जसवीर त्यागी की कविता- अनाउंसर की आवाज़ और चार लड़के और शहतूत का पेड़

कविता

अनाउंसर की आवाज़

जसवीर त्यागी

रेलवे स्टेशन पर ट्रेन की प्रतीक्षा में बैठा हूँ
ट्रेन के आने में समय है अभी

आते-जाते,बैठे-भागते यात्रियों को देखना
भागती दुनिया को आँखों से पकड़ना है

बीच-बीच में अनाउंसर
आती-जाती ट्रेनों की सूचना दे रही है

अनाउंसर ने अभी-अभी
तुम्हारे शहर की ओर
जाने वाली ट्रेन की सूचना दी है

तुम्हारे शहर का नाम सुनकर
मैं विस्मय,उत्सुकता
और व्यग्रता से भर गया हूँ

जितनी बार अनाउंसर
तुम्हारे शहर का नाम पुकारती है
मैं बिजली के तारों में अटकी
किसी पतंग-सा हिलता हूँ

अनाउंसर को नहीं पता
तुम्हारे शहर से अनन्य प्रेम करने वाला
एक इंसान बैठा है रेलवे स्टेशन पर

जितनी बार तुम्हारे शहर का नाम सुनता हूँ
उतनी बार
सितार के तार-सा झंकार से भर जाता हूँ।

चार लड़के और शहतूत का पेड़

चार लड़के चारों मित्र
चारों बेरोज़गार
चारों हंसते-रोते हैं साथ-साथ

निकलते हैं साथ-साथ
रोज़गार की तलाश में
एक जगह से दूसरी
दूसरी से तीसरी

लौटते हैं जब वे घर शाम को
बग़ैर बताए ही जान लेते हैं
गुजरे दिन का हाल

चारों लड़कों को न लगती है धूप
न बारिश और न ही ठण्ड
बेरोज़गारी की एक लंबी काली चादर
हर वक़्त तनी रहती है उन पर

चारों लड़के पढ़ते हैं अख़बार
भागते हैं यहां से वहां
देते हैं परीक्षाएँ
करते हैं देर रात तक सवाल-जवाब
चिलचिलाती धूप में लौटते हैं घर
हाथों में थामें ऊँची-ऊँची डिग्रियाँ

राह में एक दिन
मिलता है शहतूत का पेड़
चारों लड़के रूककर देखते हैं
शहतूत से लदा पेड़

एक ने कहा– शहतूत
मीठे होंगे– दूसरे ने कहा
आख़िरी बार कब खाए थे शहतूत ?
याद नहीं आ रहा
तीसरा सोच रहा है टहनी पकड़े
चौथा चुप और शांत सोच रहा है
आदमी और पेड़ के सबंधों पर

चारों लड़कों ने
एक अलग सिरे पर रख दी हैं ऊँची- ऊँची डिग्रियां
चारों लड़के मिल रहे हैं पेड़ से
मानो उनका कोई ज़िगरी दोस्त
लौटा है फ़ौज से लम्बे अरसे के बाद

चारों लड़के भूल गए हैं
उन्हें तलाश है रोज़गार की
भूल गए हैं दुनियादारी का जमा-घटा

उनके सामने है अब
किस डाल पर लटके हैं?
ज्यादा से ज्यादा शहतूत

चारों लड़के मस्त हैं
जब दुनिया के तमाम पहुंचे हुए लोग
सब कुछ निगल जाना चाहते हैं
एक ही घूँट में
ऐसे अभिन्न दौर में चारों लड़के
सभी में बाँट देना चाहते हैं थोड़े- थोड़े शहतूत

चारों लड़के चले जाएंगे
अलग-अलग चारों दिशाओं में
चाहकर भी मिल नहीं पाएंगे
अगर मिलेंगे भी तो कहाँ खा पाएंगे ?
इकट्ठे मिलकर शहतूत

चारों लड़के गुम हो जाएंगे
दुनिया की भीड़ में
भूल जाएंगे मीठे-मीठे लम्बे शहतूत
भूल जाएंगे शहतूत का पेड़

लेकिन कैसे भूल पाएगा पेड़
कि एक दिन तपतपाती धूप में
आए थे चार बेरोज़गार लड़के।


कवि दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर हैं।

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