अनुपम शर्मा की कविता- हैप्पी मदर्स डे

 

कविता

हैप्पी मदर्स डे

अनुपम शर्मा

 

मेरी बेटी ने

मदर्स डे पर

एक रील भेजीं—

कि

“अगले जन्म में

तुम मेरी बेटी बनकर आना माँ,

मैं तुम्हें

अपनी हथेलियों की नरम धूप में रखूँगी,

तुम्हारे हर अधूरे सपने को

अपनी पलकों से सींचूँगी।

तुम्हें दूँगी

एक खुला आसमान,

जहाँ उड़ानों पर

किसी रिश्ते, किसी डर, किसी मर्यादा की

जंग न लगी हो।

तुम्हें हक़ होगा

अपने फैसले खुद लेने का,

और तुम उसी से प्रेम करना

जो तुम्हें प्रेम करे—

तुम्हें बदले नहीं।”

मैंने

शांत मन से

उसकी कविता सुनी।

फिर

धीरे से मुस्कुराई—

जैसे वर्षों बाद

किसी बंद कमरे की खिड़की खुली हो।

मैंने उसकी इच्छा के लिए

दुआ माँगी,

क्योंकि अपने संघर्षों से

मैं थक चुकी थी।

हालाँकि

मैं मर जाना नहीं चाहती थी,

क्योंकि आत्महत्या

मेरी हार की गवाही होती,

और मैंने पूरी उम्र

हार के विरुद्ध ही तो युद्ध लड़ा था।

पर अनजाने में ही सही,

बेटी की उस मासूम इच्छा में

मुझे अपनी मुक्ति दिखाई दी।

क्योंकि

मेरे मरे बिना

मैं उसकी बेटी बनकर

फिर जन्म कैसे लेती?

उस क्षण

पहली बार लगा—

माँ होना

सिर्फ जन्म देना नहीं,

कभी-कभी

अपनी बेटी की आँखों में

अपने लिए

एक नई दुनिया देख लेना भी है।

और तब

भीतर कहीं बहुत गहराई में

एक धीमी आवाज़ आई—

“हैप्पी मदर्स डे…”

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