दिल्ली छात्र संघ चुनाव और जेन-जी

चुनाव विश्लेषण

दिल्ली छात्र संघ चुनाव और जेन-जी

 

ओमप्रकाश तिवारी

 

दिल्ली छात्र संघ का चुनाव बड़ा दिलचस्प रहा है। इसके नतीजे भी जितने हैरान करने वाले हैं उतने ही सवाल खड़े करने वाले हैं। चुनाव परिणाम के बाद छात्र संगठनों की जीत-हार को लेकर तमाम तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। कुछ निष्कर्ष भी निकाले जा रहे हैं। फैसलाकुन दावे भी किए जा रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की छात्र संगठन इकाई अ​खिल विद्या​र्थी परिषद (एबीवीपी) ने चार पदों में से तीन पर जीत हासिल की है तो वह खुश है। केंद्रीय गृह मंत्री कह रहे हैं कि यह राष्ट्र विरोधी ताकतों के लिए संदेश है। जो युवा श​क्ति को अपनी राष्ट्रविरोधी प्रायेगशाला बनाना चाहती है। शाह का इशारा किधर है? यह समझना मु​श्किल नहीं है। उनका तात्पर्य यही है कि भाजपा और एबीवीपी के अलावा सभी राष्ट्रविरोधी हैं। क्या यह कहना उचित है? बिल्कुल भी नहीं। लोकतंत्र में चुनाव होता है तो कई लोग उसमें चुनाव लड़ते हैं। हारने वाला राष्ट्र विरोधी नहीं होता है। पहले जहां भाजपा हरती है क्या वहां वह राष्ट्रविरोधी हो जाती है? यदि ऐसा नहीं होता है तो वैसा भी नहीं होता है। इसलिए शाह का ​कथन अल्पज्ञान का परिचायक तो है ही यह नाकारात्मक मानसिकता को भी दर्शाता है।

यह भी कहा जा रहा है कि जुलाई में जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने वाला जेन जी ने अपना मत प्रद​र्शित किया है। चूंकि एबीवीपी के उम्मीदवार विजयी हुए हैं तो जेन जी का समर्थन उसे हासिल हो गया है। इसका मतलब यह है कि जेन जी भाजपा के समर्थन में है। क्या यह सही आकलन है? बिल्कुल भी नहीं है। इसे गलफहमी ही कहा जाएगा। क्यों? आई तथ्यों को देखते हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के विभिन्न कॉलेजों और विभागों में नियमित (Regular) तौर पर पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों की कुल संख्या लगभग 2.46 लाख से 2.51 लाख के बीच है। वर्तमान सत्रों में नियमित पाठ्यक्रमों (स्नातक, स्नातकोत्तर, पीएचडी और डिप्लोमा) में नामांकित कुल छात्रों की संख्या 2.46 लाख से अधिक है। नियमित कॉलेजों में ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे छात्रों की संख्या सबसे अधिक यानी लगभग 2.1 लाख है। मास्टर्स (PG), पीएचडी और अन्य रिसर्च स्तर पर नियमित रूप से पढ़ाई करने वाले छात्रों की संख्या लगभग 34,500 से अधिक है। इसमें गैर-औपचारिक माध्यम जैसे स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग (SOL) और महिला शिक्षा बोर्ड (NCWEB) के दूरस्थ शिक्षा (Distance Education) वाले छात्रों को भी जोड़ दिया जाए तो कुछ छात्रों की संख्या 6.5 लाख से अधिक हो जाती है। लेकिन केवल रोज कॉलेज जाकर पढ़ने वाले नियमित (Regular) विद्यार्थियों की संख्या लगभग 2.5 लाख ही है।
अब सवाल यह है कि 2.5 लाख छात्रों से केवल 1,51,519 ही मतदाता क्यों हैं? इसका जवाब यह है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के सभी कॉलेज डूसू (DUSU) का हिस्सा नहीं हैं। वर्तमान में डीयू के लगभग 91 कॉलेजों में से 52 कॉलेज और विभाग ही सीधे तौर पर डूसू चुनावों से संबद्ध (Affiliated) हैं। सेंट स्टीफंस, लेडी श्री राम (LSR), और जीसस एंड मैरी जैसे कुछ बड़े कॉलेज डूसू का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि उनके अपने स्वतंत्र छात्र संघ हैं। SOL (स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग) और NCWEB के गैर-औपचारिक छात्र भी डूसू के इस मुख्य चुनाव में वोट नहीं डालते। इसलिए, डूसू से जुड़े इन 52 कॉलेजों और विभागों में पढ़ने वाले सभी वर्षों (1st, 2nd, 3rd, 4th Year और PG) के नियमित छात्रों को मिलाकर कुल पात्र मतदाताओं (Eligible Voters) की संख्या लगभग 1.51 लाख होती है।

इस साल छात्र संघ के चुनाव में केवल 40.46 फीसदी छात्रों ने ही अपने मता​धिकार का प्रयोग किया है। यानी कुल 1,51,519 मतदाताओं में से सिर्फ 61,312 विद्या​र्थियों ने वोट दिया। इसमें से भी 23,942 ने नोटा को वोट दिया है। यानी इन लोगों ने सभी छात्र संगठनों और प्रत्या​शियों को नकार दिया है। इस तरह देखा जाए तो प्रत्या​शियों को केवल 37,370 छात्रों ने वोट दिया है।

अब देखते हैं कि एक-एक पद पर किस प्रत्याशी को कितने वोट मिले हैं? अध्यक्ष पद पर विजय हासिल करने वाले एबीवीपी के यश डबास को 24,576 वोट मिले हैं। इसका मतलब है कि इन्हें 61,312 में से 36,736 मतदाताओं ने नकार दिया है। दूसरे स्थान पर रहे एनएसयूआई के विजय शंकर मीणा को 22523 वोट मिले हैं। इन्हें 61,312 मतदाताओं में से 38789 विद्या​र्थियों ने नकार दिया है। तीसरे स्थान पर रहे आइसा-एसएफआई की प्रत्याशी अनन्या रतूड़ी को 5377 वोट मिले हैं। यदि यह वोट एनएसयूआई प्रत्याशी को मिल जाता तो वह जीत जाता। कह सकते हैं कि यह वोट एबीवीपी के प्रत्याशी को मिल जाता तो उसका वोट और बढ़ जाता। लेकिन यहां बात हो रही है कि पक्ष और विपक्ष के समर्थन की। एबीवीपी पक्ष में है तो विपक्ष के वोट उसकी तरफ नहीं जोड़े जा सकते। इसलिए नोटा, आइसा और एनएसयूआई के वोट एबीपीवी के ​खिलाफ हैं। जोकि पक्ष से ज्यादा है। इस लिहाज से यह कहना है कि जेन जी एबीवीपी या भाजपा के पक्ष में है पूरी तरह से गलत होगा। अव्वल तो विपक्ष में गए वोटों से ही यह साबित होता है कि जेन जी भाजपा के पक्ष में नहीं है। इसमें यदि यह देखा जाए कि करीब 60 फीसदी ने तो मतदान ही नहीं किया। वे किधर हैं? जाहिर है कि वे किधर भी नहीं हैं। साफ है कि डूसू की जीत से यह नहीं कहा जा सकता कि जेन जी भाजपा के समर्थन में है। एक बड़ी संख्या है जो यह बताती है कि जेन जी भाजपा के समर्थन में नहीं है।

चुनाव में जातीय समीकरण को नाकारा नहीं जा सकता है। एबीपीवी के प्रत्यशी यश डबास जाट समुदाय से आते हैं। डूसू से संबंद्ध दिल्ली विश्वविद्यालय के 52 काॅलेजों में जाट समुदाय का दबदबा रहा है। दिल्ली, हरियाणा और प​श्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभाव रहता है। एनएसयूई के प्रत्यशी विजय शंकर मीणा राजस्थान से आते हैं और दलित समजा से हैं। फिर भी वह केवल 2053 मतों से पराजित हुए हैं। 20 राउंड की गिनती में वह 14 राउंड तक आगे रहे हैं। यह कोई छोटी बात नहीं है। भारतीय समाज की जातीय संरचना को देखते हुए यह बड़ी उपलब्धी है। कांग्रेस और एनएसयूआई ने एक मु​श्किल भरा प्रयोग किया जोकि काफी हद तक सफल रहा। वैसे तो जो जीता वह सिकंदर होता है लेकिन लड़कर हारने वाला भी किसी सिकंदर से कम नहीं होता है।

उपाध्यक्ष पद पद निर्दलीय दीपांशु शाैकीन जीते हैं। वह भी जाट समाज से आते हैं। उन्हें 30,615 वोट मिले हैं। एबीपीवी प्रत्याशी को 16910 वोट और एनएसयूआई प्रत्याशी वीर चतरथ को मात्र 4313 वोट मिले हैं, जोकि नोटा को मिले वोट से भी कम है। शौकीन की जीत काफी चर्चा में है। इसके लिए एनएसयूआई और कांग्रेस की काफी आलोचना की जा रही है। इसकी वजह यह है कि वीर चतरथ किसी कांग्रेसी नेता के पुत्र हैं। उन्हें टिकट नहीं देना चाहिए था। जिस तरह से उन्हें वोट मिले हैं उससे यह कहना अतिशयो​क्ति नहीं होगी कि जेन जी को नेता पुत्र पसंद नहीं है। यहीं यह भी दर्शाता है कि डीयू के वोट देने वाले विद्या​​र्थियों को जाट समुदाय से आने वाले प्रत्याशी पसंद है। शाैकीन भी जाट समाज से हैं और यश डबास भी। डबास भी जीते और शाैकीन भी। हारी तो एनएसयूआई। इस पद आईएसा-एसएफआई के प्रत्याशी अक्षित शिखर को 2383 वोट मिले हैं।

कहा जा रहा है कि दीपांशु शौकीन एनएसयूआई से उपाध्याक्ष पद के लिए टिकट मांग रहे थे। एनएसयूआई ने उन्हें अध्यक्ष पद के लिए टिकट देने का प्रस्ताव दिया तो उन्होंने अस्वीकार कर दिया। इसके पीछे वजह यह बताई जा रही है कि वह एबीवीपी के जाट उम्मीदवार के ​खिलाफ चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे। एनएसयूआई और कांग्रेस की आलोचना की जा रही है कि उसे शौकीन को उपाध्यक्ष पद पर लड़ा देना चाहिए था। शायद यह ठीक रहता लेकिन किसी इसके पीछे दो वजह रही होगी। एक तो नेता पुत्र की सिफारिश और शाैकीन का अध्यक्ष पद के लिए इन्कार। यह सवाल तो है कि आ​खिर दीपांशु ने यश डबास के ​खिलाफ चुनाव क्यों नहीं लड़ा?

सचिव पद पर एबीवीपी की रिया छाबड़ी जीत हैं। उन्हें कुल 21650 वोट मिले हैं। एनएसयूआई की नम्रता चाैधरी को 14869 वोट मिले हैं। वहीं आईसा-एसएफआई के प्रत्याशी स्टांजिन डेस्योंग को 8734 वोट मिले हैं। एनएसयूआई और आइसा-एसफआई के वोट को मिला दिया जाए तो 23603 वोट होते हैं जोकि एबीवीपी के प्रत्याशी को मिले वोट से 1953 वोट ज्यादा है। रिया और नम्रता गुर्जर समाज से आती हैं। दोनों ही दिल्ली की रहने वाली हैं।

सबसे दिलचस्प मुकाबला संयुक्त सचिव पद पर देखने को मिला है। हालांकि एबीवीपी के लक्ष्यराज सिंह चुनाव जीत गए हैं। उन्हें 16,615 वोट मिले हैं। एनएसयूआई के गोपाल चाैधरी को 15,206 वोट मिले हैं। गोपाल तीसरे नंबर पर रहे हैं। दूसरे नंबर पर समाजवादी छात्र सभा के सम​​​र्थित उम्मीदवार विशेष यादव रहे हैं। इन्हें 15,778 वोट मिले हैं। वहीं आईसा के प्रत्याशी बी. पारिजात को 5,837 वोट मिले हैं। इस पद पर विपक्ष के वोट की जमकर बंटवारा हुआ है। विशेष यादव महज 837वोट से चुनाव हार गए हैं। लेकिन उनके और गोपाल चाैधरी के वोट को जोड़ दिया जाए तो यह संख्या 30 हजार से अ​धिक हो जाती है। कहा जा रहा है ग्रुरुग्राम के रहने वाले विशेष यादव को उम्मीद ​थी कि एनएसयूआई से उन्हें टिकट मिल जाएगा लेकिन नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और सपा ने उन्हें समर्थन दे दिया। इस वजह से उन्होंने कड़ी टक्कर दी।

देखा जाए तो यदि एनएसयूआई दीपांशु शौकीन और विशेष यादव को टिकट दिए होती तो कम से कम दो पद पर उसे जीत मिल ही जाती। दीपांशु निर्दलीय जीत गए हैं। वहीं विशेष यादव बहुत कम वोट से हारे हैं। यदि वह एनएसयूआई से लड़ते तो भारी अंतर से जीतते।

दिल्ली में हॉस्टल गिरने का असर क्यों नहीं दिखाई रहा है? इतनी बड़ी अव्यवस्था के बावजूद एबीवीपी कैसे तीन पदों पर जीत गई? अध्यक्ष पद पर जीतने वाले यश डबास जाट समाज से हैं। दिल्ली के रहने वाले हैं। उपाध्याक्ष पद पर जीतने वाले निर्दलीय दीपांशु शाैकीन जाट समाज से हैं। दिल्ली के रहने वाले हैं। महासचिव पर जीतने वाली रिया गुर्जर समाज से हैं और दिल्ली की रहने वाली हैं। लक्ष्यराज सिंह राजपूत समाज से हैं। राजस्थान के चुरु के रहने वाले हैं। इस तरह तीन पद पर जीतने वाले स्थानीय लोग हैं। हॉस्टल जैसी समस्या का सामना इन्हें नहीं करना पड़ता होगा। जिस जातीय समीकरण से मतदान हुआ है उससे यह कहा जा सकता है कि स्थानीय लोगों को हॉस्टल जैसी समस्या ज्यादा प्रभावित नहीं करती है। यही वजह हो सकती है कि इसका चुनाव पर भी असर नहीं पड़ा। हॉस्टल की समस्या झेलना वाला तो शायद मतदान केंद्र तक गया ही नहीं। न वह चुनाव लड़ रहा था न ही वोट देने गया।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार और चिंतक हैं।

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