विवाह दो लोगों का: सफलता और असफलता का राज

विवाह दो लोगों का: सफलता और असफलता का राज

रिश्तों के बीच बहता वह मौन प्रभाव, जो दिखाई नहीं देता, पर फैसलों की दिशा बदल देता है

“इस बार दिवाली कहाँ मनाएँगे?” आदित्य ने पूछा।

साक्षी ने सहजता से कहा, “मैं चाहती हूँ कि इस बार हम मेरे शहर चलें।”

आदित्य मान गया।

रात को फोन पर साक्षी की माँ बोलीं, “अच्छा हुआ, तुमने अपनी बात मनवा ली।”

आदित्य ने सब सुन लिया।

उसे पहली बार लगा- फैसला साक्षी का था, या पहले ही कहीं और हो चुका था?

विवाह दो लोगों के बीच होता है, लेकिन कई बार उसके फैसले दो लोगों के बीच नहीं लिए जाते।निर्णय की मेज पर पति-पत्नी दिखाई देते हैं, पर उनके साथ चार, छह या कभी-कभी पूरा परिवार अदृश्य रूप से मौजूद होता है।

बाहर से पति-पत्नी स्वतंत्र दिखाई देते हैं। वे अलग घर में रहते हैं, दोनों कमाते हैं, अपने खर्च उठाते हैं और अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने का दावा भी करते हैं।

लेकिन भीतर हर निर्णय के पीछे कोई न कोई अनसुनी आवाज बहती रहती है-

“मम्मी ने ऐसा कहा है…”

“पापा को यह ठीक नहीं लगेगा…”

“हमारे घर में ऐसा नहीं होता…”

और यहीं से विवाह में तीसरे व्यक्ति की उपस्थिति शुरू हो जाती है- बिना दिखाई दिए, बिना सीधे कुछ कहे।

समस्या माता-पिता की राय में नहीं है। जिन्होंने जीवन देखा है, उनकी सलाह कई बार उपयोगी भी होती है। समस्या तब शुरू होती है, जब वही सलाह धीरे-धीरे पति या पत्नी की अपनी इच्छा बनकर सामने आने लगती है।

तब मतभेद केवल किसी फैसले को लेकर नहीं रहता। चोट इस बात की होती है कि बातचीत जीवनसाथी के साथ हो रही थी, लेकिन निर्णय की दिशा कहीं और पहले ही तय हो चुकी थी।

यह छिपा हुआ हस्तक्षेप है।

स्पष्ट हस्तक्षेप दिखाई देता है। उसे पहचाना जा सकता है, उस पर बात की जा सकती है और उससे असहमति भी जताई जा सकती है।

लेकिन मौन प्रभाव दिखाई नहीं देता।

वह सलाह बनकर आता है, भावनात्मक जुड़ाव के भीतर जगह बनाता है और फिर धीरे-धीरे फैसलों पर अपना अधिकार जमा लेता है।

साथी को लगता है कि वह अपने पति या पत्नी की इच्छा पर चर्चा कर रहा है, जबकि उस इच्छा के पीछे किसी और की पसंद, आशंका, अपेक्षा या दबाव काम कर रहा होता है।

आज की पीढ़ी स्वयं को स्वतंत्र मानती है। पति-पत्नी अलग शहरों में रहते हैं, अपनी नौकरी चुनते हैं, अपना घर चलाते हैं और आर्थिक रूप से भी माता-पिता पर निर्भर नहीं रहते।

लेकिन क्या अलग घर में रहना ही स्वतंत्र विवाह का प्रमाण है?

कई दंपती आर्थिक रूप से स्वतंत्र होते हैं, पर भावनात्मक रूप से अब भी अपने-अपने माता-पिता की स्वीकृति खोजते रहते हैं।

कौन-सा घर खरीदना है?

किस शहर में नौकरी करनी है?

बच्चा कब होना चाहिए?

छुट्टियाँ कहाँ बितानी हैं?

पैसे कहाँ निवेश करने हैं?

इन प्रश्नों पर चर्चा पति-पत्नी के बीच कम और मायके-ससुराल में अधिक होने लगे, तो घर भले ही अलग हो, निर्णय-व्यवस्था अब भी संयुक्त रहती है।

यहाँ एक और विचित्र बात दिखाई देती है।

पुरुष अपनी माँ की सलाह को महत्व दे तो उसे जल्दी ही *“मम्माज बॉय”* कह दिया जाता है।

वहीं महिला अपने माता-पिता की इच्छा या सलाह को अपने निर्णय में शामिल करे, तो उसे अक्सर उसका स्वाभाविक भावनात्मक जुड़ाव मान लिया जाता है।

यही दोहरा मापदंड रिश्तों में चिढ़ और कटाक्ष पैदा करता है।

प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि सलाह माँ से आई है या पिता से।

प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या अंतिम निर्णय पति-पत्नी ने मिलकर लिया है?

यदि नहीं, तो समस्या दोनों परिस्थितियों में समान है।

कई बार पति सीधा स्पष्ट कह देता है-

“मम्मी ने ऐसा कहा है।”

“पापा इस बात से सहमत नहीं हैं।”

ऐसे व्यक्ति पर परिवार-निर्भर होने का आरोप जल्दी लग जाता है।

वहीं पत्नी अपने परिवार के प्रभाव को बड़ी कुशलता से छिपा लेती हैं।

वे कहती हैं-

“मैंने बहुत सोचा है…”

“मुझे व्यक्तिगत रूप से यही ठीक लगता है…”

“यह पूरी तरह मेरा फैसला है…”

पति को पता ही नहीं चलता कि इस निर्णय की दिशा पहले ही किसी और ने तय कर दी थी।

जो व्यक्ति प्रभाव को छिपा लेता है, वह स्वतंत्र दिखाई देता है। जो ईमानदारी से परिवार की राय बता देता है, वह निर्भर घोषित कर दिया जाता है।

जबकि विवाह में केवल निर्णय ही महत्वपूर्ण नहीं होता, निर्णय तक पहुँचने की प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

ईमानदार प्रभाव, छिपे हुए प्रभाव से कम खतरनाक होता है।

क्योंकि ईमानदारी में संवाद की संभावना बची रहती है।

छिपाव में संदेह जन्म लेता है।

एक और गलती बहुत सामान्य है- हर बात माता-पिता को बता देना।

पति से छोटी-सी बहस हुई और पत्नी ने तुरंत माँ को फोन कर दिया।

पत्नी की कोई बात बुरी लगी और पति ने पूरा प्रसंग अपनी माँ को बता दिया।

अगले दिन पति-पत्नी की नाराजगी समाप्त हो जाती है। वे साथ बैठते हैं, बात करते हैं और सामान्य हो जाते हैं। लेकिन माता-पिता के मन में शिकायत रह जाती है। पति-पत्नी आगे बढ़ जाते हैं, परिवार वहीं ठहरा रहता है।

फिर अगली मुलाकात में पुरानी घटना का अदृश्य बोझ उपस्थित रहता है।

“वह तुम्हारी बात नहीं समझता।”

“वह हमारे बेटे को हमसे दूर कर रही है।”

“तुम हमेशा उसके परिवार का पक्ष लेते हो।”

“तुम्हारे घरवाले हर बात में दखल देते हैं।”

जो बात दो लोगों के बीच समाप्त हो सकती थी, वह दो परिवारों के बीच इतिहास बन जाती है। हर बात साझा करना निकटता नहीं होता। कई बार वह वैवाहिक निजता का उल्लंघन भी होता है।

विवाह का असली परीक्षण तब नहीं होता, जब दोनों परिवार एक ही बात चाहते हों।

असली परीक्षण तब होता है, जब दोनों परिवारों की इच्छाएँ अलग हों।

उस समय पति-पत्नी एक-दूसरे के सामने खड़े होंगे या एक-दूसरे के साथ?

पति अपने माता-पिता के सम्मान की रक्षा करेगा और पत्नी अपने मायके की भावनाओं की, लेकिन यदि इसी प्रयास में दोनों अपने विवाह को असुरक्षित बना दें, तो जीत किसकी होगी?

माता-पिता से दूरी बनाना समाधान नहीं है।

उनसे प्रेम, संवाद और सम्मान बने रहना चाहिए।

लेकिन हर रिश्ते की एक भूमिका और सीमा होनी चाहिए।

माता-पिता मार्गदर्शक हो सकते हैं, निर्णयकर्ता नहीं।

वे सहारा हो सकते हैं, नियंत्रण का केंद्र नहीं।

पति-पत्नी को यह तय करना होगा कि कौन-सी बातें केवल उनके बीच रहेंगी, किन फैसलों में सलाह ली जाएगी और किस बिंदु पर अंतिम निर्णय वे स्वयं करेंगे।

कुछ साधारण वाक्य कई रिश्ते बचा सकते हैं-

“मैं पहले अपने जीवनसाथी से बात करूँगा।”

“आपकी सलाह महत्वपूर्ण है, पर अंतिम निर्णय हम दोनों मिलकर लेंगे।”

“यह मेरे माता-पिता की राय है, मेरी अंतिम राय नहीं।”

“हमारे निजी मतभेदों को बाहर ले जाना ठीक नहीं है।”

ये वाक्य विद्रोह नहीं हैं।

ये परिपक्वता के संकेत हैं।

सफल विवाह में माता-पिता का सम्मान कम नहीं होता। बस उनकी भूमिका स्पष्ट हो जाती है।

असफल विवाहों में अक्सर मतभेद समस्या नहीं होते। समस्या यह होती है कि मतभेद के समय पति-पत्नी एक-दूसरे से बात करने के बजाय अपने-अपने परिवारों की अदालत में पहुँच जाते हैं।

वहाँ हर माता-पिता को स्वाभाविक रूप से अपने बच्चे का दृष्टिकोण सही लगता है, क्योंकि घटना का वही पक्ष उनके सामने रखा जाता है। उन्हें वही कहानी सुनाई देती है, जो उनका बच्चा उन्हें बताता है। धीरे-धीरे वे दूसरे पक्ष में कमियाँ खोजने लगते हैं- “उसने ऐसा क्यों कहा?”, “उसके घरवालों ने ऐसा क्यों किया?”, “हमारे बच्चे के साथ ही गलत क्यों हुआ?”

एक पक्ष अपने बच्चे को निर्दोष साबित करता है और दूसरा अपने बच्चे को।

फिर मुद्दे का समाधान पीछे छूट जाता है और यह तय करने की होड़ शुरू हो जाती है कि गलती किसकी थी। यहीं से दो व्यक्तियों का छोटा-सा मतभेद दो परिवारों की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है और रिश्तों में वे दरारें उभरने लगती हैं, जिन्हें बाद में केवल पति-पत्नी का समझौता भी पूरी तरह नहीं भर पाता।

फिर निर्णय प्रेम से नहीं, समर्थन जुटाकर लिए जाते हैं। यहीं से बात एक छोटे मतभेद से निकलकर दो परिवारों की धारणा बन जाती है। पति-पत्नी शायद अगले दिन सामान्य हो जाएँ, लेकिन दोनों परिवारों के मन में एक-दूसरे के लिए संदेह, शिकायत और दूरी बची रह जाती है।

और रिश्तों में दरारें अक्सर किसी बड़े झगड़े से नहीं आतीं। वे ऐसी ही छोटी-छोटी पक्षधरियों, अधूरी बातों और एकतरफा निष्कर्षों से जन्म लेती हैं।

विवाह को सफल बनाने का रहस्य कठिन नहीं है-

निर्णय से पहले संवाद।

सलाह से पहले पारदर्शिता।

परिवार से पहले जीवनसाथी से चर्चा।

और सबसे बढ़कर- किसी तीसरे व्यक्ति की इच्छा को अपनी इच्छा बनाकर प्रस्तुत न करना।

क्योंकि विवाह दो परिवारों के सम्मान से चलता है, लेकिन उसके निजी निर्णय दो व्यक्तियों के विश्वास से बनते हैं।

अन्यथा घर स्वतंत्र होगा, आय स्वतंत्र होगी, जीवनशैली आधुनिक होगी-

लेकिन हर फैसले के पीछे कोई मौन आवाज अब भी कहती रहेगी-

“पहले घर पर पूछ लो।”

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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