जलवायु परिवर्तन: कारनामे अमीरों के, सज़ा गरीबों को

जलवायु परिवर्तन: कारनामे अमीरों के, सज़ा गरीबों को

धर्मेन्द्र आज़ाद

जब हिमालय पिघल रहा हो, नदियाँ उफान पर हों और हजारों लोग अपना घर-बार खो रहे हों, तो सवाल सिर्फ यह नहीं कि मौसम क्यों बदल रहा है। असली सवाल है—इस संकट के लिए जिम्मेदार कौन है और इसकी सबसे बड़ी कीमत कौन चुका रहा है?

26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास हुई भीषण आपदा ने हिमालय की बढ़ती पर्यावरणीय असुरक्षा को फिर सामने ला दिया। बढ़ता तापमान, बदलता मौसम, अनियोजित निर्माण और नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी पर बढ़ता दबाव ऐसी आपदाओं का खतरा बढ़ा रहे हैं।

इसे महज ‘प्राकृतिक हादसा’ कहना असली सवाल से बचना है। यह जलवायु अन्याय और मुनाफे पर टिकी पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था से जुड़ा प्रश्न है, क्योंकि संकट पैदा करने में जिनका योगदान सबसे कम है, अक्सर वही इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं।

जलवायु संकट को केवल ‘मानवीय गतिविधियों’ का परिणाम कहना भी अधूरा है। सवाल है—किसकी आर्थिक गतिविधि, किसके मुनाफे के लिए और किस कीमत पर?

संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD—United Nations Conference on Trade and Development) के अनुसार, सबसे कम विकसित देश (LDCs—Least Developed Countries) वैश्विक उत्सर्जन में 4 प्रतिशत से भी कम योगदान देते हैं, लेकिन जलवायु संकट के सबसे गंभीर परिणाम भुगतने को मजबूर हैं।

ऑक्सफैम के अनुसार, 2019 में दुनिया के सबसे अमीर 1 प्रतिशत लोगों ने करीब 16 प्रतिशत वैश्विक उत्सर्जन किया—जो लगभग उतना ही है, जितना दुनिया की निचली 66 प्रतिशत आबादी, यानी करीब 5 अरब लोग, मिलकर करती है।

यानी जलवायु संकट केवल पर्यावरण का सवाल नहीं है; यह राजनीतिक अर्थशास्त्र का सवाल है—मुनाफा किसका और नुकसान किसका?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO—World Meteorological Organization) के अनुसार, हाल के वर्षों में दुनिया के ग्लेशियरों ने रिकॉर्ड स्तर पर बर्फ खोई। वर्ष 2000 से 2023 के बीच ही दुनिया के ग्लेशियरों ने लगभग 6,542 अरब टन बर्फ खोई—यानी औसतन करीब 273 अरब टन प्रति वर्ष।

पर्यावरणविदों के अनुसार, माउंट एवरेस्ट का मशहूर ‘खुंबू ग्लेशियर’ 1953 में हुई पहली मैपिंग के बाद से अब तक 5 किलोमीटर से अधिक सिकुड़ चुका है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से पहाड़ों में अस्थिर ग्लेशियर झीलें बन रही हैं, जो अचानक फटकर निचले इलाकों में भारी तबाही ला सकती हैं।

भारत में 2013 की केदारनाथ आपदा, 2021 की चमोली आपदा और जोशीमठ का भू-धंसाव चेतावनी देते हैं कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विकास के मौजूदा मॉडल पर गंभीर सवाल उठते हैं।

सड़क, सुरंग, जलविद्युत परियोजनाएँ और पर्यटन अपने आप में समस्या नहीं हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब नाजुक पारिस्थितिकी, स्थानीय समुदायों और वैज्ञानिक वहन-क्षमता की अनदेखी कर निर्माण को ही विकास का पर्याय बना दिया जाए।

हिमाचल प्रदेश में हाल के वर्षों में आई बाढ़ और भूस्खलन भी इसी खतरे की ओर संकेत करते हैं। नेपाल से निकलने वाली नदियों की तबाही भारत के मैदानी क्षेत्रों, विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश, तक पहुँचती है, जहाँ इसका सबसे बड़ा बोझ छोटे किसानों, खेतिहर मजदूरों और गरीब परिवारों को उठाना पड़ता है।

जलवायु संकट से पूँजीवाद-साम्राज्यवाद का कुरूप चेहरा सामने आता है। प्रकृति से निकाले गए संसाधनों का मुनाफा निजी हाथों में केंद्रित होता है, जबकि प्रदूषण, विस्थापन, बाढ़, सूखा और पर्यावरणीय तबाही का बोझ मजदूरों, किसानों और गरीब समुदायों पर पड़ता है।

जब जंगल, नदियाँ, जमीन और पहाड़ जीवन के आधार के बजाय मुनाफे की वस्तु बन जाते हैं, तो प्रकृति और समाज दोनों हाशिए पर चले जाते हैं।

जब विकासशील देश इस तबाही से उबरने के लिए वैश्विक मंचों पर मदद की गुहार लगाते हैं, तो विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी संस्थाओं के माध्यम से नया आर्थिक बोझ खड़ा हो जाता है।साम्राज्यवादी देशों से मिलने वाली सहायता यदि पर्याप्त अनुदान के बजाय ऊँचे ब्याज वाले कर्ज के रूप में आती है, तो प्रदूषण और ऐतिहासिक उत्सर्जन की कीमत अंततः गरीब देश चुकाते हैं। वहीं, इन कर्जों से जुड़ी शर्तों के कारण हरित तकनीक और सौर उपकरणों की खरीद भी अक्सर साम्राज्यवादी देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों से करनी पड़ती है, जिससे धन फिर उन्हीं आर्थिक ताकतों के पास लौट जाता है।

नेपाल की त्रासदी सवाल खड़े करती है—कुछ लोग प्रकृति और पर्यावरण को तबाह करें और उसकी कीमत गरीब चुकाएँ—यह कैसा न्याय है?

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जब तक विकास का पैमाना निजी मुनाफा रहेगा और प्रकृति को जीवन के आधार के बजाय व्यापारिक वस्तु माना जाएगा, तब तक पर्यावरणीय संकट और सामाजिक असमानता साथ-साथ बढ़ते रहेंगे।

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