संजय श्रीवास्तव का हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के लोकलुभावन पर्यटन स्थल कसौली का यात्रा वृत्तांत प्रतिबिम्ब मीडिया में कसौली डायरी के नाम से चार कड़ियों में प्रकाशित किया जा चुका है। यह पांचवीं कड़ी है। संजय जी की नजर से कसौली के हसीन परिवेश से तो आपका परिचय होगा ही इसके साथ वह कसौली के इतिहास से भी परिचित करा रहे हैं। साथ ही अपने रेखाचित्रों के जरिये की कसौली की खूबसूरती को भी चित्रित किया है। लीजिए आनंद उठाइए। इसे संजय श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है।
यात्रा वृत्तांत, कसौली डायरी- 5
(सियासी बदमजगियों के बीच….कुछ ये भी)
लोअर मॉल की मैडम अलासिया और मामूली से खास बनने वाले अंग्रेज
संजय श्रीवास्तव
इंग्लैंड और लंदन में जो लोग छोटे-छोटे घरों में रहते थे. खुद अपना काम करते थे. तंगहाली में जीवन जीते थे. वो कसौली में आकर साहब बन गए. उनकी जिंदगी बदल गई. सस्ते में जमीनें मिलीं. कम पैसों में लॉननुमा बड़े बंगले बनवाए. दो तीन नौकर चाकर रखे. पूरी हैसियत ही बदल गई. ब्रिटिश राज में इंग्लैंड का हर शख्स भारत आकर इंपीरियल सर्विस करना चाहता था. बिजनेसमैन यहां आकर मोटी कमाई करता था. चाहे एडवर्ड डायर की कहानी हो सनावर के लॉरेंस स्कूल के संस्थापक हेनरी लॉरेंस की. सभी जब यहां आए तो इंग्लैंड में कम से कम उनकी कोई हैसियत नहीं थी, यहां आकर बड़े एंपायर के मालिक बन गए.
कसौली के कोलोनियल बंगलों को देखिए तो उनमें से बहुत से यही कहानी कहते हुए मिलेंगे. लोअर मॉल पर चर्च के ठीक बगल में रोसडेन नाम लिखा बंगला है. उसकी लॉन में कुछ कपड़े सूख रहे हैं. मतलब वहां कोई रहता है. इसकी मालकिन नर्स रोसडेन थीं. बंगले के चारों ओर लॉन और पेड़ था. पीछे खूबसूरत पहाड़ों की रेंज. रोसडेन लंदन में मामूली छोटे घर में रहती रही होंगी. यहां कसौली शानदार बंगला बनवाया. हरी छतें, दायीं ओर खुला दालान.
कमोवेश यही कहानी कसौली के लोअर मॉल में रहने वाले हर छोटे अंग्रेज साहबों की थी. जिनकी जिंदगी यहां बदल चुकी थी. जो लग्जरी जीवन वो यहां जी रहे थे, उसकी उम्मीद तो वो दूर दूर तक अपने देश में नहीं कर सकते थे.
लोअर मॉल पर जब आगे बढ़िए तो बंगलों और भवनों की कतार शुरू हो जाती है. खूबसूरत मौरिस हैरिटेज होटल और सामने अलासिया होटल. 1862 में बने हैरिटेज होटल के पीछे की ओर अब तिब्बती रेस्टोरेंट चलता है. हालांकि हर बंगले की किस्मत इतनी अच्छी भी नहीं. …कुछ की छतें उधड़ने लगी हैं. खिड़कियों के कांच टूट चुके हैं. लकड़ी की डोर लटकने लगी है. घास बेतहाशा उग आई है.
कसौली के अपर मॉल लेन पर अगर बड़े अंग्रेज साहब लोग बड़ी जमीनों और बड़े बंगलों में रहते थे तो नीचे लोअर मॉल पर मध्यम औऱ निम्न मध्यम दर्जे के अंग्रेज साहब, नर्स, डॉक्टर और कुछ बिजनेसमैन से घर. सबके घरों की सेवाटहल के लिए भारतीय नौकरों, नौकरानियां और खानसामों की पलटन.
शाम को ये सड़क गुलजार होती थी जब टिमटिमाती रोशनियों में नए नए साहबी पाए अंग्रेज और उनकी मेमसाहिबाएं ऊपर कसौली क्लब की ओर चल पड़ते थे. वहां जाम खनकते थे. आंख मिचौलियां होती थीं. कुछ प्रेम संबंध बनते थे. कुछ संबंधों में सेंध लगती थी. दिन में कस्बा गॉसिपबाजियों से गर्म होता था. इन्हें गर्मागर्म फ्राई करके मसाला लगाने वाले उनके नौकर चाकर ही होते थे.
अलासिया होटल की उस मालिकिन किस्से तो आज भी खूब कहे सुने जाते हैं. सुनते हैं जब वह बड़ी अदा से हैट लगाकर स्कर्ट और शर्ट में अपने प्रेमी यानी अलासिया होटल के मालिक के साथ निकलती थी तो बहुत से अंग्रेज आहें भरने लगते थे. सबको मालूम था कि वो पति पत्नी नहीं हैं लेकिन उनके रिश्ते सबकी उत्सुकता का विषय थे. कहते हैं अलासिया बहुत बीमार पड़ी. बचाई नहीं जा सकी. उसकी मृत्यु के बाद प्रेमी मालिक ने इस होटल का नाम अलासिया रख दिया. ये अब कसौली के हैरिटेज होटलों में है. शुरू में इस बिल्डिंग में पहले बैंक खोला गया, फिर इसे होटल में तब्दील कर दिया गया. अब स्वीडन की एक फर्म इसे चलाती है.

मौरिस हैरिटेज होटल जब मैं गया तब ये बंद पड़ा था. हालांकि बाहर से उसकी अंदर की खूबसूरती का अंदाज तो हो ही जाता है. एक जमाने में ये गजब का होटल रहा होगा. हालांकि इसे कुछ लोग हांटेड भी कह देते हैं.
इसी के कुछ आगे फेयर व्यू बंगला है, जहां बीके नेहरू रहते थे. जवाहर लाल नेहरू के चचेरे भाई. उनकी पत्नी शोभा उर्फ फौरी यहूदी थीं. नेहरू परिवार की पहली विदेशी बहू. यहां के लोग फौरी की कहानियां कहते हैं. बी.के. नेहरू ने इसे 1987 में खरीदा. वह भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी, राजदूत और गवर्नर रहे. उनका निधन यहीं हुआ. कुछ साल बाद उनकी पत्नी का भी, यहां कोई भी इस घर के बारे में आसानी से बता देगा.
कसौली के इन दोनों मॉल यानी अपर और लोअर में घूमते हुए मुझको इतना अंदाज तो हो गया कि ब्रिटिश राज में हुक्मरान अंग्रेजों में भी दो तीन श्रेणियां थीं. एक बहुत पॉवरफुल और बडे़ आला अफसरों की. दूसरे वो जो इंग्लैंड में मामूली या साधारण जीवन जीती थी, यहां आकर कुछ सम्मानित हो गईं. हालांकि उनका दर्जा अब भी बड़े अंग्रेज साहिबों के बीच दूसरे दर्जे का ही था. वैसे ये सही है इन सभी ने भारत में जो जीवन जिया, उसके बारे में वो इंग्लैंड में तो सोच ही नहीं सकते थे.
इसी वजह से आजादी के बाद सैकड़ों-हजारों अंग्रेज जब वापस इंग्लैंड लौटे तो वहां कोई उन्हें पूछने वाला नहीं था. अचानक वो आसमान से जमीन पर पटके जा चुके थे. ज्यादातर ने बाकी जीवन बहुत अवसाद में बिताया.
चलते चलते एक शानदार बिल्डिंग की और चर्चा. अगर आप मॉल के बीचों बीच हों तो वहां एक पुरानी दो मंजिला खास इमारत दिखेगी, जिसमें कल्याण कैफे है. इसे कल्याण होटल या कल्याण रेस्टोरेंट भी कहा जाता है. ये भी अंग्रेजों के दौर की बिल्डिंग है. इसके मालिक बी कालीचरण थे. जिन्हें राज दौर का सबसे धनी जमींदारों माना जाता था.
अंग्रेजों के यहां आने से पहले ये जगह बेघट रियासत की मल्कियत थी. बेघट के राजा ने कसौली को ईस्ट इंडिया कंपनी को 5000 रुपयों में बेचा. उसके बाद ये खूबसूरत जगह अंग्रेजों के लिए मनपसंद बसावट बनती गई.
आज जब लोअर और अपर मॉल की सड़कों पर चलते हैं, तो ये सिर्फ इमारतें नहीं दिखतीं—ये उस दौर की कहानियां सुनाती हैं. इंग्लैंड में जो लोग गुमनाम थे, कसौली में वही इतिहास बन गए… और फिर एक दिन, इतिहास खत्म होने पर वापस गुमनामी में लौट गए.
