प्रस्तुत कविता बहुजन न्यायवादी कवि ओमसिंह अशफ़ाक की पुस्तक ‘अन्याय गाथा’ के खंड आठ से ली गई है। इसमें उन नाबालिक युवतियों की व्यथा- कथा बयान की गई है जो स्कूल जाने के बजाए कूड़े के ढेर पर अपना बचपन, यौवन और जीवन बर्बाद करने पर मजबूर हो जाती हैं। लेकिन समाज और सरकारें आज तक भी उनकी मुश्किलों और मुसीबतों का अंत नहीं कर पाई हैं ! आखिर क्यों ? -संपादक)
युवती कूड़ा बीन रही है!
खंड आठ: हमें जात-पांत में ना बांट-3
ओमसिंह अशफ़ाक
क्यूं युवती कूड़ा बीन रही है ?
1
युवती कूड़ा बीन रही है ।
हाय ! साठ साल में भी दीन रही है ?
कच्ची बस्ती में रहती है ।
झुग्गी को ये घर कहती है ।
गलियों-नलियों में गंद मचा है ।
क्या इसके हिस्से यही बचा है ?
शिक्षा का भी मुंह नहीं देखा-
शेष समाज में भयानक एका ?
पोषण भी ढंग से नहीं हुआ है ।
यूं ‘शिष्टाचार’ ने नहीं हुआ है ।
है पेशा एक पर गज़ब फ़र्क है !
सेठ का है डिस्पोज़ल बिजनेस-
इसका जीवन बना नर्क है !
ये आजादी की वर्षगांठ है ?
या सत्ता-पूंजी की सांठगांठ है ?
आखिर क्यूं ये हीन रही है ?
युवती कूड़ा बीन रही है ।
2
भांति-भांति का है कचरा फैला ।
उजला थोड़ा, ज्यादा मैला ।
कागज कीलें, पॉलीथीन के टीले,
कूड़े का सब घाल-मेल है!
पीस ब्रेड के, कांच के टुकड़े-
बड़ा भयानक तालमेल है !
वहीं पे सुअर, वहीं पे कुत्ते !
कभी जागते, कभी हैं सुत्ते !
बड़ी विषैली गंध आती है !
मन में मितली-सी उठती है-
सिर को भी भन्ना जाती है !
तन के चिथड़े फटेहाल हैं-
युवती यूं ना शरमाती है ।
चील और कव्वे घूर रहे हैं-
हक, मानो उनका छीन रही है !
युवती कूड़ा बीन रही है !
3
ये नहीं निरापद, खतरनाक है !
जीवन युवती का बना राख है !
इस जीवन में कोई उमंग नहीं है !
क्या देश का ये अंग, भंग नहीं है ?
ज़िम्मा इसका भी तो लेना होगा ?
उत्तर जनता को देना होगा ?
जीवन कूड़े का जो ढेर बनेगा ?
तो शासन कितनी देर तनेगा ?
सब सड़कें एक दिन जाम मिलेंगीं !
फौज-पुलिस नाकाम मिलेंगीं !
ये रोष किसी दिन बह जायेगा !
गढ़ सत्ता का ये ढ़ह जायेगा !
रुखसत होगी वो सत्तारानी –
जो अब तक आसीन रही है !
क्यूं युवती कूड़ा बीन रही है ?
(रचना काल, 2006)
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