युद्ध के विरुद्ध युद्ध-19
कविता हमेशा युद्ध के खिलाफ़ खड़ी रही है, भले ही तानाशाह युद्ध को राष्ट्रवादी गौरव बताकर उसका महिमामंडन करते रहे हों। लेकिन उसकी कीमत आम आदमी ने ही चुकाई है (महमूद दरवेश)। बहरहाल जो युद्ध चल रहे हैं उनके नकारात्मक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं । किसी भी युद्ध में जहां बच्चे और महिलाओं समेत नरसंहार होते हैं, वहीं इस विध्वंस से अंतरराष्ट्रीय सामाजिक जीवन भी तहस-नहस होता है।
प्रतिबिंब मीडिया साहित्यकारों की इस चिंता से भली-भांति वाकिफ़ है। ‘युद्ध के विरुद्ध युद्ध’ शीर्षक के तहत हम आपका युद्ध विरोधी साहित्य प्रकाशित करेंगे। आप अपनी कविताएं, कहानियों समेत रचनाएं हमें भेजिए, उन्हें प्रतिबिंब मीडिया पर ससम्मान प्रकाशित किया जाएगा। आज प्रस्तुत है जयपाल की एक और कविता- हमला । संपादक
कविता
हमला
जयपाल
उस देश पर हमले के समय
हमारे देश के सैनिकों ने वही गीत गाए
जो उस देश के सैनिक गा रहे थे
हमारे देश की जनता ने भी वही नारे लगाए
जो उस देश की जनता लगा रही थी
हमने वही प्रार्थना की अपने ईश्वर से
जो वो करते रहे अपने खुदा से
बात बहुत देर में समझ में आई
जब बात हाथ से निकल गई
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निसंदेह जयपाल जी हमारे समय के एक जरूरी और बड़े कवि हैं। मैं उनकी कविताओं का बहुत मुरीद हूं। व्यंग्य और विडंबना अक्सर उनकी कविताओं में गुंफित रहता है। असीम गहराई के साथ साथ उनकी कविता में रोचकता बनी रहती है। उनकी संक्षिप्त कविताएं अक्सर आखिर में “विस्फोटक-उर्जा” का विसर्जन करके पाठक को झटका-सा देती हैं और सोचने पर विवश कर देती है!