डॉ. रीटा अरोड़ा की लघुकथा : खोखले रिश्ते

लघुकथा

खोखले रिश्ते

डॉ. रीटा अरोड़ा

 

“बेटा, कब आओगे?”

 

माँ ने फोन पर पूछा।

 

“माँ, बहुत व्यस्त हूँ। जल्द आऊँगा।”

 

यह “जल्द” कई महीनों से नहीं आया था।

 

हर त्योहार पर बेटा महंगे उपहार भेज देता।

 

माँ मुस्करा देती, पर उसकी आँखें दरवाज़े पर ही टिकी रहतीं।

 

एक दिन पड़ोसन ने पूछा-

 

“बहन जी, बेटा कब आया था?”

 

माँ ने हँसकर कहा-

 

“बस, आता ही रहता है।”

 

लेकिन कमरे में टंगी बेटे की तस्वीर कुछ और कह रही थी।

 

कुछ दिनों बाद माँ की तबीयत बिगड़ गई।

 

बेटे को खबर दी गई।

 

वह तुरंत पहुँचा।

 

माँ का हाथ पकड़कर बोला-

 

“माँ, बताओ क्या चाहिए?”

 

माँ ने धीमे से कहा-

 

“जब मैं ठीक थी, तब थोड़ा समय चाहिए था बेटा।”

 

बेटा निरुत्तर था।

 

उसके पास धन था,

 

सुविधाएँ थीं,

 

उपहार थे,

 

पर उस पल उसे एहसास हुआ कि

 

जिस रिश्ते को वह निभा हुआ समझ रहा था,

 

वह भीतर से खोखला हो चुका था।

 

*रिश्ते उपहारों और औपचारिकताओं से नहीं, समय, अपनापन और साथ से जीवित रहते हैं।*

*खोखले रिश्ते बाहर से भले चमकते हों, भीतर से वे धीरे-धीरे टूट रहे होते हैं।*

 

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल हैं

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