जसवीर त्यागी की पार्क केंद्रित कविताएँ
अनमोल सुबह
पार्क में एक बैंच पर अकेला बैठा हूँ
हालाँकि अकेला नहीं हूँ
पैरों तले जमीन
और सिर पर आसमान है
इर्द-गिर्द घने छायादार हरे-भरे पेड़
एक-दूसरे से गले मिल रहे हैं
सुबह की नहाई खिली-खिली धूप
बार-बार दिखा रही है अपना दिव्य-रूप
पवन का कोई पावन झोंका
गुदगुदा देता है मुझे बेरोकटोक
बीच-बीच में दरख्तों में छुपे बैठे
पंछियों का मधुर गान
बुलाता है अपनी ओर
कुछ कौएं,गुरसल,कबूतर
और चिड़िया कर रही हैं
आपस में सोच-विचार
कई चंचल गिलहरियाँ
आइसपाईस खेल रही हैं
सुबह का यह मोहक दृश्य
स्मृतियों के कैमरे में
संजोकर रखना चाहता हूँ
किसी अनमोल जेवर की तरह।
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असल-नकल
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पार्क में
सुबह की सैर के दौरान
कुछ लोग
समूह में जोर-जोर से
लाफ़िंग एक्सरसाइज करते हैं
बिन कारण ही
नकली हँसी हँसते हैं
उनको हँसता देखकर
बहुत सारे लोग असली में हँसते हैं
कभी-कभी नकल
असल को बरकरार रखती है।
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|| टूटना ||
झर रही हैं नीम की पत्तियाँ
पत्तियाँ अठखेलियाँ करती हुई
बगैर समझे-विचारे
कूद पड़ती हैं डाल से जमीन पर
हरे-पीले हल्के रंग की
हाथ से बुनी हुई-सी एक चादर
बिछती जा रही है पृथ्वी पर
पत्तियाँ जुदा हो रही हैं पेड़ से
और सुगन्ध पत्तियों से दूर जा रही है
पत्तियाँ हों
हो जीव-जंतु या मनुष्य
टूटता है जो एक बार अपने मूल से
फिर खोया-खोया-सा
भटकता फिरता है दर-बदर
नीम से टूटी हुई
पत्तियों की मानिंद।
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फूलों की क्यारी
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पार्क में सुबह की सैर करते हुए
फूलों की एक क्यारी आती है
जिसमें अनेक रंगों के फूल
आने-जाने वालों को देखकर मुस्कुराते रहते हैं
मुस्कुराहट दुनिया का सबसे अनमोल उपहार है
फूलों की वह क्यारी
पार्क का दिल है
जो सैर करने वालों के दिलों को सुंदर बनाती है।
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शोक-गान
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पार्क में एक स्थान है
जहाँ बहुत सारे पँछी
दाना चुगते हैं
सुबह की सैर करते हुए
उस स्थान से मैं गुजरा
देखा कहीं से एक नेवला आया
और झपटा मार
दाना चुगती एक गुरसल को
खींचकर अपने बिल में ले गया
समूह के सारे पँछी छटपटाते रहे
पंख कटे पाखी-से
बेबस चीखते-चिल्लाते रहे
सुबह-सुबह
पंछियों का सामूहिक शोक गान
पार्क में देर तक गूँजता रहा।
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पेड़ और गिलहरी
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पार्क में
मैं एक पेड़ तले बैठा था
कुछ देर बाद
वहाँ एक गिलहरी आयी
और नजदीक आकर
मुझे किसी परिचित की तरह निहारने लगी
वह देर तक खेलती रही
पार्क से जब मैं घर लौटा
पेड़ और गिलहरी
मेरे साथ-साथ घर तक चले आये।
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भरोसा
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पार्क में सुबह की सैर करते हुए
पेड़ से एक पत्ता टूटकर
मेरे कांधे पर गिरा
पत्ता टिका रहा देर तक
मेरे कांधे पर
मैंने उसकी इच्छा के विरुद्ध
हटाना मुनासिब नहीं समझा
चाहता हूँ
जब तक यह दुनिया रहे
पत्ते का भरोसा
बना रहे इंसान में।
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निशान
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पार्क आते-जाते हुए
रास्ते में
शहतूत से लदे पेड़ मिलते हैं
लेकिन! पेड़ों से शहतूत खाने वाले
बहुत कम दिखते हैं
शहतूत कब तक
किसी की बाट जोहते रहेंगे?
आखिर उनके साँसों की डोर भी
समय-सरताज के हाथों में है
इंतजार की इंतिहा होने पर
वे पेड़ से जमीन पर कूदकर
खुद को खत्म कर लेते हैं
मैं रोज सड़क पर
पेड़ों से पड़े हुए
शहतूतों के निशान देखता हूँ।
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जन्म के बारे में स्त्री जानती है
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पार्क के कोने में
एक मादा श्वान ने
पाँच शिशुओं को जन्म दिया है
इस घटना को
पार्क में आने-जाने वाले
कम लोग जान पाए
मैं भी तब जान पाया
जब मैंने देखा
घरों में काम करने वाली
एक स्त्री को
उस मादा श्वान को दूध रोटी खिलाते हुए
पार्क में सुबह-शाम
सैकड़ों लोग आते-जाते हैं
चंद लोग ही जान पाये
प्रसूता और उसके शिशुओं के बारे में
उसे एक स्त्री समझ पाई
क्योंकि वह जानती है
जन्म देने की सच्चाई।
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पार्क की सैर
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पार्क में बहुत सारे लोग आते हैं
बच्चे बुजुर्ग,स्त्री पुरुष
कुछ अकेले घूमते हैं
कुछ समूह में झूमते हैं
कभी-कभी
किसी के साथ बन जाता है संवाद-सेतु
कुछ बड़े बुजुर्गों से हो जाती है दुआ-सलाम
जान नहीं पाते हम
एक-दूसरे का अता पता और नाम
लेकिन! जब भी मिलते हैं पार्क में
दोनों ओर से चमकती है मुस्कुराहट की धूप
सामाजिकता का सूर्य पूर्ण करता है अपनी परिक्रमा
फिर अचानक पार्क आने वाले बुजुर्गों में से
कोई एक दिखता नहीं
सोचता हूँ,आ गया होगा कोई जरूरी काम
मिल ही जायेंगे किसी दिन
जब कई दिनों और सप्ताहों तक
उनकी अनुपस्थिति की उपस्थिति
उड़ने लगती है हवाओं में
मैं दृष्टि की दूरबीन को घुमाता हूँ चारों दिशाओं में
और दूरबीन भी थक हारकर
नहीं देख पाती कोई खुशनुमा ख़बर
फिर सोच के समंदर में उठने लगते हैं
शंकाओं के ज्वार-भाटे
कहीं दूर बहती हुई दिखती है ऐनक और बेंत
फिर बहुत दिनों तक लगातार
महसूस होता है
पार्क की हवा में
ताज़गी कम हो रही है।
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गुनाहगार
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पार्क के गेट पर
एक उम्रदराज़ आदमी
आने-जाने वालों को दुआ-सलाम करता है
फिर झट से अपनी सूनी हथेलियाँ
उनके सामने पसार देता है
और गिड़गिड़ाता हुआ कुछ देने की मांग करता है
पार्क में आने-जाने वाले आदमी
उसे अनदेखा करते हैं
ऐसे आदमी के मिलने को
ख़ुशनुमा सुबह को खराब करने का गुनाहगार ठहराते हैं
सोचता हूँ,जिस उम्र में थम जाना था
जीवन की जिम्मेदारियों का जहाज
तब भी एक बुजुर्ग आदमी
दूसरों के रहमोकरम पर जिंदा है
यह हमारे समाज और समय का कितना जटिल सवाल है
क्या भीख माँगने वाला आदमी
अकेला गुनाहगार है?
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