सेवा नगर’ दिल्ली महानगर के हाशिए पर बसे एक ऐसे बर्बाद बुजुर्ग की व्यथा है जिसकी बीवी कैंसर से और बड़ा बेटा ट्रक ऐक्सीडेंट में मर चुका है। छोटा बेटा डेढ़ साल से लापता है और एक मात्र बेटी बलात्कार के बाद खुदकुशी कर लेती है।

“सूना घर काटने को दौड़ता है और सदमे से सनक गया बुजुर्ग अपना समय काटने के लिए प्रातः घर से निकलकर तमाम दिल्ली की सड़कों पर किसी से बातचीत का जरिया ढूंढता हुआ अपने घर (सेवा नगर) का पता पूछता फिरता है।”

‘विवेक’ की प्रायः सभी कहानियों में दर्द की लकीरें और आहत भावनाएँ देखी जा सकतीं हैं।

इस सामाजिक आत्म साक्षात्कार के जरिए लेखक की ये सद् इच्छा रहती है कि हम सुधरें और इस समाज को यातना ग्रह बनने से बचाएँ; तभी देश प्रगति कर सकता है और इसी में मानवता के कल्याण का रहस्य छिपा है।

‘विवेक’ के पास कथा कहने का विशिष्ट कौशल है जिसको उन्होनें भाषा के जरिए अर्जित किया है।

किसी घटना पर पाठक का पूरा ध्यान केंद्रित करने के लिए लेखक उस घटना की तीन-चार बार अलग-अलग वाक्यों / पदों में व्याख्या करता है।

कुछ आलोचक इसे लफ़्ज़ों की फिजूलखर्ची भी कह सकते हैं। परंतु विवेक के यहाँ ये ‘टैक्नीक’ घटना पर अतिरिक्त ‘फोकस’ और कथ्य में ‘रोचकता’ पैदा करने का काम करती है।

इसलिए पाठक को ‘लफ्जों का दोहराव’ अखरता नहीं है। जैसे- “राजन अब इस दुनिया में नहीं रहा नहीं रहा यानी अब वह इस दुनिया में नहीं है।..

..वह मर चुका है या कहूँ कि उसे बचा नहीं सका…।” उपरोक्त चारों वाक्यों का कथ्य संदेश एक ही है- राजन की मौत (पृष्ठ-23)

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कथ्य, शिल्प, भाषा-शैली, संवाद, कथानक, परिवेश-निर्माण, चरित्र-चित्रण, की तमाम खूबियां हैं।

‘विवेक’ की कहानियों में यदि कोई एक अपर्याप्तता खटक सकती है, तो वह यह है कि उनके पात्र व्यक्तिगत स्तर पर तो संघर्षरत रहते हैं। लेकिन संगठित होकर सामाजिक स्तर पर संघर्ष करते हुए नहीं दिखायी पड़ते हैं।

जबकि अनुभव हमें यही बताता है कि समाज को संगठित प्रयासों से ही बदला जा सकता है। शायद अगामी रचनाओं में हमें ऐसा होता दिखाई दे।

हमें भरोसा है कि अभी उनका कहानीकार लम्बे समय तक सृजनरत रहने वाला है। आमीन!

संग्रह में कैद, फरार, बोहेमियन, शोकसभा और बच्चा शीर्षक कहानिया भी सकंलित हैं। परंतु सभी कहानियों का पूरा आनंद तो संग्रह को पढ़कर ही लिया जा सकता है।

(समाप्त)

कहानी संग्रह: सेवा नगर कहां है

लेखक: ज्ञान प्रकाश ‘विवेक’

प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ,18 इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली- 110003

पृष्ठ संख्या: 140

प्रकाशन वर्ष:2007 दूसरा संस्करण 2010

मूल्य:₹100/-

(2013में)

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