जंतर-मंतर पर महिलाओं का निरंतर संयुक्त धरना: ऐतिहासिक महत्व
डॉ. मनजीत राठी (मीडिया संयोजक)
राष्ट्रीय महिला आरक्षण गठबंधन (एनसीडब्ल्यूआर) द्वारा महिलाओं के लिए आरक्षण कानून को सभी प्रकार की शर्तों से अलग करते हुए तत्काल लागू करने की मांग को लेकर 20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित सतत धरना भारत के लोकतांत्रिक और महिला आंदोलनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज किया जाएगा। अखिल भारतीय जनवाद महिला समिति (एडवा) की पहल पर शुरू हुए और उसके नेतृत्व में संचालित इस आंदोलन ने महिलाओं की सामूहिक शक्ति, दृढ़ संकल्प और एकता का अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। संसद के पूरे मानसून सत्र के दौरान लगातार उन्नीस दिनों तक भीषण गर्मी, मूसलाधार बारिश, यातायात संबंधी कठिनाइयों, पुलिस प्रतिबंधों और उत्पीड़न, भारी बैरिकेडिंग, निगरानी तथा अनेक अन्य व्यावहारिक चुनौतियों के बावजूद धरने का निरंतर जारी रहना महिलाओं की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं की एक सशक्त अभिव्यक्ति थी।
धरने में शामिल महिला संगठनों, नेटवर्कों और नागरिक समाज समूहों की एकता और शक्ति इतनी व्यापक थी कि 11 अगस्त से दिल्ली पुलिस द्वारा स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों का हवाला देते हुए जंतर-मंतर और उसके आसपास के क्षेत्रों को सील कर दिए जाने तथा नई दिल्ली में कहीं भी प्रदर्शन की अनुमति न दिए जाने के बाद भी आंदोलन नहीं रुका। महिलाओं ने बिना विचलित हुए धरने को राउज एवेन्यू क्षेत्र के निकट स्थानांतरित कर दिया और संसद के अंतिम दिन तक आंदोलन को निर्बाध रूप से जारी रखा। एडवा के अतिरिक्त इस गठबंधन में अनेक महिला संगठनों ने भागीदारी की, जिनमें एनएफआईडब्ल्यू, एआईपीडब्ल्यूए, वाईडब्ल्यूसीए ऑफ इंडिया, अनहद, इंडियन क्रिश्चियन विमेन्स मूवमेंट (आईसीडब्ल्यूएम), अलीफ़ा, एसएनएस, टुगेदर फॉर ट्रैंक्विलिटी, यूनिटी इन कम्पैशन, एआईडीएमएएम, फोरम अगेंस्ट ऑप्रेशन ऑफ विमेन, माध्यम, वन बिलियन राइजिंग इंडिया, विमोचना तथा कई अन्य संगठन शामिल थे।
धरने की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक उसका अद्भुत धैर्य और निरंतरता थी। उतना ही महत्वपूर्ण उसका व्यापक सामाजिक आधार था, जिसने महिलाओं, विद्यार्थियों, किसानों, मजदूरों और विभिन्न लोकतांत्रिक संगठनों को समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग के लिए एक साझा मंच पर एकजुट करने में सफलता प्राप्त की।
एडवा की अग्रणी भूमिका
पिछले तीन दशकों से अधिक समय से महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों के संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभाने वाले एडवा ने इस ऐतिहासिक पहल की शुरुआत की। 19 से 21 मई 2026 के बीच दिल्ली में आयोजित केंद्रीय कार्यकारिणी समिति की बैठक में इस आंदोलन का निर्णय लिया गया और बाद में इसे निरंतर आगे बढ़ाया गया। धरने को सफल बनाने के लिए दिल्ली और हरियाणा से प्रतिदिन बड़ी संख्या में महिलाओं को संगठित किया गया। इसके साथ ही उत्तर भारत के अन्य पड़ोसी राज्यों से भी क्रमवार आधार पर महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की गई।
मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से महिला प्रतिनिधिमंडल बारी-बारी से धरने में शामिल हुए। इन प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व हरियाणा से सविता और उषा सरोहा, बिहार से रामपरी और नीलम, राजस्थान से कमला मेघवाल और सीमा जैन, मध्य प्रदेश से अंजना कुरारिया और प्रीति, हिमाचल प्रदेश से फालमा चौहान, पंजाब से कवलजीत कौर, उत्तर प्रदेश से मधु गर्ग, वंदना राय और सुमन सिंह तथा उत्तराखंड से दमयंती ने किया। प्रतिदिन बड़ी संख्या में महिलाएं धरना स्थल पर पहुंची और क्रमवार तरीके से आंदोलन को निरंतर बनाए रखा। केरल से राज्य सचिव सी. एस. सुजाता के नेतृत्व में तथा पश्चिम बंगाल से राज्य अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक जहानारा खान और राज्य सचिव मोनालिसा सिन्हा के नेतृत्व में एडवा के मजबूत प्रतिनिधिमंडलों ने भी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। उनकी उपस्थिति ने आंदोलन को और अधिक विविधता, ऊर्जा और मजबूती प्रदान की।
ओडिशा और महाराष्ट्र से अखिल भारतीय नेताओं तापसी प्रहराज और प्राची हटावलेकर तथा पुडुचेरी से सुधा सुंदररमन ने भी अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई। दूर-दराज़ के राज्यों की भागीदारी ने आंदोलन को वास्तविक अर्थों में राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया और उसकी राजनीतिक वैधता को और अधिक सुदृढ़ किया।
एडवा ने महिलाओं के आरक्षण कानून को बिना किसी और देरी के लागू कराने की एकमात्र मांग के आधार पर महिला संगठनों के बीच व्यापक एकता स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयास किए। जंतर-मंतर पर आयोजित केंद्रीय धरने को एडवा की 26 राज्य इकाइयों द्वारा संचालित समानांतर अभियानों से भी महत्वपूर्ण मजबूती मिली। इनमें संसद के पहले दिन, 20 जुलाई को विभिन्न राज्यों में राजभवनों के बाहर प्रदर्शन, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को संबोधित समन्वित ई-मेल अभियान तथा विभिन्न राज्यों में राजनीतिक नेताओं और विपक्षी दलों से मुलाकातें शामिल थीं। विशेष रूप से उल्लेखनीय यह था कि इन अभियानों में से अनेक अन्य महिला संगठनों के साथ संयुक्त रूप से संचालित किए गए, जो महिला आंदोलन के भीतर बढ़ती एकता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
धरने के समय का राजनीतिक महत्व
धरने का समय राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत रणनीतिक और महत्वपूर्ण था। इस आंदोलन को संसद के कैलेंडर के साथ जोड़कर महिला संगठनों के गठबंधन ने यह सुनिश्चित किया कि महिला आरक्षण का मुद्दा लगातार सार्वजनिक चर्चा और राजनीतिक बहस के केंद्र में बना रहे। संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन एक विशाल प्रदर्शन के साथ आंदोलन की शुरुआत और पूरे सत्र के दौरान उसका निरंतर जारी रहना इस बात का स्पष्ट संकेत था कि महिलाएँ अब उन अधिकारों के लिए अनिश्चितकाल तक प्रतीक्षा करने के लिए तैयार नहीं हैं, जिन्हें संवैधानिक मान्यता पहले ही मिल चुकी है।
दिल्ली और विभिन्न राज्यों से प्रतिदिन बड़ी संख्या में महिलाओं की उपस्थिति ने जंतर-मंतर को लोकतांत्रिक प्रतिरोध के एक जीवंत केंद्र में बदल दिया। राजस्थान और हरियाणा से आई महिलाओं ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा में अपनी हथेलियों पर मेहंदी से 33 प्रतिशत आरक्षण का नारा अंकित किया। दिल्ली की महिलाओं ने राजनीतिक न्याय की मांग वाले विशेष रूप से तैयार किए गए छातों के साथ प्रदर्शन में भाग लिया। कई महिलाएँ एक हाथ में अपने बच्चों को और दूसरे हाथ में तख्तियाँ लेकर आंदोलन में शामिल हुईं। यह दृश्य अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही श्रमिक वर्ग की महिलाओं के सशक्त संकल्प का प्रतीक बन गया।
धरना स्थल रचनात्मकता और प्रतिरोध के एक जीवंत मंच में परिवर्तित हो गया। महिलाओं ने डफली की ताल पर क्रांतिकारी गीत गाए, नुक्कड़ नाटकों का मंचन किया और आंदोलन के लिए विशेष रूप से रचित गीतों पर सामूहिक प्रस्तुतियाँ दीं। प्रत्येक दिन अभिव्यक्ति के नए रूप सामने आए, जिन्होंने एक ओर मोदी सरकार की कथित नीतिगत विसंगतियों को उजागर किया और दूसरी ओर महिलाओं की सामूहिक शक्ति को प्रदर्शित किया।
आंदोलन की भावना निम्नलिखित नारों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी—“100 में 33 लेकर रहेंगे।”
“पंचायतों में आई हैं, संसद में भी आएंगी” , “महिलाएँ जब आगे आएं , लोकतंत्र तब जीवन पाए ।”
इसी प्रकार आंदोलन का लोकप्रिय गीत—
“देश के हर कोने से बहनों, आज उठी ललकार है,
एक तिहाई आरक्षण का, मांग रही अधिकार है…”
महिलाओं के राजनीतिक न्याय की मांग को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करता था।
विरोध प्रदर्शन की कुछ प्रमुख झलकियाँ
20 जुलाई को धरने के पहले ही दिन महिलाओं ने जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र-युवा आंदोलन के प्रति पूर्ण एकजुटता व्यक्त की और प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध पुलिस द्वारा की गई कठोर कार्रवाई की तीखी आलोचना की। महिला नेताओं ने सरकार की इस कार्रवाई को उसके तानाशाही दृष्टिकोण और शिक्षा सुधारों के प्रति उसकी उदासीनता का प्रमाण बताया। 23 जुलाई को धरने की शुरुआत एडवा की संस्थापक नेताओं में से एक, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महान सेनानी तथा आज़ाद हिंद फ़ौज की प्रमुख नेता कैप्टन लक्ष्मी सहगल की पुण्यतिथि पर उन्हें क्रांतिकारी श्रद्धांजलि अर्पित करके की गई। इसका नेतृत्व एडवा की संरक्षक बृंदा करात, राष्ट्रीय अध्यक्ष पी. के. श्रीमती, महासचिव कनिनिका घोष और उपाध्यक्ष सुभाषिनी अली ने किया। सभी वक्ताओं ने दोहराया कि महिला आरक्षण कानून को लागू करने में भाजपा सरकार की जानबूझकर की जा रही देरी उसके गहरे पितृसत्तात्मक, रूढ़िवादी और ‘मनुवादी’ दृष्टिकोण को उजागर करती है, जो महिलाओं को घरेलू भूमिकाओं तक सीमित रखना चाहता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस देरी के कारण महिलाओं को 2024 के लोकसभा चुनावों तथा उसके बाद हुए दस विधानसभा चुनावों में बढ़े हुए राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित होना पड़ा, जो उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ गंभीर अन्याय है।
धरने में शामिल महिलाओं ने 20 से 25 जुलाई के बीच जंतर-मंतर पर चले छात्र-युवा आंदोलन की सफलता का भी स्वागत किया, जिसके परिणामस्वरूप शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।गठबंधन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेता टी. जी. मोहनदास द्वारा सोशल मीडिया पर की गई भड़काऊ और अत्यंत स्त्री-विरोधी टिप्पणियों की भी कड़ी निंदा की। मोहनदास ने अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट में यह दावा किया था कि विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने वाली धर्मनिरपेक्ष महिलाएँ “बलात्कार के पक्ष में हैं” और यदि उनके साथ यौन हिंसा की जाए तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। गठबंधन ने इन टिप्पणियों को यौन हिंसा को सामान्य बनाने, पीड़िता को दोषी ठहराने और लोकतांत्रिक आंदोलनों में भाग लेने वाली महिलाओं को बदनाम करने का एक स्पष्ट प्रयास बताया। महिला नेताओं ने कहा कि भारत की महिलाओं और लड़कियों को वास्तव में इसी प्रकार की प्रतिगामी मानसिकता से सुरक्षा की आवश्यकता है।
7 अगस्त की विशाल रैली
धरने का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव 7 अगस्त को सामने आया, जब लगातार हो रही भारी वर्षा के बावजूद गठबंधन ने एक विशाल रैली का आयोजन किया। दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य पड़ोसी राज्यों से सैकड़ों महिलाएँ असाधारण दृढ़ता के साथ इस रैली में शामिल हुईं। आदित्य सदन से जंतर-मंतर तक निकला निर्बाध जुलूस और उसके बाद मूसलाधार बारिश के बीच आयोजित जनसभा महिलाओं की राजनीतिक चेतना, प्रतिबद्धता और अटूट संकल्प का जीवंत उदाहरण बन गई। रैली को कनिनिका घोष, सुभाषिनी अली, मरियम धावले, निशा सिद्धू, श्वेता राज, कुंजम्मा मैथ्यू, जॉयसिया थोराट और भावना शर्मा ने संबोधित किया। वक्ताओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि देश की महिलाएँ महिला आरक्षण को सांप्रदायिक और विभाजनकारी राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का माध्यम नहीं बनने देंगी। रैली के दौरान अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य कॉमरेड अशोक धावले, सीटू के अध्यक्ष सुदीप दत्ता, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दिल्ली राज्य सचिव दिनेश वार्ष्णेय, एआईएसए के राष्ट्रीय महासचिव प्रसेनजीत और एआईएसएफ के नेता बिट्टू कुमार ने भी आंदोलन के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया। इन नेताओं ने विश्वास व्यक्त किया कि महिलाओं का एकजुट आंदोलन अंततः सरकार को महिला आरक्षण कानून लागू करने के लिए बाध्य करेगा।

10 अगस्त को धरने को एडवा की संस्थापक सदस्यों में से एक तथा भारतीय महिला अध्ययन संस्थान की पूर्व निदेशक इंदु अग्निहोत्री ने संबोधित किया। यद्यपि संसद के अंतिम दिन धरना समाप्त हो गया, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया गया कि यह अभियान और हमारा संघर्ष राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर विभिन्न स्वरूपों में आगे भी जारी रहेगा।
विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाकात
धरने की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक विभिन्न राजनीतिक दलों पर निरंतर लोकतांत्रिक दबाव बनाए रखने की उसकी क्षमता थी। व्यापक राजनीतिक सहमति विकसित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय महिला आरक्षण गठबंधन के प्रतिनिधिमंडलों ने राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर लगातार राजनीतिक नेताओं, सांसदों और विधायकों से मुलाकात की। राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रीय जनता दल के सांसद अभय कुशवाहा और सुधाकर सिंह, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले-लिबरेशन) के नेताओं राजाराम सिंह और सुदामा प्रसाद, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं पी. संतोष कुमार और पी. पी. सुनीर तथा विदुथलाई चिरुथिगल काची (वीसीके) के डॉ. रवि कुमार से मुलाकात की। राज्य स्तर पर प्रतिनिधिमंडलों ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक तथा समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात की। इन सभी नेताओं ने आंदोलन के प्रति अपना समर्थन और एकजुटता व्यक्त की।
कई वामपंथी सांसदों ने भी धरना स्थल का दौरा किया। इनमें हन्नान मोल्ला, वी. शिवदासन, जॉन ब्रिटास और अमरा राम शामिल थे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की केंद्रीय समिति के सदस्य तथा लोकलहर के संपादक राजेंद्र शर्मा ने भी आंदोलन के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया। 11 अगस्त को जब पुलिस ने जंतर-मंतर के निकट धरना जारी रखने की अनुमति नहीं दी और वी. पी. हाउस के लॉन में भी प्रदर्शन करने से रोक दिया, तब महिलाओं ने वी. पी. हाउस आवासीय परिसर के बाहर एकत्र होकर एक ज्ञापन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सांसद आर. सचितानंदम को सौंपा, जिन्होंने इस ज्ञापन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजा और इसके साथ महिला आरक्षण की मांग का समर्थन करते हुए अपना एक पत्र भी संलग्न किया।
आंदोलन ने तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित परिसीमन और महिला आरक्षण संबंधी प्रस्ताव का भी स्वागत किया। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा प्रस्तुत और द्रमुक के समर्थन से पारित इस प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया गया है कि महिला आरक्षण मूलतः सामाजिक न्याय का प्रश्न है और इसलिए इसे जनगणना तथा परिसीमन की प्रक्रियाओं से अलग करके तत्काल लागू किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय महिला आरक्षण गठबंधन ने इस रुख का स्वागत करते हुए अपने अभियान को और अधिक तेज़ करने तथा अन्य राजनीतिक दलों को भी इसी प्रकार का दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करने का संकल्प व्यक्त किया।
विभिन्न जनसंगठनों का समर्थन
धरने को अनेक लोकतांत्रिक जनसंगठनों का व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ। इनमें स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफ़आई), अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस), अखिल भारतीय खेत मज़दूर यूनियन (एआईएडब्ल्यूयू), सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (सीटू), वर्किंग विमेन्स कोऑर्डिनेशन कमेटी तथा आशा वर्कर्स यूनियन प्रमुख रूप से शामिल थे। 3 अगस्त को सीटू के एक प्रतिनिधिमंडल ने धरना स्थल का दौरा किया और आंदोलन के प्रति अपना पूर्ण समर्थन व्यक्त किया। इस प्रतिनिधिमंडल में सुदीप दत्ता, ए. आर. सिंधु, तपन सेन, एम. साई बाबू, पी. वी. अनियन और कमला शामिल थे।
नेताओं ने बताया कि 29 जुलाई को तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को तत्काल लागू करने के समर्थन में एक प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसे केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और संयुक्त किसान मोर्चा ने संयुक्त रूप से समर्थन दिया था। 10 अगस्त को राष्ट्रीय अध्यक्ष आदर्श साजी के नेतृत्व में एसएफ़आई का एक प्रतिनिधिमंडल भी धरने में शामिल हुआ। आइशी घोष, शिल्पा और नादिया ने भी सभा को संबोधित करते हुए समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया।
एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व संघर्ष
संभवतः इस धरने की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसकी निरंतरता थी। ऐसे समय में, जब अनेक आंदोलन केवल प्रतीकात्मक और एक-दिवसीय कार्यक्रमों तक सीमित हो जाते हैं, महिला संगठनों ने संसद के पूरे मानसून सत्र के दौरान लगातार धरना जारी रखा। यह अपने आप में एक अभूतपूर्व घटना थी कि लगातार उन्नीस दिनों तक विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक पृष्ठभूमियों से आने वाली महिलाएँ देश की राजधानी में एकत्रित होकर एक मूलभूत लोकतांत्रिक सिद्धांत की स्थापना के लिए संघर्ष करती रहीं कि महिलाओं को अब समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता।
इस आंदोलन ने महिला आरक्षण को केवल एक लंबित कानूनी वादे के रूप में नहीं, बल्कि एक तात्कालिक और अपरिहार्य लोकतांत्रिक आवश्यकता के रूप में स्थापित किया। इसकी निरंतरता केवल संगठनात्मक क्षमता का ही प्रमाण नहीं थी, बल्कि यह महिलाओं के राजनीतिक संकल्प, अनुशासन और सामूहिक प्रतिबद्धता का भी प्रतीक थी। इस आंदोलन ने यह भी स्पष्ट रूप से स्थापित किया कि लोकतांत्रिक राजनीति में निरंतर जनसंघर्ष और व्यापक जनसंगठन की भूमिका आज भी अपरिहार्य है।
विरोध-प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार की पुनर्स्थापना
यह धरना लोकतांत्रिक अधिकारों की एक सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में भी सामने आया। महिलाओं ने लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के लिए उपलब्ध होते जा रहे सीमित सार्वजनिक स्थानों को अपनी आवाज़ को दबाने का माध्यम नहीं बनने दिया। जंतर-मंतर पर लगाए गए प्रतिबंध सार्वजनिक असहमति को नियंत्रित करने और उसे सीमित करने की व्यापक प्रवृत्ति को प्रतिबिंबित करते थे। इसके बावजूद धरना निरंतर जारी रहा।
महिलाओं ने बार-बार यह साबित किया कि लोकतांत्रिक अधिकार केवल संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से सुरक्षित नहीं रहते, बल्कि उनकी रक्षा के लिए सामूहिक संघर्ष आवश्यक होता है। इस दृष्टि से महिला आरक्षण का संघर्ष लोकतांत्रिक भागीदारी और असहमति के लिए सार्वजनिक स्थानों को पुनः प्राप्त करने के संघर्ष के रूप में भी उभरकर सामने आया।
राष्ट्रीय महिला गठबंधन का महत्व
इस धरने की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि महिला संगठनों के एक व्यापक राष्ट्रीय गठबंधन का गठन और उसका सुदृढ़ीकरण था। भारत में महिला आंदोलनों का इतिहास विभिन्न वैचारिक और संगठनात्मक परंपराओं से जुड़ा रहा है। ऐसे में एक साझा मंच का निर्माण यह दर्शाता है कि महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण का प्रश्न संगठनात्मक सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक है। इस गठबंधन ने यह स्पष्ट किया कि महिलाओं से जुड़े बुनियादी लोकतांत्रिक प्रश्नों पर अधिक व्यापक एकता की आवश्यकता है और वैचारिक मतभेदों को ऐसे मुद्दों पर बाधा नहीं बनने दिया जा सकता। पचास से अधिक महिला संगठनों के साथ-साथ छात्रों, युवाओं, किसानों, मज़दूरों और अन्य लोकतांत्रिक शक्तियों की भागीदारी ने समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग के प्रति बढ़ती राष्ट्रीय सहमति को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया।
इस निरंतर धरने, 7 अगस्त की विशाल रैली और विभिन्न प्रेस सम्मेलनों ने एक स्पष्ट और निर्विवाद संदेश दिया कि महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को राजनीतिक रणनीतियों या प्रक्रियात्मक शर्तों का बंधक नहीं बनाया जा सकता। महिलाओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे अपने राजनीतिक सशक्तीकरण की मांग को किसी भी दल, विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी, के राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देंगी। उनकी मांग बिल्कुल स्पष्ट, सरल और अडिग थी— महिला आरक्षण कानून को परिसीमन से अलग किया जाए और उसे तत्काल लागू किया जाए। धरने के दौरान निरंतर उपस्थित रहने वाली महिला नेताओं में एडवा की वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद बृंदा करात, अखिल भारतीय अध्यक्ष पी. के. श्रीमती, महासचिव कनिनिका घोष, कोषाध्यक्ष तापसी प्रहराज, उपाध्यक्ष सुभाषिनी अली, मरियम धावले, पुण्यवती और जगमती सांगवान, सचिव आशा शर्मा, सविता और अर्चना प्रसाद, एडवा केंद्र से मनजीत राठी और सरबानी सरकार, दिल्ली की नेता आशा यादव, कविता शर्मा, मैमूना, शेबा फारूकी, अंजू झा और सोनिया, एनएफ़आईडब्ल्यू की एनी राजा, निशा सिद्धू, दीप्ति, सरस्वती और अपराजिता राजा, एआईपीडब्ल्यूए की मीना तिवारी और श्वेता राज, आईसीडब्ल्यूएम की जॉयसिया थोराट, वाईडब्ल्यूसीए, इंडिया की धिया ऐन मैथ्यू तथा टुगेदर फ़ॉर ट्रैंक्विलिटी की भावना शर्मा, प्रमुख रूप से शामिल थीं।
धरने की समाप्ति आंदोलन का अंत नहीं है। बल्कि यह महिलाओं के समान राजनीतिक अधिकारों के संघर्ष के एक नए चरण की शुरुआत है।

100 में 33 ,
आधी आबादी है तो 100 में 50 क्यों नहीं ???