लघु कथा
किटी पार्टी
डॉ रीटा अरोड़ा
“अरे सीमा! कितने दिन बाद मिली। बेटा कैसा है?” राधा ने प्लेट उठाते हुए पूछा।
“बढ़िया है। सुबह स्कूल, फिर ट्यूशन, फिर स्विमिंग, फिर रोबोटिक्स। रात तक इतना थक जाता है कि किसी से बात करने का भी उसका मन नहीं करता।” सीमा मुस्कुरा दी।
“अच्छा… अकेला ही है न?”
“हाँ, और तुम्हारे?”
“हम तो संयुक्त परिवार में हैं। घर में चार बच्चे हैं। कभी लड़ते हैं, कभी एक-दूसरे का होमवर्क करते हैं, कभी दादी की डाँट खाते हैं।”
सीमा हँसते हुए बोली, “तुम्हारे घर तो हर समय शोर रहता होगा।”
“हाँ… लेकिन उसी शोर में सब एक-दूसरे को सुनना भी सीख जाते हैं।”
इतने में सीमा का फोन बजा।
“हाँ बेटा… क्या हुआ?… अरे, पानी की बोतल खुद भर लो… मैं एक घंटे में आ जाऊँगी।”
फोन रखते ही उसने पूछा, “तुम्हारे बच्चे भी ऐसे ही हर छोटी बात पर फोन करते हैं?”
राधा मुस्कुराई, “नहीं… अगर मैं घर पर न रहूँ, तो वे पहले दादी, फिर चाची, फिर बड़े भैया के पास चले जाते हैं।”
कुछ पल दोनों चुप रहीं।
किटी में शोर पहले जैसा ही था…
लेकिन दोनों के मन में अपने-अपने घरों की आवाज़ें गूँज रही थीं।
