जसवीर त्यागी की कविताएं- प्रेम करो और उतनी जगह देना मुझे
प्रेम करो
प्रेम करो अपनी आँखों से
जिनसे देखना है तुम्हें
यह विराट जगत
प्रेम करो अपने हाथों से
इन्हीं हाथों से
खेनी है तुम्हें
अपनी जीवन -नैया
प्रेम करो अपने पैरों से
आख़िर वे ही पहुँचाएंगे तुम्हें
तुम्हारी मंजिल तक
प्रेम करो अपनी आत्मा से
आत्मा प्रज्वलित रखेगी
तुम्हारे अन्तस् का दीप
प्रेम करो अपने आप से
तुम जब सीख जाओगे
अपने आप से प्रेम करना
तभी कर पाओगे
किसी दूसरे से सच्चा प्रेम ।
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उतनी जगह देना मुझे
उतनी जगह देना मुझे
जितनी जगह में
निकल जाये एक सूई
किसी फटे वस्त्र को जोड़ने के लिए
उतनी जगह देना मुझे
जहाँ से टपकती हुई जल की बूँद
मिट्टी में दबे किसी बीज को मिल जाये
उतनी जगह देना मुझे
जितनी जगह ऑक्सीजन लेती है शरीर में
किसी को जीवन देने के लिए
उतनी जगह देना मुझे
जितनी जगह में समाती है आँख में पुतली
ताकि देख सकूँ यह संसार
उतर सकूँ जीवन-समर को जीतने के लिए
बस! उतनी जगह देना मुझे।
