भूखे, भजन न होए गोपाला…

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

भूखे, भजन न होए गोपाला…

डॉ रीटा अरोड़ा

 

लोक में एक प्रसिद्ध कहावत है- “भूखे भजन न होए गोपाला।”
इसका सामान्य अर्थ है कि भूखे पेट भक्ति भी संभव नहीं। लेकिन यदि आज के समय में इसे एक नए विराम के साथ पढ़ें- “भूखे, भजन न होए गोपाला…”-तो इसके भीतर एक और मार्मिक अर्थ उभरता है। यह मूल कहावत को बदलने का प्रयास नहीं, बल्कि उसके मानवीय संदेश को वर्तमान संदर्भ में समझने की एक विनम्र कोशिश है।

एक दिन मंदिर के बाहर दस-बारह साल का एक बच्चा चुपचाप खड़ा था।

एक श्रद्धालु ने पूछा,
“बेटा, अंदर क्यों नहीं जा रहे?”

बच्चे ने झिझकते हुए कहा,
“अंकल… भगवान से रोटी माँगने आया था। लेकिन पहले अगर एक रोटी मिल जाए, तो आराम से भगवान को धन्यवाद भी कह दूँगा।”

वह व्यक्ति कुछ क्षण उसे देखता रहा। उसके हाथ में मंदिर में चढ़ाने के लिए खरीदा हुआ प्रसाद था। उसने प्रसाद का डिब्बा एक ओर रखा और पास की दुकान से गर्म भोजन का पैकेट खरीदकर बच्चे के हाथ में दे दिया।

बच्चे की आँखों में चमक आ गई। उसने मुस्कुराकर कहा,
“अब भगवान से मिल सकता हूँ।”

शायद उस दिन मंदिर की सबसे सुंदर आरती घंटियों की आवाज़ में नहीं, उस बच्चे की मुस्कान में हुई थी।

यही तो हमारी सबसे बड़ी परीक्षा है।

हम धर्म को अक्सर वहाँ खोजते हैं जहाँ भीड़ होती है- बड़े-बड़े भंडारे, विशाल पंडाल, धार्मिक आयोजन, मंच, पोस्टर, दान की घोषणाएँ और सोशल मीडिया पर सेवा की तस्वीरें। लेकिन उसी रास्ते पर बैठा कोई भूखा इंसान कई बार हमारी दृष्टि से ओझल हो जाता है। समस्या यह नहीं कि हमारे पास देने के लिए कुछ नहीं; कभी-कभी समस्या यह होती है कि हमारे भीतर *दिखावे की तत्परता, संवेदना से आगे निकल जाती है।*

भंडारे निश्चय ही हमारी संस्कृति की सुंदर परंपरा हैं। सामूहिक सेवा का अपना महत्व है। लेकिन प्रश्न यह है कि यदि हमारे सामने उसी समय कोई भूखा व्यक्ति खड़ा हो और हम उसे यह कहकर आगे बढ़ जाएँ-“भंडारे में आ जाना”- तो क्या हमने सेवा का वास्तविक अर्थ समझा?

किसी भूखे को भोजन देना केवल पेट भरना नहीं है। यह उसके भीतर यह विश्वास जगाना भी है कि दुनिया में अभी संवेदना जीवित है। किसी वृद्ध की दवा का इंतज़ाम कर देना, किसी थके मजदूर को पानी पिला देना, किसी जरूरतमंद बच्चे की फीस भर देना- शायद यही वे छोटी-छोटी प्रार्थनाएँ हैं, जिन्हें ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी मंत्र की आवश्यकता नहीं होती।

आज तकनीक ने दान को आसान बना दिया है। एक क्लिक में पैसा पहुँच जाता है, एक पोस्ट में सेवा का प्रचार हो जाता है और कुछ क्षणों में हमारी भलाई दुनिया के सामने दिखाई देने लगती है। लेकिन करुणा का कोई ऑनलाइन विकल्प नहीं है। किसी की आँखों में झाँककर उसकी जरूरत समझना, उसके हाथ में सम्मान के साथ सहायता रखना और उसके चेहरे पर लौटती राहत को देखना- यह अनुभव मनुष्य को भीतर से बदल देता है।

ईश्वर शायद केवल मंदिरों में नहीं, मनुष्यों के भीतर भी निवास करते हैं। इसलिए जब कोई भूखा हाथ फैलाता है, तो वह केवल रोटी नहीं माँगता; वह हमारी मनुष्यता की परीक्षा लेता है।

धर्म की शुरुआत मंदिर की सीढ़ियों से नहीं, मन की सीढ़ियों से होती है। यदि हमारा हाथ किसी भूखे तक पहुँच गया, तो संभव है हमारी प्रार्थना बिना किसी मंत्र के ही ईश्वर तक पहुँच गई हो।

अगली बार जब हम किसी पूजा, भंडारे या धार्मिक आयोजन में जाएँ, तो एक क्षण अपने आसपास भी देखें। कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस भगवान को हम प्रसाद चढ़ाने जा रहे हैं, वह किसी भूखे बच्चे, किसी असहाय वृद्ध या किसी थके हुए मजदूर के रूप में हमारे सामने ही खड़ा हो?

हो सकता है, उस दिन सबसे बड़ा पुण्य मंदिर के भीतर नहीं, मंदिर के बाहर हमारा इंतज़ार कर रहा हो।

और शायद इसी भाव को आज के समय में हम इस तरह भी पढ़ सकते हैं-

“भूखे, भजन न होए गोपाला…”

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
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